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क्या भारतीय महिलाएं एक बेहतर गर्भपात कानून की अपेक्षा कर सकती है?

Wed, 12 Sep 2018 04:56 PM IST
Updated Wed, 12 Sep 2018 04:56 PM IST
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Can Indian women expect a better abortion law now
गर्भपात कानून

जुलाई 2017 में भारतीय न्यायपालिका ने अपने आप को एक ऐसे दिल दहला देने वाले मामले में पाया जहां उसे एक युवा किशोरी के गर्भपात की गुहार पर फैसला देना था। वह दस वर्षीय बालिका अपने चाचाओं द्वारा बलात्कार किये जाने के कारण गर्भवती हो गयी थी।

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इस अकथनीय अपराध को समझने की उम्र भी नहीं थी उसकी, माता पिता को इसकी जानकारी देरी से प्राप्त हुई। जब उसके माता पिता पहली बार न्यायलय गये उस समय बलिका 26 सप्ताह की गर्भवती रही थी और जब तक मामला नीचे से ऊपर उच्चतम न्यायालय तक पहुंचा तब तक बलिका 30 सप्ताह की गर्भवती हो चुकी थी और चिकित्सा परामर्श पर उच्चतम न्यायालय ने आदेश दिया कि बच्ची का गर्भपात नहीं किया जा सकता।
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बच्चे को जन्म देने के कुछ सप्ताह के बाद इस मामले ने मुझे भयभीत कर दिया। साफतौर पर एक चिकित्सकीय मामले में न्यायपालिका का दखल देना दुर्भाग्यपूर्ण रुप से बढ़ गया है। हाल के वर्षों के दौरान महिलाओं और युवा बालिकाओं द्वारा 20 सप्ताह के बाद के गर्भपात के लिए न्यायालय के पास जाना आम सी बात हो गयी है-- आमतौर पर बलात्कार से होने वाले गर्भ धारण और भ्रूण संबंधि विषमताओं के मामलों में।
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मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी अधिनियम 1971 के तहत महिलाएं न्यायिक अविधि में तब ही गर्भपात करा सकती है जब महिला को गर्भधरण से जान को खतरा हो, भ्रूण की अनियमितताएं हो, बलात्कार का शिकार हो, या  फिर गर्भनिरोधक की विफलताओं के चलते हो।  हालांकि एमटीपी अधिनियम ऐसे मामलों को नहीं देखता जहां महिलाओं को भ्रूण संबंधि अनियमितताओं का पता 20 सप्ताह के बाद चलता हो या फिर वे बलात्कार के शिकार हो (अधिकतकर नाबालिग) जो शर्म और मानसिक तनाव के चलते चिकित्सक के पास देरी से आते है या फिर उन्हें पता ही नहीं चलता की उन्होंने गर्भधरण किया हुआ है।

 अविवाहित महिलाओं के लिए तो और भी अस्पष्ट रहता है जो गर्भनिरोधक की विफलता के चलते गर्भधारण कर लेती है। इसके अतिरिक्त, इस कानून को चिकित्सा विभाग से दो बार- पहले पहली तिमाही में एक बार और फिर दूसरा दूसरी तिमाही में एक बार अनुमति लेने की आवश्यकता होती है, जो कि ऐसे लोगों के लिए चुनौतीपूर्ण है जो दूरस्थ क्षेत्रों में रहते है और जहां सुविधाएं नहीं पहुंच पाती।

बदलाव की आवश्यकताओं को पहचानते हुए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा एमटीपी कानून में बदलाव प्रस्तावित किया है, जो ऊपर दी गयी रुकावटों को दूर करते है। इनमें मुख्य रुप से बलात्कार का शिकार महिलाओं को विधिवत गर्भावती को 24 सप्ताह और अनियमित भ्रूण के मामले में असीमित किया जाएगा। हालांकि इन संशोधनों को अभी अमल में नहीं लाया गया है। 

पहुंच बढ़ाने की दिशा में एमटीपी कानून में बदलाव लाना अहम कदम है। मैं अपने साथी सांसदों, सरकार और नेताओं को एकसाथ आकर काम करने और संशोधनों को त्वरित गति से अमल में लाने में और हमारी बालिकाओं और महिलाओं को इस कानून के अवरोधों से मुक्त करने का अनुरोध करती हूं।


कानून जनता को रोकने या फिर उनपर भार डालने के लिए नहीं होने चाहिए। बल्कि शोकपूर्ण घटनाओं को रोकना भी चाहिए। हमने पूर्व में अपनी बालिकाओं और महिलाओं के लिए सही और प्रगतिशील कदम उठाए है और जब सारा विश्व हमसे एक कदम पीछे रहा था। यही समय है जब हमें इसे दोहराना होगा।

कल्वकुंतला कविता
 संसद सदस्य, तेलंगाना राष्ट्र समिति

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