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नेपाल के साथ एक अलग रणनीति पर काम कर रहा चीन, कितना अलर्ट है भारत?

Wed, 16 Oct 2019 10:03 AM IST
Sanjiv Pandey संजीव पांडेय
Updated Wed, 16 Oct 2019 10:03 AM IST
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chinese president xi jinping visit to nepal china media india
शी जिनपिंग नेपाल में - फोटो : ANI

हमारी नजरें महाबलिपुरम की शिखर बैठक पर थी, लेकिन चीनी मीडिया समेत कई पश्चिमी ताकतों की विशेष नजर काठमांडू पर थी। इसके वाजिब कारण थे। चीन की सरकारी मीडिया का उत्साह नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की बैठक को लेकर उतना नहीं था, जितना शी जिनपिंग की नेपाल यात्रा को लेकर था।  जिनपिंग महाबलिपुरम में भारतीय प्रधानमंत्री के साथ बैठक करने के बाद सीधे काठमांडू पहुंचे थे।

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दरअसल, चीन की मीडिया महाबलिपुरम की बैठक से ज्यादा जिनपिंग की नेपाल यात्रा के महत्व पर खासा चर्चा कर रही थी। चीन के ग्लोबल टाइम्स ने नेपाल की राष्ट्रपति विधा देवी भंडारी का इंटरव्यू छापा था। इस इंटरव्यू में विधा देवी भंडारी ने चीन की जमकर तारीफ की थी। जिनपिंग ने नेपाल की धरती पर बयान जारी कर पश्चिमी ताकत समेत भारत को भी संदेश दिया। उन्होंने कहा कि चीन को तोड़ने की कोशिश चीन सफल नहीं होने देगा।
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दूसरी तरफ नेपाल ने भी वन चाइना पॉलिसी का जोरदार समर्थन किया। लेकिन जिनपिंग की नेपाल यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू नेपाल के अंदर नार्थ-साउथ आर्थिक कॉरिडोर का विकास को लेकर चीन और नेपाल के बीच सहमति बनना रहा। यही नहीं केरूंग-काठमांडू हाइवे को विकसित करने को लेकर भी दोनों मुल्कों के बीच सहमति बन गई। वहीं ट्रांस हिमालयन रेल लाइन को जल्द से जल्द विकसित करने को लेकर भी बातचीत हुई।  

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चीन का आरोप है कि चीन विरोधी गतिविधियों को चलाने का बड़ा केंद्र काठमांडू रहा है - फोटो : पीटीआई

काठमांडू से दुनिया को चेतावनी का मतलब
काठमांडू में जिनपिंग ने नेपाली नेताओं के साथ बैठक के बाद साफ शब्दों मे कहा कि दुनिया की कोई ताकत चीन को तोड़ने की कोशिश न करे। चीन इस तरह की कोशिश को विफल कर देगा। चीन की मीडिया ने इशारा किया कि जिनपिंग का ब्यान उइगुर, तिब्बती और हांगकांग के अलगाववादियों के लिए स्पष्ट संदेश है। गौरतलब है कि नेपाल लंबे समय तक पश्चिमी ताकतों का बफर इलाका रहा है।

चीन का आरोप है कि चीन विरोधी गतिविधियों को चलाने का बड़ा केंद्र काठमांडू रहा है, जहां पश्चिमी ताकतें सक्रिय रही हैं। चूकिं तिब्बत से नेपाल की सीमा लगती है और नेपाल का भारत और तिब्बत के बीच स्पेशल जियोस्ट्रैटजिक पोजिशन है, इसलिए चीन 1990 के बाद नेपाल को लेकर खासा सतर्क हो गया।

नेपाल में हजारों की संख्या में तिब्बती रहते हैं, इसलिए चीन नेपाल को लेकर खासा संवेदनशील है, क्योंकि चीन को हमेशा यह शक रहा है कि इन तिब्बती शरणार्थियों को पश्चिमी ताकतें समर्थन देती है। उन्हें आर्थिक रूप से फंडिग भी होती है। हालांकि नेपाली लीडरशीप में आपसी गतिरोध के कारण जिनपिंग के दौरे के दौरान दोनों मुल्कों के बीच प्रत्यपर्ण संधि पर हस्ताक्षर नहीं पाया, लेकिन चीन लगातार यह कोशिश आगे भी करेगा। अभी फिलहाल दोनों मुल्कों के बीच अपराधिक मामलों में कानूनी सहयोग को लेकर सहमति बन गई है।

दरअसल, प्रत्यर्पण संधि पर हस्ताक्षर होने के बाद परेशानी नेपाल में रहने वाले 20 हजार तिब्बती शरणार्थियों को होगी, जिनपर चीन का आरोप है कि ये नेपाल में चीन विरोधी गतिविधियां चलाते हैं। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी और नेपाल की सरकार ने वन चाइना पॉलिसी को खुला समर्थन दिया है। यह संकेत पश्चिमी ताकतों के लिए अच्छे संकेत नहीं है।

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नेपाल का बेल्ट एंड रोड पहल में शामिल होने ही भारत के लिए एक बड़ा झटका है। - फोटो : ani

बेल्ड एंड रोड पहल पर काम तेज करने पर सहमति
केपी शर्मा ओली और जिनपिंग की बैठक में बेल्ट एंड रोड पहल पर काम तेज करने को लेकर बातचीत हुई। साथ ही नेपाल के अंदर तीन नार्थ-साउथ इकनॉमिक कॉरिडोर विकसित करने पर सहमति बनी है। प्रस्तावित नार्थ-साउथ इकनॉमिक कॉरिडोर में कोशी, गंडक और करनाली को शामिल किया गया। चीन ने साफ संकेत दिए है कि चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर के तर्ज पर नेपाल में नार्थ-साउथ इकनॉमिक कॉरिडोर विकसित किया जाएगा।

