26 नंबर विधानसरणी: जहां पड़ी जनसंघ की नींव, श्यामा प्रसाद को यहीं मिले अटल-दीन दयाल
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पहली बार 1980 में 2 सीटों के साथ शुरू हुआ यह सफर आज दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूप (2021 में 303 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी) में देश की सेवा कर रही है, जिसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं।
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पहली बार 1980 में 2 सीटों के साथ शुरू हुआ यह सफर आज दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूप (2021 में 303 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी) में देश की सेवा कर रही है, जिसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं।
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देश और दुनिया के लोग उत्तर कोलकाता को भारतीय वेदांत दर्शन को दुनियाभर में फैलाने वाले रामकृष्ण परमहंस के परम शिष्य स्वामी विवेकानंद के जन्मस्थान के रूप में पहचानते हैं। इस स्थान की एक और पहचान है। वह है, स्वामी विवेकानंद के पैतृक वासगृह से चंद कदम की दूरी पर स्थित प्रज्ञा मंदिर।
दरअसल, पहले यह 26 नंबर विधानसरणी के नाम से विख्यात थी। यह वह स्थान है, जो करीब एक सदी का इतिहास अपने में समाए हुए है। आजादी से पहले और बाद में जब-जब देश को राजनैतिक हो या सामाजिक क्षेत्र में सेवा की जरूतर पड़ी, 26 नंबर विधानसरणी ने अग्रणी भूमिका निभाई। बाहर से देखने पर बहुत ही साधारण है यह भवन लेकिन आज भी उसमें किसी तरह का परिवर्तन नहीं हुआ है। शायद यह कोलकाता का एक मात्र भवन है, जिसकी सीढ़ियां आज भी काठ (लकड़ियों) की हैं।
एक पार्टी की यात्रा की शुरुआत
यहां प्रवेश के लिए एक छोटा सा गेट है। घुमावदार सीढ़ियों से होते हुए जब आप ऊपर चढ़ते जाते हैं, तो दीवारों पर देश के महान शहीदों से आपका सामना होता है। जैसे-जैसे आप ऊपरी मंजिल की ओर बढ़ते जाते हैं, सकारात्मक ऊर्जा से आप भरते जाते हैं। दूसरी मंंजिल पर एक बृहद पुस्तकालय आपका स्वागत करती है। जहां हैं, तीन लकड़ी की टेबल और लकड़ी की कुछ कुर्सियां।
यह वह स्थान है, जहां 1940 में पूर्व भारत का प्रथम विरासती कार्यालय 'माधव स्मृति' की स्थापना हुई थी। तबसे लेकर यह मातृभूमि की सेवा में सतत लगी हुई। यह वह स्थान है, जहां द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी माधव सदाशिव गोलवरकर के मार्ग-दर्शन और प्रेरणा से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की चालीस से अधिक प्रकल्पों को मूर्त रूप मिला। नोआखाली के दंगा पीढ़ितों को यहां आश्रय मिला था। यहीं बैठकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी देश के भविष्य की रणनीति बनाते थे।
यहीं पर खड़े होकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भारत की सनातन विचारधारा को युगानूकुल रूप में प्रस्तुत करते हुए देश को 'एकात्म मानववाद' पर लगातार चार दिनों तक संबोधित किया था। यह वही जगह है, जहां पर श्रीगुरुजी की प्रेरणा से कन्या कुमारी में संघ के सरकार्यवाहक एकनाथ रानडे के मार्ग-दर्शन में विवेकानंद स्मृति शिला की बीज पड़े थे। इनके साथ-साथ यह वही स्थल है जहां श्रीगुरुजी की प्रेरणा से डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की स्थापना की थी।
प्रज्ञा प्रवाह के पूर्व क्षेत्रीय संयोजक अरविंद दास, एक कमरे की ओर इशारा करते हुए बताते हैंं-
