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बच्चों की परिवरिश और उनके पोषण को लेकर कितना चिंतित है समाज?

Wed, 28 Aug 2019 07:23 PM IST
Veena Nagpal वीना नागपाल
Updated Wed, 28 Aug 2019 07:23 PM IST
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causes of child malnutrition in india problems and solutions
बच्चों के कल्याण के लिए और इसके क्रियान्वयन के लिए जो भी यह राशि है बहुत कम है। - फोटो : PTI

बच्चों के कल्याण अर्थात् उनकी भलाई के लिए किए जाने वाले कामों की सूची बहुत छोटी है। जबकि होना यह चाहिए कि केंद्र और राज्यों के बजट का काफी बड़ा हिस्सा बाल कल्याण के लिए होना चाहिए। यदि समाज के व्यक्तियों के शुरुआत वाले हिस्से पर ध्यान नहीं दिया गया तो यह तय है कि समाज की व्यवस्था गड़बड़ा जाएगी। बच्चों के कल्याण के लिए और इसके क्रियान्वयन के लिए जो भी यह राशि है बहुत कम है।

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कुपोषित बच्चों का जीवन अपने लिए तो खतरनाक होता ही है और साथ ही वह परिवार पर भी बोझ होते हैं। इसके अतिरिक्त ऐसे कमजोर व अस्वस्थ बच्चे बड़े होकर भी समाज में क्या योगदान दे पाएंगें?
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इस बार बजट में पिछले बजट की तुलना में कुछ बढ़ोतरी हुई है पर, वह भी लगभग नगण्य है। पिछले बजट में यह 3.24% था जो अब बढ़कर 3.29% हो गया है परंतु बच्चों के कल्याण के लिए और इसके क्रियान्वयन के लिए जो भी यह राशि है बहुत कम है। इस राशि से उनके स्वास्थ्य, शिक्षा व सुरक्षा की सारी योजनाएं लागू की जाएंगी।
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बच्चे यदि हमारी और शासन की जिम्मेदारी हैं तो उनका कल्याण इस राशि से तो नहीं हो पाएगा। यह विडंबना ही है कि जो बच्चे राष्ट्र की अमानत कहे जाते हैं, जो राष्ट्र की पूंजी होते हैं जो अभी से अर्थात् बालपन से ही तैयार होकर बाद में समाज व देश में अपने सुदृढ़ व्यक्तित्व से योगदान देते हैं। स्वस्थ व बलिष्ठ बच्चे किसी भी देश के वह शो पीस हैं जिन्हें देखकर पता चलता है कि यह राष्ट्र कितनी उन्नति करेगा। 

causes of child malnutrition in india problems and solutions
आंगनबाड़ी महिला कार्यकर्ता या तो समय पर जांच परख नहीं करती कि कितने बच्चे कुपोषित हैं - फोटो : फाइल फोटो

सबसे पहले तो उनके स्वास्थ्य की बात की जाए। आंगनबाड़ियां हैं, वहां पर कार्यकर्ता भी हैं जो अधिकांशत महिलाएं हैं और रखा गया था यह काम सौंपा ही इसलिए कि गया है कि महिलाएं स्वाभाविक रूप से बच्चों के प्रति स्नेहशील होती हैं व साथ ही उन्हें गर्भवती मांओं के पोषण का भी कार्य दिया गया है जिससे कि वह इन महिलाओं को गर्भावस्था में होने वाली कठिनाइयों से निजात मिल सके और इनका भी पोषण ऐसा हो कि आने वाला शिशु भी स्वस्थ हो। पर, इस योजना का भी परिणाम लगभग नहीं के बराबर है। आंगनबाड़ी महिला कार्यकर्ता या तो समय पर जांच परख नहीं करती कि कितने बच्चे कुपोषित हैं और कितनी गर्भवती महिलाएं भी कुपोषित हैं और उनमें खून की जबरदस्त कमी है।

आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की अपनी शिकायतें हैं कि मांग रखने पर भी उन्हें समय पर बच्चों के लिए आहार और दवाइयां नहीं मिलती। इसका कारण भी यहीं हैं कि इस व्यवस्था के लिए न तो धन पर्याप्त है और न ही कार्यकर्ताओं की इच्छाशक्ति मौजूद है।

यही हाल स्कूलों में दिए जाने वाले मिड-डे मील का है। इसको सप्लाई करने या बनाने वालों में यह जज्बा ही नहीं है कि वह देश की भावी पीढ़ी के लिए अपना कुछ योगदान दे रहें हैं। क्या यह सेवा देशभक्ति व देश सेवा नहीं है। क्या सीमा पर बंदूक तानकर खड़े रहना और सीमा की रक्षा करने वाले जवान ही देशभक्त हैं, और बाकी लोग क्या कर रहे हैं। घटिया कंकरों से भरा दलिया, इल्ली लगे चावल और कीड़े लगी सब्जी बनाकर बच्चों को खिलाई जा रही है। इनके लिए जिम्मेदार व्यक्तियों के लिए क्या कहा जाए-"ऐ मेरे वतन के लोगों....।"

यह समाचार  कितना चौंकाता है कि इंदौर जैसे शहर में जो एक बड़ा व्यवसायिक और व्यापारिक केंद्र के एक ही क्षेत्र में 300 से ऊपर कुपोषित बच्चे हैं। पता नहीं अन्य क्षेत्रों की भी मिलाकर संख्या कितनी होगी? यदि इसके साथ लगे गांवो में भी बच्चों का सर्वेक्षण किया जाए तो कुपोषित बच्चों की संख्या क्या हो जाएगी?

इसी तरह यदि सारे देश में सर्वेक्षण हो जाए तो इतनी बड़ी संख्या कुपोषित बच्चों की हो जाएगी कि हमारा सारा राष्ट्रीय अभिमान आहत हो जाएगा।

बच्चों के कल्याण के साथ-साथ उनकी मांओें की बात भी आनी चाहिए। बच्चों को स्वयं कुपोषित और खतरनाक स्तर के खून की कमी वाली माताएं जन्म देती हैं। इतना ही नहीं प्रति एक डेढ़ साल में कोई भी पोषण लिए बगैर शिशुओं को जन्म देती जाती हैं। कहीं कोई बाधा नहीं हैं। कैसे स्वयं कुपोषित मां एक स्वस्थ शिशु को जन्म दे सकती हैं।

इसका दोष जितना शासन पर मढ़ते हैं उससे कहीं अधिक अपने पर मढ़िए। अकर्मण्यता, वर्क कल्चर का न होना, भ्रष्टाचार की लिप्सा में आकंठ डूबे हुए अधिकारी और कर्मचारी देश के मासूम बच्चों और उनकी मांओं के साथ कैसा अन्याय कर रहें हैं? क्या वह इसका हिसाब देंगे?
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें। 

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