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Bihar Caste Census 2023: लोकसभा चुनावों पर क्या होगा असर?

Wed, 04 Oct 2023 05:54 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Wed, 04 Oct 2023 05:54 PM IST
सार

इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में गैरकानूनी कार्यों को छोड़कर सबके लिए कोई भी कार्य करने की छूट है। यह सही है कि समाज में बहुत सारे मानव समूह जिन्हें आप जातियां या उपजातियां कह सकते हैं, अब भी संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र का नागरिक होने का फल नहीं चख पा रही हैं, इसलिए जब तक सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से अत्यन्त पिछड़ी इन जातियों की पहचान नहीं होगी तब तक उन्हें मुख्यधारा तक लाने के प्रयास कामयाब नहीं होंगे। पिछड़ी जातियों में भी जो सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक दृष्टि से पिछड़ी नहीं रह गई उन्हें हटाए बिना अत्यधिक पिछड़ो का भला नहीं हो सकता।

 

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पहले सपा और राजद जैसे कुछ दल ही जातीय आधार पर जनगणना के पक्षधर माने जाते थे, लेकिन इंडिया के बैनर तले समूचा विपक्ष जातीय गणना के साथ खड़ा हो गया है। - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

बिहार की नीतीश कुमार सरकार द्वारा जारी किए गए जातीय गणना के आंकड़ों ने फिलहाल देश में हलचल तो मचा ही दी है। कारण साफ है। देश का सामाजिक तानाबाना लगभग एक जैसा है और समाज के साथ ही शासन प्रशासन में अगड़ी जातियों का वर्चस्व जगजाहिर है। यही अगड़ा वर्ग देश की राजनीति को भी दिशा देता है।

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बिहार की गणना में पिछड़ा वर्ग और अति पिछड़ों को मिलाकर उनका कुल योग 63.13 प्रतिशत हो रहा है और उनके साथ अगर मुसलमानों की 17.7 प्रतिशत आबादी मिला दी जाए तो वह 80.83 प्रतिशत हो जाती है।
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पहले सपा और राजद जैसे कुछ दल ही जातीय आधार पर जनगणना के पक्षधर माने जाते थे, लेकिन इंडिया के बैनर तले समूचा विपक्ष जातीय गणना के साथ खड़ा हो गया है, क्योंकि भाजपा के हिन्दुत्व के ब्रह्मास्त्र के आगे विपक्ष के पास यही एक अमोघ शस्त्र बचा था जो उसने तरकश से निकाल लिया। अब पक्ष और विपक्ष की तैयारियों से साफ जाहिर है कि 2024 का चुनाव देश के सामने खड़ी ज्वलंत चुनौतियों और जनता की आकांक्षाओं तथा अपेक्षाओं को लेकर नहीं बल्कि धर्म और जातियों के नाम पर लड़ा जाएगा।

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बिहार के बाद कर्नाटक की बारी

बिहार सरकार द्वारा विवादित जातीय गणना के नतीजे सार्वजनिक किए जाने के बाद अब कर्नाटक की सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार की बारी है।  कर्नाटक में एच. कंथाराज के नेतृत्व में आयोग ने 2015-16 में सर्वेक्षण किया था। सिद्धारमैया पर सबसे अधिक अपनी ही पार्टी का दबाव होगा, क्योंकि जातीय गणना को लेकर संसद से लेकर सड़क तक सबसे अधिक मुखर कांग्रेस पार्टी नजर आ रही है।

 

कर्नाटक में दो प्रमुख जातीय समुह लिंगायत- वीरशैव और वोक्कालिंगा हैं, जिनकी जनसंख्या क्रमशः 14 और 11 प्रतिशत बताई जाती है। लेकिन ये दोनों ही जातीय गणना के विरोध में हैं। दोनों समुदायों का दावा है कि उनकी संख्या रिपोर्ट में लीक हुए आंकड़ों से कहीं अधिक है। अगर कर्नाटक ने भी आंकड़े सार्वजनिक कर दिए तो फिर मोदी सरकार पर भी दबाव बढ़ेगा।


