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सविता देवी जयंती विशेष: संगीत प्रेम की भांति शाश्वत् है, यह कल था आज है और कल भी रहेगा

Tue, 07 Apr 2020 11:07 AM IST
Meenakshi Prasad मीनाक्षी प्रसाद
Updated Tue, 07 Apr 2020 11:07 AM IST
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birth anniversary of renowned classical vocalist savita devi
गायिका सविता देवी का जन्म बनारस में 7 अप्रैल 1940 को हुआ था। उनकी मां प्रसिद्ध हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत गायिका थीं। - फोटो : सोशल मीडिया

आज सम्पूर्ण विश्व में कोविड- 19 कोरोना वायरस की दहशत फैली हुई है। इस हालात में सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रीय लोगों की भी पूरी जिम्मेवारी बनती है कि वे कला के जरिए लोगों को मनोवैज्ञानिक रूप से सबल बनाएंं। हमें स्वच्छता और सफाई का पूरा ध्यान रखते हुए अपने आपको सकारात्मक और रचनात्मक दिशा में अपने ध्यान को आकृष्ट करने की जरूरत है।

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यकीनन ऐसा करके हम भय और चिन्ता की मन:स्थिति से बाहर निकल पाएंंगे और अपने अन्दर मजबूती और नई ऊर्जा महसूस करेंगे। आपके पास एक लक्ष्य होगा कि इन दिनों में हमें अपने व्यक्तित्व के अन्य आयामों को भी विकसित करना है।
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शायद ऐसा मौका जिंदगी में उम्र के इतने ऊर्जावान अवस्था में फिर ना मिल पाए। आज आप सभी को मैं एक ऐसे व्यक्तित्व से मिलवाने जा रही हूंं जो किसी परिचय का मोहताज नहीं- तो लीजिए ये हैं बनारस घराने की ठुमरी साम्राज्ञी स्वर्गीया विदुषी सविता देवी।

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कोयल सी मधुर आवाज वाली स्वर्गीया विदुषी सविता देवी जब मंच पर आती थीं तो श्रोतागण दिल थाम लेते थे। खूबसूरत बनारसी साड़ी, माथे पर सजी बड़ी लाल बिंदी और बड़े ही तहजीब से पहने गए आभूषण मानों अपनी किस्मत पे इतरा रहे हों। हर कार्यक्रम की शुरुआत वो 


गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः से करतीं।

हमेशा कहतीं कि गायन की शुरुआत अपने आप को अहम् से मुक्त करके गुरु के चरणों में झुक कर ही शुरू करना चाहिए। सविता देवी एक मितभाषिणी और मृदुभाषिणी महिला थीं। जब वो मंच पर उपस्थित होतीं तो उनके दिव्य रूप को देखकर दर्शक मंत्र मुग्ध हो जाते और जब उनकी कोयल सी कूकती आवाज कानों से हृदय में उतरती तो सम्मोहित हो जाते। विरले कलाकारों को ही ये दोनों चीजें ईश्वर सौगात में देता है।

birth anniversary of renowned classical vocalist savita devi
सविता देवी: संगीत में वे गंगा-जमुनी तहज़ीब को बड़ी खूबसूरती से निभाती थीं। - फोटो : सोशल मीडिया

7 अप्रैल 1940 को ठुमरी साम्राज्ञी पद्मश्री स्वर्गीया सिद्धेश्वरी देवी ने काशी में अपनी द्वितीय पुत्री सविता देवी को जन्म दिया। ज़ाहिर है संगीत की तालीम उन्हें गर्भ से ही मिल रही थी। दो वर्ष की उम्र में वे अपनी मां के तानपुरे के तुंबे पर बैठकर खेलती थीं। संगीत उनके रगों में बहता था। उनके शयन कक्ष की दीवार और बनारस घराने के संगीत के हस्ताक्षर स्वर्गीय बड़े रामदास जी के कमरे की दीवार बिलकुल अगल-बगल थी, तो रोज सुबह सविता जी बड़े रामदास जी का गायन सुनकर उठती थीं। 

बचपन से संगीत उनके कानों में भर रहा था। बड़ा ही भाग्यशाली था उनका बचपन। हिन्दुस्तान के लगभग सभी बड़े कलाकार उनके घर आते थे और उनके घर संगीत की महफिल सजती थीं। उनकी तालीम अपनी मां और गुरु विदुषी सिद्धेश्वरी देवी की देख-रेख में हुई। उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से वाद्य यंत्र 'सितार' में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की और वे पंडित रविशंकर जी की अग्रणी शिष्या थीं। 

लगभग 30-35 वर्षों तक वे दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलतराम कॉलेज में संगीत की विभागाध्यक्ष रहीं।  ठुमरी, दादरा, चैती, बारहमासा, कजरी, होरी, वे बड़ी सरलता, मिठास और खूबसूरती से गाती थीं। उनकी ठुमरी की बढ़त मन मोह लेती थी और दादरे के दोहे व शेरों- शायरी इतने प्रासंगिक होते थे कि क्या बताऊं? '

सब बन अमवा बहुर ना हो रामा सैंय्या घर नाहीं' चैती।

जब वे गाती तो श्रोताओं को 'सैंय्या घर नाहीं' कहने के अंदाज से खंडिता नारी के व्यक्तित्त्व का अहसास हो जाता था, या होली गा रही हों " होली मैं खेलूंगी श्याम से डटके" तो नायिका का दृढ़ और सबल व्यक्तित्त्व स्पष्ट रूप से श्रोताओं के सामने उभर कर आता था। 

सविता देवी कृष्ण भक्त थीं। कृष्ण से संबंधित कोई भी ठुमरी, दादरा, होली, झूला गाते समय कभी राधा की भूमिका में दिखतीं तो कभी राधा- कृष्ण की दासी बन जातीं और कभी एक गोपी के रूप में गाती रहतीं। अद्भुत था उनका व्यक्तित्त्व। 