यह वही कमरा है, जहां बैठकर द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के आग्रह को सुना था। वे बताते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के कैबिनेट में मंत्री रहे, श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नेहरू के साथ कश्मीर में धारा 370 को लेकर मतभेद होने पर उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। लेकिन श्यामा प्रसाद मुखर्जी देश के लिए कुछ करना चाहते थे। वे किसी ऐसे व्यक्तित्व की तलाश कर रहे थे जो उनका मार्ग-दर्शन और प्रेरणा दे सकें।
किसी ने उन्हें श्रीगुरुजी के बारे में बताया। इसके बाद पहली बार 1950 में श्याम प्रसाद मुखर्जी, इसी 26 नंबर विधानसरणी में आए और श्रीगुरुजी से मिले। श्यामा प्रसाद से मिलने और उनकी बातों को सुनने के बाद श्रीगुरुजी ने उनकी मदद करने की ठानी। श्रीगुरु जी को स्वामी विवेकानंद जी की वह कथन याद हो आया जिसमें उन्होंने कहा था, किसी भी कार्य की पूर्णता के लिए अंग्रेजी के 'तीन एच' की जरूरत होती है।
श्यामा प्रसाद के पास दो एच हैं यानी एच (हैड, मस्तिष्क) और दूसरा एच (हार्ट यानी ह्रदय) तो थे लेकिन उनके पास तीसरे एच यानी (हैंड, हाथ) नहीं हैं। तब श्रीगुरुजी ने इसी कमरे में बैठकर श्यामा प्रसाद जी की मदद की ठानी।
उन्होंने तुरंत राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की सेवा कर रहे, पंडित दीन दयाल उपाध्याय और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को बुलाया, साथ बैठे प्रज्ञा प्रवाह के पूर्व क्षेत्र के संपर्क प्रमुख डॉ. आनंद पांडेय ने पुस्तकालय, जहां लकड़ी की टेबल और कुर्सियां हैं की ओर इशारा करते हुए कहा, यहीं पर पहली बार श्रीगुरुजी ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को पंडित दीन दयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी के रूप में दो हाथ दिए थे।
यहीं पर 1951 में एक नई राजनीतिक पार्टी भारतीय जनसंघ की नींव रखी गई और पार्टी का चिन्ह रखा गया दीपक। इसके बाद 1952 में पहली बार श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में भारतीय जनसंघ ने चुनाव लड़ा और तीन सीटें जीतीं, जिनमें से एक सीट पर स्वयं श्यामा प्रसाद मुखर्जी विजयी हुए थे। इसके बाद जनसंघ ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
कालांतर में बलराज मधोक, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी भी इसके अध्यक्ष रहे। इस बीच, 1975 और 76 में देश एक गंभीर राजनीतिक संकट में पड़ गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर दिया। देशभर की विरोधी राजनीति पार्टियों के नेताओं को जेल में डाल दिया गया।
इस संकट से देश को उबारने के लिए कई राजनीतिक पार्टियों ने मिलकर 1977 में जनता पार्टी का गठन किया और उसके नेतृत्व में चुनाव लड़ा, जिसमें पहली बार राम और बाम एक साथ आए और भारी मतों से विजयी हुई। जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार में मोरारजी देसाई 1977 से 1979 तक प्रधानमंत्री रहे।
इसके बाद 1979 से 80 तक चौधरी चरण सिंह जनता पार्टी के प्रधानमंत्री रहे। लेकिन आंतरिक मतभेदों के चलते 1980 में जनता पार्टी टूट गई। भारतीय जनसंघ के रूप में जनता पार्टी में शामिल हुई, एक पार्टी भारतीय जानता पार्टी के रूप में बाहर आई। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 1980 में भारतीय जनता पार्टी की नींव रखी गई और उसका चुनाव चिन्ह रखा गया कमल।
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अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पहली बार 1980 में 2 सीटों के साथ शुरू हुआ यह सफर आज दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूप (2021 में 303 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी) में देश की सेवा कर रही है, जिसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं।