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कृषि वैज्ञानिकों की राय में श्री अन्न योजना कैसे चढ़े परवान

Mon, 06 Feb 2023 11:12 AM IST
Mohan singh मोहन सिंह
Updated Mon, 06 Feb 2023 11:12 AM IST
सार

अब संयुक्त राष्ट्र संघ की पहल पर 21 जून को हर साल पूरी दुनिया में योग के कार्यक्रम होते हैं। आज भारत समेत दुनिया के अधिकांश देशों में चावल और गेहूं से बना भोज्य पदार्थ ही हमारे दैनिक आहार का हिस्सा है।

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Budget 2023: In the opinion of agricultural scientists how did Shri Anna Yojana succeed
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी 2023 को बजट 2023-24 पेश किया - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

सुप्रसिद्ध इतिहासकार युवाल नोवा हरारी ने चेतावनी दी है कि आने वाले समय में लोग भुखमरी के बजाय मोटापा की वजह से ज्यादा रोगग्रस्त और मौत के शिकार होंगे। भारत में सदियों से पैदा होने वाले मोटे अनाज मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और पाचन तंत्र को दुरुस्त करने में मददगार रहे हैं। ये मोटे अनाज आमतौर पर कार्बोहाइड्रेट से मुक्त और प्रोटीन-कैल्शियम जैसे शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्वों से समृद्ध होते है।

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संयुक्त राष्ट्र ने लिया ये निर्णय

संयुक्त राष्ट्र ने भारत सरकार की पहल पर वर्ष 2023 को 'मोटे अनाज' वर्ष के रूप में मनाने का निर्णय कर मोटापा, मधुमेह और हृदय रोगियों के लिए आहार-विहार में बदलाव के जरिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता पैदा करने की सराहनीय पेशकश की है। भारत सरकार के हालिया बजट में भी 'श्री अन्न योजना' की शरुआत उस दिशा में अगला कदम है। इस साल भारत सरकार की अगुवाई में ग्रुप 20 देशों के कई सम्मेलन देश के कई शहरों में होने हैं। ग्रुप 20 के सम्मेलनों में आने वाले विदेशी मेहमानों की मेहमाननवाजी में मोटे अनाजों से बने व्यंजनों के परोसने की तैयारी मोटे अनाजों के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'ब्रांडिंग' में भी सहायक होगा।

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कोदो, सांवा, रागी, जवार-बाजरा, मड़ुआ, कुटकी, चीना और रामदाना जैसे मोटे अनाजों के उत्पादन और खपत बढ़ाने के लिए सबसे जरूरी है कि इन अनाजों के प्राकृतिक पोषण तत्वों से भरपूर फायदे के प्रति जागरूकता पैदा करना।
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बिहार पूसा इंस्टीट्यूट में जेनेटिक एंड प्लांट ब्रीडिंग की हेड प्रोफेसर श्वेता मिश्रा बताती हैं कि देश में हरित क्रांति के बाद पीढ़ी दर पीढ़ी से चली आ रही 'फूड हैबिट' में परिवर्तन लिए जागरूकता पैदा करना पहली जरूरत है। ठीक वैसे ही जैसे भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोगों में योग के प्रति जागरूकता पैदा की।

पोषक तत्वों की जरूरत

नतीजतन अब संयुक्त राष्ट्र संघ की पहल पर 21 जून को हर साल पूरी दुनिया में योग के कार्यक्रम होते हैं। आज भारत समेत दुनिया के अधिकांश देशों में चावल और गेहूं से बना भोज्य पदार्थ ही हमारे दैनिक आहार का हिस्सा है। आलम यह है कि आहार-व्यवहार में आए इन परिवर्तनों की वजह से गरीब से लेकर अमीर की थाली से प्राकृतिक पोषक तत्वों से युक्त भोज्य पदार्थ गायब होते जा रहे हैं।

इसके बजाय मोटापा को बढ़ाने वाले कार्बोहाइड्रेट से युक्त भोजन हमारे दैनिक आहार का हिस्सा हो गए हैं। इसमें चोकर रहित आटा और 'पॉलिशड राइस' खासतौर से शामिल है।आज बड़े-बड़े मॉल में बिकने वाला 'फोर्टिफाइड आटा' जिसमें बाहर से जिंक और आयरन मिलाया जाता है, उतना फायदेमंद नहीं होता। 

क्या कहती हैं प्रोफेसर श्वेता मिश्रा?