दरअसल, नेपाल का बेल्ट एंड रोड पहल में शामिल होने ही भारत के लिए एक बड़ा झटका है। भारत चीन के बेल्ट एंड रोड पहल का लगातार इसका विरोध कर रहा है। नेपाल बेल्ड एंड रोड पहल में 2017 में ही शामिल हो गया था।

नेपाल ने चीन के साथ बेल्ट एंड रोड पहल के तहत नेपाल के अंदर विकास के लिए एमओयू पर हस्ताक्षर किया था। बेल्ट एंड रोड पहल के बाद चीन का निवेश नेपाल के अंदर आने का रास्ता साफ हो गया। इस समय चीन नेपाल के अंदर सबसे ज्यादा पूंजी निवेश करने वाला मुल्क बन गया है। चीन और नेपाल के बीच सलाना दिपक्षीय व्यापार एक अरब डॉलर पार गया है।

ट्रांस हिमालयन मल्टी डायमेंशनल कनेक्टिविटी नेटवर्क
जिनपिंग और नेपाली लीडरशीप की हुई बैठक में बेल्ट एंड रोड पहल के तहत ट्रांस हिमालयन मल्टी डायमेंसनल कनेक्टिविटी नेटवर्क पर काम तेज गति से करने को लेकर सहमति बनी। इसके तहत नेपाल को उड्ड्यन, रेलवे, रोड और संचार से जोड़ा जाएगा। नेपाल में दो एयरपोर्टों का विकास चीन कर रहा है।

यही नहीं नेपाल को दो हवाई जहाज भी चीन ने अनुदान के रूप में दिए है। दरअसल उड्ड्यन  सेक्टर के विकास के बाद नेपाल को चीनी पर्यटकों का एक बड़ा केंद्र बनाने के खेल में चीन लगा हुआ है। बेल्ट एंड रोड पहल से नेपाल का विकास के तहत नेपाल क्षेत्रीए संतुलन साधने में लगा है।

नेपाल भारत पर पूरी तरह से अपनी निर्भरता खत्म करने के खेल में लग गया है। उधर चीन ने भी अपनी नीति बदली है। माओत्से तुंग ने किसी जमाने में नेपाली लीडरशीप को साफ बोला था कि हिमालय पर्वत की दुर्गम परिस्थितियों के कारण नेपाल को भारत जैसे मुल्कों से अच्छे संबंध रखने चाहिए, क्योंकि इसी में नेपाल की भलाई होगी। 

जाहिर है चीन नेपाल को हिमालय पर्वत की दुर्गम परिस्थितियों के कारण बहुत ज्यादा सहयोग करने की स्थिति में नहीं है। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। अब चीन हिमालय की दुर्गम परिस्थितियों को पार करने तिब्बत से लुंबिनी तक रेल कनेक्टिविटी देने पर काम शुरू कर चुका है।

 

 

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चीन की रणनीति साउथ एशिया में साफ है। यह रणनीति ‘चीन फर्सट’ की है। - फोटो : सोशल मीडिया

चीन फर्सट की रणनीति पर चीन
हालांकि भारत लगातार चीन से संबंध सुधारने की कोशिश कर रहा है। लेकिन चीन की रणनीति साउथ एशिया में साफ है। यह रणनीति ‘चीन फर्सट’ की है। बेशक जिनपिंग आधिकारिक रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति के ‘अमेरिका फर्सट’ के तर्ज पर ‘चीन फर्सट’ की घोषणा न करें, लेकिन उनकी रणनीति एशिया में अपने दबदबा बनाए रखने की है।

चीन चारों तरफ से भारत को घेर चुका है। बेशक वुहान और महाबलिपुरम की बैठक के बाद दोनों मुल्कों ने तमाम दावे किए हैं। लेकिन सच्चाई तो यही है कि शी जिनपिंग भारतीय हितों पर चोट जारी रखेंगे। उन्होंने अपने बेल्ट एंड रोड पहले के तहत नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका में जाल बिछा लिया है।

अरबों डॉलर के निवेश के नाम पर चीनी अभियान जारी है। ये चारों मुल्क भारत के पड़ोसी हैं। यही नहीं चीन के निवेश और चीन के द्वारा इन देशों के स्थानीय नेताओं को प्रलोभन की रणनीति ने भारत का खासा नुकसान किया है।

चीन ने इन चारों मुल्कों में नेताओं, नौकरशाहों, बुदीजीवियों और सैन्य अधिकारियों का एक बड़ा तबका अपने पक्ष कर लिया है। इस तबके को चीन ने हर तरह के प्रलोभन देकर अपने पक्ष में किया है। इनके सहारे चीन इन मुल्कों की आतंरिक राजनीति में भी खासी घुसपैठ कर चुका है। इसका सीधा नुकसान भारत को है, क्योंकि चीन लगातार उन्हें भारत के ऊपर निर्भर न रहने की रणनीति बनाए रखने के लिए भी प्रोत्साहित कर रहा है।

अभी हाल ही में भारत आई बांग्लादेश की प्रधानमंत्री ने भारत से बांग्लादेश के प्याज निर्यात को एकाएक रोके जाने से नाराजगी जताई थी। दरअसल, बांग्लादेश ने भारत के प्याज निर्यात को रोक से नाराज हो बांग्लादेश ने चीन और मिस्र से 364 टन प्याज आयात किया। भारत की निर्यात नीति में स्थिरता के आभाव को देख बांग्लादेश अब चीन से लगातार प्याज आयात करने की योजना बना रहा है।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण ): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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