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दूसरा पहलू: पत्थरों में छिपा एक आदिम रहस्य, क्या चिंपैंजी भी निभाते हैं सांस्कृतिक परंपराएं?
Thu, 18 Jun 2026 07:36 AM IST
Devesh Tripathi
रॉबिन नाकानो
रॉबिन नाकानो
Published by: Devesh Tripathi
Updated Thu, 18 Jun 2026 07:36 AM IST
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चिंपैंजी
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अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
गिनी-बिसाऊ के बोए नेशनल पार्क के सवाना-वुडलैंड इलाके में घूमते हुए, आपको शायद एक ऐसा पेड़ दिखे, जिस पर टेढ़े-मेढ़े निशान हों और जिसके तने के चारों ओर पत्थरों का ढेर लगा हो। पहली नजर में यह एक साधारण दृश्य लग सकता है, पर वैज्ञानिकों के लिए यह चिंपैंजियों की एक रहस्य से भरी कहानी है।कैमरा ट्रैप और ऑडियो रिकॉर्डिंग्स की मदद से वैज्ञानिकों ने पाया है कि कुछ जंगली चिंपैंजी, विशेषकर वयस्क नर, बार-बार कुछ खास पेड़ों पर पत्थर फेंकते हैं और बाद में फिर उन्हीं पेड़ों पर लौटकर ऐसा करते हैं। इस व्यवहार को ‘एक्यूम्युलेटिव स्टोन थ्रोइंग’ (पत्थरों का संचयात्मक फेंकना) कहा जाता है। पत्थर फेंकते समय चिंपैंजी जोर-जोर से आवाजें निकालते हैं, जिन्हें ‘पैंट-हूट’ कहा जाता है। यह उनकी लंबी दूरी तक पहुंचने वाली आवाज होती है। कई बार तो वे पेड़ों के तनों पर अपने हाथों और पैरों से भी जोरदार प्रहार करते हैं, जिसे ‘बट्रेस ड्रमिंग’ के नाम से जाना जाता है। दरअसल, पैंट-हूट और बट्रेस ड्रमिंग पहले से ही नर चिंपैंजियों के प्रदर्शन का हिस्सा माने जाते हैं। इसलिए, वैज्ञानिकों का मानना है कि पत्थर फेंकना इसी व्यवहार का एक विशेष रूप हो सकता है। मनुष्यों और चिंपैंजियों के बीच गहरे विकासवादी संबंधों को देखते हुए, शोधकर्ताओं का मानना है कि यह व्यवहार मानव विकास के दौरान जटिल संचार व पत्थर के औजारों के उपयोग की उत्पत्ति को समझने में मदद कर सकता है। संभव है कि यह चिंपैंजियों का किसी तरह का संदेश देने का तरीका या फिर किसी स्थान को विशेष महत्व देने का प्रतीकात्मक व्यवहार हो। इसी रहस्य को समझने के लिए वैज्ञानिकों की एक टीम गिनी-बिसाऊ के दूरस्थ बोए क्षेत्र में पहुंची। अध्ययन के दौरान एक और रोचक तथ्य सामने आया कि जिन जगहों पर चिंपैंजी आज से एक दशक पहले पत्थर फेंक रहे थे, वे आज भी उन्हीं पेड़ों का इस्तेमाल कर रहे हैं, यानी यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। लेकिन, चिंपैंजियों की यह अनूठी सांस्कृतिक विरासत अब खतरे में है।
गिनी-बिसाऊ में चिंपैंजियों के आवासों पर बॉक्साइट खनन का दबाव बढ़ रहा है। विकास और अर्थव्यवस्था के नाम पर जंगलों को काटा जा रहा है। अगर यह खनन इसी तरह बिना कड़े नियमों के जारी रहा, तो न केवल चिंपैंजियों का आशियाना उजड़ जाएगा, बल्कि इन्सानी सभ्यता के इतिहास को समझने का एक जीवंत और ऐतिहासिक जरिया भी हमेशा के लिए समाप्त हो सकता है।
-साथ में, एमी कलान (द कन्वर्सेशन)