प्रोफेसर श्वेता मिश्रा बताती है कि रागी जैसे मोटे अनाज में 340 पी पी एम के करीब कैल्शियम पाया जाता है। अगर रागी से बने भोज्य पदार्थ को अपने आहार में शामिल करें तो बुढ़ापे में कैल्शियम की कमी से पैर और कमर में होने वाले दर्द से मुक्ति मिल सकती है।

सांवा और चीना में खासकर महिलाओं के खून में आयरन की कमी को दूर करने वाले कई पोषक तत्व होते हैं। चीना में प्रोटीन, जिंक और मैग्नीशियम की कमी को दूर करने वाले तत्व पाए जाते हैं। इन मोटे अनाजों में अमूमन 12% के करीब प्राकृतिक पोषक तत्व पाए जाते हैं, जिनका सेवन शरीर में रोगप्रतिरोधक क्षमता विकसित करने और मोटापा दूर करने के कुदरती गुणों के कारण खासे फायदेमंद होते हैं।

प्रोफेसर श्वेता मिश्रा का सुझाव है कि हर आदमी को कम से कम 15% तक मोटे अनाज को अपने दैनिक आहार में शामिल करने से मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और पाचनतंत्र को दुरुस्त करने में काफी हद तक सहायता मिल सकती है। एक खास बात यह भी है कि ये मोटे अनाज 'ग्लूटेन फ्री' और 'सिलियाक डिजीज' मतलब पेट की बीमारी को दूर करने में भी मददगार साबित होते हैं। 'ग्लूटेन फ्री' होने की वजह से ये अनाज दुनिया में  किसी महामारी की तरह तेजी से फैल रहे मोटापे को कम करने में  महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

प्रोफेसर श्वेता मिश्रा बताती हैं कि दूसरी जरूरत है इन मोटे अनाजों को दैनिक आहार का हिस्सा बनाने के लिए 'वैल्यू एडिशन' की। आज की युवा पीढ़ी में 'जंक फूड' खाने का रिवाज तेजी से बढ़ता जा रहा है। डिब्बा बन्द और फ्रीज में रखे भोजन उनके दैनिक आहार में शामिल हैं।

पिज्जा, बर्गर और पाश्ता इस पीढ़ी के नौजवानों का पसंदीदा भोजन है। जाहिर है कि वे ज्वार और बाजरा की रोटी के बजाय पिज्जा, बर्गर, पाश्ता और चाउमीन को ज्यादा स्वास्थ्यकर भोजन मानते हैं। इसलिए उनके 'फूड हैबिट' में बिना किसी छेड़छाड़ के इन भोज्य पदार्थों को मैदा, सूजी के बजाय मोटे अनाजों से तैयार करने की विधि विकसित करने की जरूरत है।

Budget 2023: In the opinion of agricultural scientists how did Shri Anna Yojana succeed
सरकार को किसानों के सुरक्षा कवच के रूप में और इन अनाजों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए भी न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारन्टी भी सुनिश्चित करना चाहिए। - फोटो : अमर उजाला

प्रोफेसर श्वेता मिश्रा का यह भी सुझाव है कि इन मोटे अनाजों की पैदावार और खपत वाले इलाके की पहचान के साथ-साथ परम्परागत तकनीक से हटकर नई तकनीक का ईजाद करना भी उतना ही जरूरी है। हरित क्रांति के पहले भारत में इन मोटे अनाजों की पैदावार 20% के करीब थी, जो अब घटकर 6% ही रह गई है। इसलिए भारत को मोटे अनाजों का 'हब' बनाने के लिए जरूरी है कि उन इलाकों की पहचान की जाए और उसे उत्तर प्रदेश की तरह 'वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट' की तरह विकसित करने की योजना तैयार कीजाए।

क्या हैं चुनौतियां?

