बिहार विधानसभा चुनाव का लेफ्ट-राइट और नॉर्थ-साउथ
इस बार के बिहार चुनाव में जहां पिछले चुनाव के मुकाबले अमूमन हर पार्टी की सीटें घट गईं, वहीं भाजपा, वाम दल और एमआईएम की सीटें बढ़ गईं। यह बड़ा दिलचस्प संकेत है और इससे एक बात समझ में आती है कि बिहार की राजनीति सेंटर से हट रही है और एक तरफ राइट को मजबूत कर रही है, तो दूसरी तरफ लेफ्ट को। क्या ये नतीजे यह कह रहे हैं कि विचारधाराओं की जंग के इस दौर में मध्यम मार्गीय सोच रखने वाले और सबको साथ लेकर चलने वाले राजनीतिक दलों के दिन बीत रहे हैं?
वहीं एक दूसरी बात यह हुई कि इस बार जनसमर्थन को लेकर भी बिहार दो हिस्सों में बंटा नजर आया, दक्षिण बिहार ने बदलाव के पक्ष में महागठबंधन को भरपूर समर्थन दिया तो लगभग पूरा उत्तर बिहार एनडीए के साथ मुस्तैदी से खड़ा नजर आया और उसने यथास्थिति के पक्ष में मुहर लगाई। आइये, हम इन दोनों संकेतों को बारी-बारी से समझने की कोशिश करते हैं।
पहला संकेत-लेफ्ट-राइट को बढ़त, मध्यम मार्ग को घाटा
आंकड़े गवाह हैं कि इस चुनाव में जदयू, राजद, कांग्रेस आदि मध्यम मार्गीय और समाजवादी दलों की सीटें घट गईं। सबसे अधिक नुकसान जदयू को हुआ, उसकी सीटें 71 से घटकर 43 रह गई, उसे आज की स्थिति में हम दक्षिणपंथ की तरफ झुका मध्यममार्गी दल कह सकते हैं।
तमाम कोशिशों के बावजूद राजद की सीटें भी 80 से घटकर 75 रह गई, उसे सेंटर टू लेफ्ट मान सकते हैं, मगर इस चुनाव में उसे सभी को साथ लेकर चलने का मैसेज दिया था। पूर्णतः मध्यम मार्गी दल कांग्रेस की सीटें 27 से घटकर 19 रह गई। कांग्रेस पूरे देश में इसी तरह लगातार पिछड़ भी रही है।
वहीं हम देखते हैं कि भाजपा की सीटें 53 से बढ़कर 74 हो गई। वह दक्षिणपंथी राजनीतिक दल है, इस वक्त देश में दक्षिणपंथ भी मजबूत है। उसी तरह धार्मिक विचारों की राजनीति करने वाली तेलंगाना की पार्टी एमआईएम को भी सीमांचल के इलाके में अप्रत्याशित रूप से पांच सीटें मिलीं। सबसे दिलचस्प इस बार लेफ्ट का उभार रहा। इस बार उन्हें 16 सीटें मिलीं, जबकि पिछली दफा उन्हें सिर्फ तीन सीटें हासिल हुई थीं।
इस संकेत को कैसे देखें? क्या अब सबको साथ लेकर चलने वाला विचार अप्रासंगिक हो चला है। क्या लोगों ने अपना-अपना पाला चुन लिया है? यह देखने वाली बात होगी। क्या यह बिहार में सेंटर के अवसान की शुरुआत और राजनीति के लेफ्ट और राइट की तरफ खिसकने के लक्षण हैं? क्या समाजवादियों का गढ़ माने जाने वाले बिहार में समाजवादी क्षेत्रीय दल उसी तरह अप्रासंगिक हो जायेंगे, जिसकी शुरुआत यूपी में हो चुकी है।
उत्तर और दक्षिण का बंटवारा
बिहार प्रशासनिक रूप से जरूर एक इकाई है, मगर भौगोलिक और सामाजिक रूप से दो हिस्सों में साफ बंटा नजर आता है। उत्तर बिहार और दक्षिण बिहार। गंगा नदी इसे दो हिस्से में बांटती है। मगर अब तक कभी राजनीतिक सोच को लेकर ऐसा विभाजन बिहार में नहीं दिखा था, जैसा इस बार दिखा है।
दक्षिण बिहार के मतदाताओं ने जहां महागठबंधन को भरपूर समर्थन दिया है। वहीं उत्तर बिहार में चंपारण से लेकर मिथिला और कोसी तक ज्यादातर सीटों पर एनडीए विजयी हुई है।
यह इसलिए भी दिलचस्प है, क्योंकि अब तक उत्तर बिहार के लोग बिहार सरकार पर उनकी उपेक्षा का आरोप लगाते रहे हैं। नीतीश सरकार पर यह आरोप लगते रहे हैं कि उनका विकास गंगा नदी को पार नहीं कर पाता है। इसके बावजूद उत्तर बिहार ने जनादेश दिया है कि इस एनडीए सरकार को अभी और मौका मिलना चाहिए।
हालांकि यह समर्थन नीतीश को कम और भाजपा को अधिक है। यह भी दिलचस्प है कि दक्षिण बिहार में लेफ्ट की ताकत ने महागठबंधन को मजबूत किया है, तो पूरे उत्तर बिहार में भाजपा और एमआईएम जैसी दक्षिणपंथी ताकतें मजबूत हुई हैं। दिलचस्प इसलिए भी है कि दक्षिण बिहार और उत्तर बिहार में एक बड़ा फर्क आर्थिक विकास का भी है।
दक्षिण बिहार अमूमन विकसित माना जाता है और उत्तर बिहार में बाढ़ और पलायन का प्रकोप अधिक है और वह इलाका गरीब और पिछड़ा माना जाता है। तो क्या गरीब आबादी के बीच दक्षिणपंथ का और संपन्न इलाकों में वामपंथ का क्रेज बढ़ा है?
हालांकि ये सब संकेत अभी बहुत शुरुआती हैं और इन्हें अभी स्टैब्लिश होना है। मगर इन संकेतों को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।
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