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Chaudhary Charan Singh: समावेशी विकास और सशक्त ग्रामीण भारत चौधरी चरण सिंह का आदर्श

Sat, 28 Dec 2024 06:49 AM IST
शिव शुक्ला जयंत चौधरी
जयंत चौधरी Published by: शिव शुक्ला Updated Sat, 28 Dec 2024 06:49 AM IST
सार

इस वर्ष देश संविधान की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है। यह उपयुक्त समय है कि हम चौधरी साहब के विचारों को स्मरण करें, जो संविधान के मूल वादों-न्याय, समानता और बंधुत्व से मेल खाते हैं। उनका दृष्टिकोण समतामूलक समाज का निर्माण करना था, जो जातिवाद और भेदभाव को समाप्त करे, वंचित समुदायों के लिए आर्थिक अवसर सुनिश्चित करे।

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Chaudhary Charan Singh's ideal of inclusive development and empowered rural India
चौधरी चरण सिंह। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न स्व. चौधरी चरण सिंह की 122वीं जयंती के अवसर पर मैं उस महान व्यक्तित्व को स्मरण करता हूं, जिनकी नीतियों और सिद्धांतों ने न केवल ग्रामीण भारत का स्वरूप बदला, बल्कि आज की नीति और शासन व्यवस्था पर भी गहरी छाप छोड़ी है। उनका जीवन हमें यह याद दिलाता है कि नागरिकों के हितों को केंद्र में रखते हुए बनाई गई समानतापूर्ण नीतियां ही राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यह अवसर खास है, क्योंकि मैं एक ऐसे दूरदर्शी नेता को याद कर रहा हूं, जिन्हें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, भारत के प्रधानमंत्री और भारत रत्न से अधिक किसान मसीहा के रूप में याद किया जाता है। उनके विचारों ने मेरे सामाजिक दृष्टिकोण और जनसेवा के जीवन को आकार दिया है।

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इस वर्ष देश संविधान की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है। यह उपयुक्त समय है कि हम चौधरी साहब के विचारों को स्मरण करें, जो संविधान के मूल वादों-न्याय, समानता और बंधुत्व से मेल खाते हैं। उनका दृष्टिकोण समतामूलक समाज का निर्माण करना था, जो जातिवाद और भेदभाव को समाप्त करे, वंचित समुदायों के लिए आर्थिक अवसर सुनिश्चित करे। चौधरी साहब का मानना था कि लोकतंत्र को विशेष रूप से ग्रामीण भारत के वंचित सामाजिक समूहों के लिए सक्रिय रूप से काम करना चाहिए।
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चौधरी साहब ने स्पष्ट रूप से कहा था कि राष्ट्रीय प्रगति की शुरुआत ग्रामीण समृद्धि से होती है। उन्होंने कहा था, एक राष्ट्र तभी समृद्ध हो सकता है, जब उसका ग्रामीण क्षेत्र उन्नत हो, और उसकी क्रय शक्ति उच्च हो। चौधरी साहब ने ऐसे आर्थिक मॉडल का समर्थन किया, जिसे हम कृषि पूंजीवाद कह सकते हैं, एक प्रणाली जिसमें ग्रामीण समृद्धि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को प्रेरित करती है, और पूंजी का वितरण नीचे से ऊपर की ओर होता है, न कि ऊपर से नीचे की ओर। उनके लिए भारत की वृद्धि कारखानों में नहीं, छोटे उद्योगों और खेतों में शुरू होती थी।
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चौधरी साहब के लिए, सशक्तीकरण का अर्थ विकेंद्रीकरण भी था। उन्होंने ऐसे ग्रामीण लोकतंत्र की कल्पना की थी, जहां आर्थिक और सामाजिक स्वायत्तता हर कृषि परिवार को स्वतंत्र रूप से विकसित होने का अवसर देती थी। प्रारंभिक भारतीय विकास मॉडलों में जो केंद्रीकृत, बड़े पैमाने पर औद्योगिक योजनाएं थीं, उनके विपरीत चौधरी साहब का समर्थन विकेंद्रीकृत उत्पादन और किसानों का सशक्तीकरण का था। आजकल, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और भूमि स्वामित्व अधिकार जैसी नीतियां सामान्य समझी जाती हैं, लेकिन जब उन्होंने इनका समर्थन किया था, तब ये क्रांतिकारी विचार थे। 1952 में उत्तर प्रदेश जमींदारी और भूमि सुधार अधिनियम, 1953 में होल्डिंग्स का समेकन अधिनियम ने उन्हें वंचितों के प्रबल समर्थक के रूप में स्थापित किया। चौधरी साहब ने 1960 के दशक के अंत में सूखे के दौरान सही खरीद मूल्य की मांग की थी, जो एमएसपी का आधार बना। उन्होंने पहले 1938 में कृषि उत्पाद विपणन विधेयक पेश किया था, जिसे 1964 में पास किया गया और इसने कृषि बाजार ढांचे की नींव रखी। चौधरी साहब समझते थे कि मजबूत समर्थन प्रणाली के बिना, कृषि क्षेत्र न तो खुद को बनाये रख कर सकता था और न ही व्यापक अर्थव्यवस्था को सहारा दे सकता था।

इसके लिए उन्होंने ग्रामीण विकास के लिए संस्थाओं की स्थापना की थी, जो आने वाले दशकों तक ग्रामीण विकास को मजबूती से खड़ा करतीं। उन्होंने ग्रामीण विकास विभाग को मंत्रालय का दर्जा दिया था। राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना ने ग्रामीण भारत को वित्तीय सहायता देने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए।


चौधरी साहब को अक्सर जाट नेता के रूप में सीमित करके देखा जाता है, लेकिन उनके आदर्श कहीं अधिक व्यापक थे। आर्य समाज और गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित होकर, उन्होंने जाति को मूल्यांकन का आधार मानने से इन्कार किया। बाबा साहब की तरह, वे जाति को राष्ट्रीय प्रगति में बाधा मानते थे। 1954 में उन्होंने नेहरू को क्रांतिकारी नीति का सुझाव दिया, जिसमें अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहित करने की बात कही गई थी। हालांकि इस विचार का विरोध हुआ, लेकिन यह उनके प्रगतिशील दृष्टिकोण और ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने के प्रति उनके समर्पण को दर्शाता है। नीति निर्माण में, चौधरी साहब वित्तीय अनुशासन व भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े रुख के लिए जाने जाते थे। उनकी नीतिगत दृष्टि आज की पारदर्शिता और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) पहल का आधार है। उन्होंने स्थायी विकास को तब महत्व दिया था, जब वह वैश्विक चिंता नहीं था। कारीगरों, छोटे व कृषि आधारित उद्योगों का मूल्यांकन किया, जो आज एमएसएमई व स्टार्ट-अप पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में जीवित हैं और योजनाओं जैसे मुद्रा और पीएम विश्वकर्मा उसी धरोहर पर आधारित हैं।  

(लेखक केंद्रीय राज्यमंत्री हैं।)

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