मसलन उड़ीसा, तेलंगाना, झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और गुजरात के आदिवासी बहुल वे इलाकों में जहां बरसात कम होती हैं। इन अनाजों की पैदावार के लिए सर्वथा उपयुक्त हो सकते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार के गंगा, घाघरा और गंडक के इलाके में आज भी इन अनाजो की अच्छी पैदावार होती है। पर पैदावार के बाद इन अनाजों के 'प्रॉसेसिंग' की समस्या भी कम विकट नहीं है। गांवों में अब ओखल, मूसल, जाता और ढेंकी चलाने वाली औरतें लगभग नहीं के बराबर है। इसके बिना आज देशज तकनीक से इन अनाजों से अन्न निकालने में खासी मुश्किलें होंगी।

मसलन सांवा और कोदो जैसे अनाजों में अन्न के ऊपर 'सात लेयर' होती हैं। ऐसे में जब जाता और ढेंकी गांवों से गायब है। फिर किसान इन अनाजों के उत्पादन के प्रति उदासीन भी हो सकते हैं। प्रोफेसर श्वेता मिश्रा बताती हैं कि हाल ही में पूसा इंस्टीट्यूट ने इन इन मोटे और छोटे अनाजों के छिलके हटाने के लिए एक यूनिट तैयार की है। अब इसका पेटेंट भी हो चुका है। उम्मीद है कि यह यूनिट 'कॉस्ट इफेक्टिव' भी होगी और शीघ्र ही बाजार में उपलब्ध हो जाएगी।

क्या उठाने चाहिए सरकार को कदम?

सरकार को किसानों के सुरक्षा कवच के रूप में और इन अनाजों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए भी न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारन्टी भी सुनिश्चित करना चाहिए। बताते चलें कि न्यूनतम समर्थन मूल्य के तहत सरकार 22 तरह के अनाजों का समर्थन मूल्य घोषित करती है और महज 6% अनाजों की सरकारी खरीद ही सम्भव हो पाती है।

इसके अलावा इन अनाजों की खपत बढ़ाने के लिए गरीब कल्याण योजना के तहत सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए दिए जाने वाले अनाजों में भी शामिल करना होगा। आंगनबाड़ी केंद्रों से वितरित होने वाले पौष्टिक अनाजों में भी इसे शामिल किया जा सकता है।

साथ ही इन अनाजों की खपत बढ़ाने के लिए जरूरी है कि केन्द्रीय और राज्य सरकारों के कैंटीन और निजी कैंटीनों में भी इन अनाजों के सेवन से स्वास्थ्य में होने वाले फायदे के बारे में 'मिशन मोड' में जागरूकता अभियान चलाना होगा। जिन इलाकों में इन अनाजों की पैदावार हो सकती है, वहां बीज बैंक और प्रोसेसिंग यूनिट भी तैयार करनी होगी, ताकि किसानों को इन अनाजों के बीज आसानी से उपलब्ध हो सके।

इन प्रयासों से उम्मीद की जानी चाहिए कि हाल तक गरीबों का पेट भरने वाले इन विश्वामित्री मोटे अनाजों को आजादी के अमृतकाल में ही सही उचित गौरव और गरिमा हासिल होगी। तब शायद ये मोटे अनाज यह बहाना और शिकायत न करें कि "नहीं हम मंडी नहीं जाएंगे। खलिहान से उठते हुए कहते हैं दानें। जाएंगे तो फिर लौट कर नहीं आएंगे। जाते-जाते कहते दानें। अगर लौटकर आएंगे, तो तुम हमें पहचान नहीं पाओगे।" (केदारनाथ सिंह)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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