यूपीए की मनमोहन सिंह सरकार ने लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव जैसे ओबीसी नेताओं के दबाव में 2011 में ‘‘सोशियो-इकनॉमिक कास्ट सेंसस’’ कराने का फैसला लिया था। यह गणना 2013 में पूरी भी हो गई थी। इसके जरिए जुटाए गए डाटा के आधार पर एक फाइनल रिपोर्ट तैयार होनी थी, मगर 2014 में सरकार बदल गई। फिर 2015 में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि जल्द ही जातिगत जनगणना के आंकड़ों को जारी किया जाएगा जो कि अब तक नहीं हुए। इन आंकड़ों के सार्वजनिक होने की कोई संभावना भी नहीं है। कारण विपक्ष के इस दांव से भाजपा के हिन्दू वोट बैंक के बिखरने का खतरा उत्पन्न हो गया है।

 

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बिहार जाति जनगणना रिपोर्ट - फोटो : AMAR UJALA

प्रगति के सभी अवसर अगड़ों ने लपक लिए?

धर्म की ही तरह जाति भी हिन्दू समाज की सच्चाई है जिसे नकारा नहीं जा सकता। हालांकि फोटो खिंचाने के लिए चाहे आप किसी दलित के घर खाना खाने चले जाएं मगर उस दलित से बेटी का रिश्ता शायद ही करना चाहें।

जातियां व्यक्ति विशेष की पहचान भी होती हैं इसलिए लोग अपने नाम के आगे अपनी जाति का भी उल्लेख करते हैं। इसके साथ ही यह भी एक सच्चाई है कि समाज में कुछ जातियां वास्तव में सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक तौर पर बहुत पिछड़ी रह गईं। आजादी के बाद भी तरक्की के अवसर मुट्ठीभर अगड़ी जातियों ने लपक लिए।

यहां तक कि पिछड़ी जातियों में भी जो अगड़ी जातियां थीं उन्होंने तरक्की के अवसरों को अत्यन्त पिछड़े लोगों तक  पहुंचने से पहले हथिया लिया। इसका जीता-जागता उदाहरण हमारे सामने कुछ जनजातियां हैं जिनकी शासन-प्रशासन तक पहुंच हो गई जबकि अण्डमान निकोबार की जातियों तक प्रगति के अवसरों पहुंचना तो रहा दूर उनका अपना अस्तित्व ही गंभीर खतरे में है, इसलिए समाज की अंतिम पक्तियों पर बैठे लोगों की बात करना या उनकी व्यथा कथा को आवाज देना हर भारतीय का कर्तव्य है।
 

जाति के आधार पर व्यवसाय छूट रहे हैं-

कोई भी इंसान जाति या धर्म का टैग लगाकर पैदा नहीं होता है। मनुष्य के पैदा होने के बाद उस पर हिन्दू-मुसलमान या अगड़ी-पिछड़ी जाति का लेबल लगाया जाता है। प्राचीन काल में भी जातियां कर्म के अनुसार तय होती थी। यहां तक कि सनातन धर्मावलम्बियों के अनुसार मानव जाति के पहले संविधान और धर्मशास्त्र ‘‘मनुस्मृति’’ में मनुष्यों के जिन चार वर्णाे का उल्लेख है उनका वर्गीकरण उनके कर्म के आधार पर किया गया है। (हालांकि लोग विभेदकारी उस मनुवादी वर्ण व्यवस्था की मुखालफत करने लगे हैं) चूंकि पैतृक व्यवसाय अपनाना भी एक परम्परा रही है और उसके लिए लोगों को वैसे ही दीक्षा और संस्कार मिलते रहे हैं, इसलिए पुश्तैनी व्यवसाय पीढ़ी दर पीढ़ी चलते रहे।


अब व्यवसाय में बदलाव तो आ रहा है मगर पुरखों से विरासत में मिली जातियां पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही हैं। चूंकि तब समाज और राजे महाराजाओं की शासन व्यवस्था जातियों के आधार पर चलती थी। कोई जाति रक्षा की जिम्मेदार थी तो कोई कोष की और कोई प्रशासन की जैसी अन्य जिम्मेदारियां संभालती थी। लेकिन आज संविधान ही शासन प्रशासन चलाता है। हां ! आज भी कुछ लोग जाति के आधार पर कार्य कर रहे हैं अन्यथा जातियों के आधार पर कर्म का निर्धारण का प्राचीन सिद्धान्त लगभग निरर्थक हो चुका है।
 

इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में गैरकानूनी कार्यों को छोड़कर सबके लिए कोई भी कार्य करने की छूट है। यह सही है कि समाज में बहुत सारे मानव समूह जिन्हें आप जातियां या उपजातियां कह सकते हैं, अब भी संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र का नागरिक होने का फल नहीं चख पा रही हैं, इसलिए जब तक सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से अत्यन्त पिछड़ी इन जातियों की पहचान नहीं होगी तब तक उन्हें मुख्य धारा तक लाने के प्रयास कामयाब नहीं होंगे। पिछड़ी जातियों में भी जो सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक दृष्टि से पिछड़ी नहीं रह गई उन्हें हटाए बिना अत्यधिक पिछड़ो का भला नहीं हो सकता।


जातीय गणना की सटीकता पर सवाल

जातीय गणना से जुड़े सामाजिक बदलाव वाले दूसरे पहलू पर भी चर्चा की जानी चाहिए जो कि नहीं हो रही है, जिस 1931 की अंतिम जातीय गणना का बार-बार उल्लेख हो रहा है उसमें स्वयं इस तरह की गणना की सटीकता और प्रासंगिकता पर सवाल उठाए गए हैं, शायद इसीलिए 1931 के बाद अंग्रेजों ने भी जातीय गणना कराने की जरूरत नहीं समझी।

जॉन हेनरी हट्टन के नेतृत्व में कराई गई उस जनगणना रिपोर्ट के वॉल्यूम-एक भाग-एक के पैरा 182 से आगे जातीय गणना पर कई संशय उठाए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ प्रदेशों में एक जाति स्वयं को ब्राह्मण दर्ज कराती है तो दूसरे राज्य में उसी नाम की जाति स्वयं का राजपूत बताती है। यही नहीं 1921 की जनगणना में कुछ जातियों ने स्वयं को राजपूत बताया था, लेकिन 1931 में उन्होंने स्वयं का ब्राह्मण दर्ज कराया है।


ऊंची जातियों में विलीन हो रही पिछड़ी जातियां

सन् 1931 की जनगणना में जातीय ग्रुपिंग का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि चार वर्णों में ब्राह्मण को श्रेष्ठ माना गया इसलिए कुछ जातियों ने स्वयं को ब्राह्मण बताना शुरू किया। इसी तरह दूसरे क्रम की क्षत्रिय जाति में तीसरे क्रम की और चौथे क्रम की जातियां शामिल होने लगी। रिपोर्ट में संयुक्त प्रान्त की एक अनुसूचित जाति के लोगों का उल्लेख भी किया गया है जिसने स्वयं को सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी राजपूत के तौर जनगणना में दर्ज कराया है।

दरअसल, आज समाज में जिस तेजी से बदलाव आ रहे हैं उसी तेजी से जातियों का आपस में संविलयन भी हो रहा है। लव जेहाद रटने वाले चाहे जो बोलें, मगर अब युवावर्ग वर्ण व्यवस्था और मजहबी सीमाओं को लांघ कर बेधड़क मनचाही लडक़ी या लड़के से विवाह कर रहे हैं।

यह एक सामाजिक समरसता के लि, जरूरी प्रक्रियाभी है। सवर्णाें की पिछड़ी जातियां भी अगड़ी जातियों के समूह में विलीन होती जा रही हैं। इसलिए सभी राज्यों और सभी क्षेत्रों में पिछ़डी़ जातियों का चिन्हीकरण उतना आसान नही होगा। 

समाज के भड़कने की चिन्ता भी जरूरी

वोटों के लिए धर्म के आधार पर समाज को बांटने कर नतीजा हम देख ही रहे हैं। लेकिन अब जातियों के नाम पर सामाजिक बंटवारे की नौबत मुंहबाए खड़ी हो गई है। नब्बे के दशक में मंडल आयोग विरोधी आन्दोलन में कम से कम 159 युवाओं ने आत्महत्या की कोशिश की थी और राजीव गोस्वामी समेत 63 युवाओं ने आत्मदाह जैसे तरीकों से विरोध प्रकट करने के लिए आत्महत्या कर ली थीं। जबकि उसके बाद भी आरक्षण के लिए उग्र आन्दोलन होते रहे हैं जिनमें सबसे उग्र सन् 2016 का जाट आरक्षण आन्दोलन था।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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