उनके सानिध्य में जो भी आया धन्य हुआ। सन् 2005 में ' गंगा दशहरा' के दिन मैं उनकी 'गंडाबंध' शिष्या बनीं। और उस दिन से मेरी ठुमरी की तालीम शुरू हुई। इनकी छांव में ना जाने कितनी शिष्याएं पल रही थीं। इनकी सोहबत में रहनेवाली हर शिष्या को संगीत कला के ज्ञान के साथ- साथ एक कलाकार के रहन-सहन, बातचीत का तरीका और उठना-बैठना सब आ जाता था। मंच पर कैसे प्रस्तुति देनी है? वे हर आयाम को बड़े गौर से देखतीं और उसे परिमार्जित करतीं। 

सविता देवी एक समदर्शी महिला थीं। हर शिष्या को उनसे अथाह प्रेम मिला। अमूमन शिष्याएं और अन्य जानने वाले उन्हें "दीदी", गुरु मां या गुरु जी संबोधित करते थे परन्तु मैं उन्हें 'मां' बुलाती थी। उन्होंने गुरु के साथ-साथ एक मां की भूमिका भी अदा की। वे हम सबों के पति-बच्चों से भी बहुत ज्यादा जुड़ी हुई थीं। हम सब एक परिवार की तरह थे। अतिश्योक्ति नहीं होगी यदि मैं कहूं कि हम सभी शिष्याएं उनकी संगीत की साधना और तपस्या से जन्मीं पुत्रियां थीं। 

संगीत में वे गंगा-जमुनी तहज़ीब को बड़ी खूबसूरती से निभाती थीं। जहां एक ओर वो तुलसीदास, मीराबाई, सूरदास के भजन तल्लीनता से गाती थीं वहीँ दूसरी ओर वे खुसरो, बाबा बुल्लेशाह और रसखान जैसे सूफियों की वाणी भी पूरी तरह डूब कर गाती थीं। 

ठुमरी गाते वक़्त कहतीं- इस शैली को गाने का कोई शॉर्टकट नहीं है। सीखने के लिए लगन, सहनशीलता, वक़्त और गुरु के प्रति समर्पण चाहिए। परम्परागत् बंदिशों की मौलिकता से छेड़छाड़ उन्हें पसंद नही थी। कहतीं नयापन चाहिए तो नई चीज बनाओ और गाओ। कहतीं गुरु का ज्ञान नदी की धारा की भांति है अर्थात् सब के लिए एक समान। जो जैसा पात्र लाएगा उसे उतना ही ज्ञान रूपी जल मिलेगा। वे संगीत के साथ साहित्य भी सिखाती थीं। 

एक बार उन्होंने कहा कि गुरु-शिष्य परम्परा अविराम चले तो संगीत की गरिमा कायम रहेगी क्योंकि संगीत एक गुरुमुखी विद्या है। तुम सबों के संगीत और शास्त्र ज्ञान की बड़ाई ही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि और पारितोष है। संगीत प्रेम की भांति शाश्वत् है- यह कल था आज है और कल भी रहेगा। बस इसकी मौलिकता को बचाकर रखना तुम लोगों की जिम्मेदारी है।

हमेशा कहतीं ठुमरी भाव प्रधान शैली है और इसके भावों को संवाद के जरिए ही व्यक्त किया जा सकता है अर्थात् विभिन्न प्रकार के उपयुक्त बढ़त के उपयोग से ही किया जा सकता है, जिस प्रकार 'ख्याल' का ख्याल पहले दिमाग में आता है फिर दिल तक जाता है उसी प्रकार 'ठुमरी' पहले दिल में जगह लेती है और फिर दिमाग में आती है। ठीक उसी प्रकार जैसे पुरुष किसी चीज को दिमाग से सोचता है और स्त्रियां दिल से, इसीलिए ख्याल पुरुष प्रधान और ठुमरी स्त्रीप्रधान गायन शैली है। 

पिछले वर्ष अर्थात ् 20 दिसम्बर 2019 को दिन के 11-15 मिनट पर  उन्होंने अंतिम सांस ली और अपनी शिष्याओं के साथ अपने पुत्र, पुत्रवधु और दो पौत्र को पीछे छोड़ गईं। उनके बारे यह लिखना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी- 

मांं सिद्धेश्वरी ने सिद्ध किया। 
अद्भुत स्वर की थी दुहिता। 
वर पाया वीणापाणि से 
थीं दिव्य रूप देवी सविता। 

तो  अब आप सभी से मेरा अनुरोध है कि आप सभी अपने स्वास्थ्य का पूरा ख्याल रखें और किसी भी तरह के अवसाद को अपने जीवन में स्थान नहीं दें। सावधान रहने की जरूरत है ना कि अपने को उस विचार में डुबोने की। इस तरह के व्यक्तित्त्व से हमें प्रेरणा लेनी चाहिए। 80 वर्ष की उम्र में भी इतनी सक्रीय थीं वे।

हमें भी घर में रहने के इस अवसर को व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करके अपने अंदर से एक नए इंसान को निकालने की जरूरत है। मैं आपके और अपनी तरफ से चिकित्सकों, नर्सों, सेना के जवानों और पुलिस कर्मियों के अच्छे स्वास्थ्य की दुआ करते हुए अपनी लेखनी को विराम देती हूं। 

शोधकर्ता, लेखिका और गायिका मीनाक्षी प्रसाद संगीत के बनारस घराने से ताल्लुक रखती हैं। इस समय सिद्धेश्वरी देवी एकेडमी ऑफ हिंदुस्तानी म्यूजिक नई दिल्ली से जुड़ी हुई हैं। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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