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धारा 370 हटाने से लेकर सीएए तक संसद की सुनहरी तस्वीर पेश करता 17वीं लोकसभा का पहला साल

Wed, 17 Jun 2020 01:46 PM IST
Suraj Mohan Jha सूरज मोहन झा
Updated Wed, 17 Jun 2020 01:46 PM IST
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citizenship amendment bill to article 370 Jammu kashmir,  one golden year completed of 17th loksabha
17वीं लोकसभा के तीनों सत्रों की उत्पादकता इस पूरे एक साल को संसदीय इतिहास के नजरिए से ऐतिहासिक बनाते हैंं। - फोटो : सोशल मीडिया

17 जून को 17वीं लोकसभा का पहला साल पूरा हो रहा है, इस एक साल ने देश के लोकतंत्र के मंदिर संसद की वह तस्वीर पेश की है, जिसकी पिछले कई दशकों से प्रतीक्षा की जा रही थी।

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17वीं लोक सभा के तीसरे सत्र की कुछ एक घटनाओं को छोड़ दें तो संसदीय व्यवस्था की अवधारणा को सफल साबित करता यह साल भविष्य में अपनी उपलब्धियों के लिए सुनहरे अक्षरों में याद किया जाएगा। 17वीं लोक सभा के तीनों सत्रों की उत्पादकता, संसद सदस्यों के भाषण, सदन से पारित विधेयक और नए सांसदो की सक्रियता, यह चारों पहलू इस पूरे एक साल को संसदीय इतिहास के नजरिए से ऐतिहासिक बनाते है।
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लोकसभा चुनाव 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के आधार पर भारतीय जनता पार्टी ने लगातार दूसरी बार अपने दम पर बहुमत हासिल किया। भाजपा के नेतृत्व में एनडीए गठबंधन को 353 सीटों पर जीत हासिल हुई, इसमें 303 सीटें अकेले भाजपा की थीं। साल 2014 की ही तरह इस बार भी कोई विपक्षी दल लोकसभा चुनाव में 10 फीसदी सीट नहीं जीत पाया। 
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लोकसभा में भाजपा का संख्या के लिहाज से एक छत्र राज फिर कायम हुआ और कांग्रेस इस बार भी नेता प्रतिपक्ष का पद नहीं पा सकी। 19 जून को सदन ने एक राय से भाजपा के राजस्थान से सांसद ओम बिरला को लोक सभा अध्यक्ष चुन लिया। 17वीं लोक सभा में 78 महिला सदस्य चुनाव जीतकर लोक सभा पहुंची और बीजू जनता दल की 25 साल की चंद्राणी मुर्मु ओडिशा से जीतकर 17वीं लोक सभा की सबसे युवा सांसद बनीं। 265 सांसद पहली बार चुनकर लोक सभा पहुंचे। 

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल की संसद में धमाकेदार शुरुआत हुई। 17वीं लोक सभा के पहले सत्र में संसद के दोनों सदनों से 30 विधेयक पारित हुए और लोक सभा में 35 विधेयक को पारित किया गया इससे 1952 में बनी पहली लोक सभा के पहले सत्र के 24 विधेयकों को पारित करने का रिकॉर्ड भी टूट गया। इस पूरे सत्र में शोर-शराब और हंगामे की वजह से लोक सभा का एक भी मिनट बर्बाद नहीं हुआ बल्कि माननीयों ने 73 घंटे से ज्यादा बैठकर विधायी कामकाज को निपटाया। 

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17वीं लोक सभा के पहले सत्र में शून्यकाल का जितना उपयोग किया गया शायद ही कभी किया गया हो! - फोटो : अमर उजाला

हालांकि, विपक्ष ने इस दौरान सरकार पर बहुमत के घमंड पर जल्दबाजी में विधेयक पारित कराने का आरोप भी लगाया। विपक्ष का कहना था कि संसदीय समितियों का गठन हो और विधेयक सदन में पेश होने के बाद संसदीय समिति के पास भेजे जाएं ताकि विधेयकों पर सही तरह से समीक्षा हो सके। गौरतलब है कि संसदीय समितियों में लगभग सभी दलों के सांसद सदस्य होते हैं। 

17वीं लोक सभा के पहले ही सत्र में भाजपा के एजेंडे में सबसे ऊपर रहे जम्मू कश्मीर में धारा 370 को हटाने और तीन तलाक कानून पर संसद की मोहर लग गई। धारा 370 हटाना मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है क्योंकि जनसंघ से भाजपा तक के सफर में यह उनके कार्यकर्ताओं की बीच सबसे बड़ा भावनात्मक मुद्दा था।

17वीं लोक सभा के पहले सत्र में शून्यकाल का जितना उपयोग किया गया शायद ही कभी किया गया हो। 37 दिनों के कामकाज में 1066 मुद्दों को सांसदों ने शून्यकाल के दौरान उठाए जो एक रिकॉर्ड है। 18 जुलाई को तो शून्यकाल 4 घंटे 48 मिनट तक चला और इस दौरान रिकॉर्ड 161 सांसदों को बोलने का मौका मिला।

17वीं लोक सभा के शीतकालीन सत्र में मोदी सरकार ने नागरिकता संशोधन विधेयक को संसद के दोनों सदनों से पारित करवा कर अपना लोहा मनवाया। हालांकि विपक्षी दलों का कहना था कि यह विधेयक मुसलमानों के खिलाफ है और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता है। 

नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध यह कहकर किया जा रहा था कि एक धर्मनिरपेक्ष देश किसी के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव कैसे कर सकता है? मोदी सरकार का कहना था कि साल 1947 में भारत पाकिस्तान बंटवारा धार्मिक आधार पर हुआ था। पाकिस्तान,अफगानिस्तान और बांग्लादेश में कई धर्म के लोग रह रहे हैं और उन धार्मिक अल्पसंख्यकों को इन देशों में प्रताड़ित किया जाता रहा है इस वजह से इन तीन देशों के धार्मिक अल्पसंख्यक भारत में शरण लेते रहे हैं इसलिए मानवता के आधार पर भारत को पड़ोसी देशों के इन शरणार्थी धार्मिक अल्पसंख्यकों की मदद करने की जरुरत है।

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17वीं लोक सभा का पहला साल संसदीय व्यवस्था के इतिहास में अपने विधायी कामकाज के लिए सुनहरे अक्षरों में याद किया जाएगा! - फोटो : फाइल फोटो

प्रश्नकाल संसद की कार्यवाही का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। प्रश्नकाल में सांसद प्रशासन और सरकार के कार्यकलापों के प्रत्येक पहलू पर प्रश्न पूछ सकता है। शीतकालीन सत्र में 27 नवंबर 2019 को लोक सभा में सभी 20 तारांकित प्रश्न पूछे गए जिनका जवाब संबंधित मंत्रियों ने दिया। संसदीय व्यवस्था में इसे एक सकारात्मक पक्ष कहा जा सकता है क्योंकि सरकार संसद को लेकर जवाबदेह होती है और प्रश्नकाल ही वह समय होता है जब सांसद दलगत राजनीति से उठकर सरकार से सीधे सवाल पूछकर उसे संसद को लेकर जवाबदेह बनाते है।

17वीं लोक सभा के तीसरे सत्र या कहें बजट सत्र की शुरूआत तो अच्छी हुई, सत्र के पहले हिस्से में राष्ट्रपति अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव और बजट पर देर रात तक सदन में चर्चाएं हुई। लेकिन बजट सत्र के दूसरे हिस्से का बड़ा भाग दिल्ली में हुए दंगो के मुद्दे पर बाधित रहा। सात विपक्षी सांसदों को सदन में अनुचित व्यवहार के लिए पूरे सत्र से निलंबित भी किया गया। 

हालांकि, सातों विपक्षी सांसदों का निलंबन कुछ दिन बाद वापिस ले लिया गया। दिल्ली में हिंसा पर चर्चा की विपक्ष की मांग को मानते हुए नियम 193 के तहत इस पर लोक सभा में तकरीबन 5 घंटे तक चर्चा हुई। बहस के दौरान कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने केन्द्र सरकार पर जमकर हमला बोला और कहा कि जब बालाकोट में स्ट्राइक कर सकते हैं तो दिल्ली की हिसां को क्या नहीं रोक सकते थे। इस चर्चा का जवाब गृहमंत्री अमित शाह ने दिया।

हम कह सकते हैं कि 17वीं लोक सभा का पहला साल संसदीय व्यवस्था के इतिहास में अपने विधायी कामकाज के लिए सुनहरे अक्षरों में याद किया जाएगा, बीते एक साल में लोकसभा से 64 विधेयक पारित हुए। तीसरे सत्र के व्यवधान की कुछ घटनाओं को अगर छोड़ दें तो बीते एक साल संसद सत्र की उत्पादकता ऐतिहासिक रही है। अब उम्मीद यह भी है कि संसद की यह सुहानी तस्वीर आगे भी दिखे। हर कोई समझे कि संसद में जवाबदेही चर्चा से तय होती है, हंगामे से नहीं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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