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भूपेन हजारिका पुण्यतिथि स्मरण: शताब्दी वर्ष के बीच अमृत जैसे स्वर की विराट संगीतमयी स्मृति
सार
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से बी. ए. एवं पोलिटिकल साइंस में एम. ए. भूपेन ने मास कम्युनिकेशन में कोलम्बिया यूनिवर्सिटी से 1952 में पीएच. डी. की डिग्री ली। उन्हें शिकागो यूनिवर्सिटी से फेलोशिप भी मिली।
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भूपेन हजारिका पुण्यतिथि।
- फोटो : एएनआई
विस्तार
अगर आपने ‘रुदाली’ फ़िल्म देखी है, अथवा इसके गाने सुने हैं तो ‘दिल हूम हूम करे’ आज भी आपके दिल में ‘हूम हूम’ करता होगा। फ़िल्म में यह गाना एक बार युगल गीत है, तो दूसरी बार एकल गाया गया है।
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इसी गाने से मेरा पहला परिचय हुआ था, अनोखी आवाज के गायक भूपेन हज़ारिका से। इस साल से उनकी शताब्दी शुरु हो रही है। अभी तक भूपेन हज़ारिका पर कोई लेख या कार्यक्रम हिन्दी जगत में मेरी नजरों से नहीं गुजरा है। जबकि वे इप्टा से भी जुड़े हुए थे।
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8 सितम्बर 1926 को असम के सादिया में जन्मे भूपेन का प्यारा-सा पुकारू नाम है, ‘सुधा कंठ’। यह उनकी आवाज का पर्याय है। सच में उनका गला अमृत जैसा है, जिसे एक बार सुनकर कभी भूला नहीं जा सकता है। उनकी आवाज ने भारत को एक पहचान दिलाई है।
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बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से बी. ए. एवं पोलिटिकल साइंस में एम. ए. भूपेन ने मास कम्युनिकेशन में कोलम्बिया यूनिवर्सिटी से 1952 में पीएच. डी. की डिग्री ली। उन्हें शिकागो यूनिवर्सिटी से फ़ेलोशिप भी मिली। सोचिए शिक्षा को लेकर उनकी सोच कितनी आगे थी। उनकी थीसिस का विषय था, ‘प्रपोजल्स फ़ॉर प्रिपेयरिंग इंडिया’ज बेसिक एडुकेशन टू यूज ऑडियो-विजुअल टेक्निक्स इन अडल्ट एडुकेशन’ और यह साथ था 1952।
अमेरिका में उनका परिचय कन्सर्ट के बास-बैरिटोन कलाकार पॉल रोबेसोन से हुई, वे उससे बहुत प्रभावित थे। बाद में भूपेन हज़ारिका ने पॉल के गतों के ट्यून पर अपने गीत बनाए। पॉल रोबेसोन बेस जैसी भारी एवं गहरी तथा बैरिटोन की तरह गाने की क्षमता भूपेन हज़ारिका में भी थी।
वैसे इसके बहुत पहले भूपेन अपना पहला एल. पी. रिकर्ड बना चुके थे। उन्होंने 1939 मात्र 13 साल की उम्र में असमी फ़िल्म ‘इंद्रमालती’ में अभिनय किया था। आगे चल कर उन्होंने राजनीति में भी हाथ आजमाया। एक समय वे भारत के एकमात्र जीवित ‘बलाड सिंगर’ थे।
बहुमखी प्रतिभा सम्पन्न गुलज़ार ने उनके लिए कई गीत लिखे हैं। भूपेन हज़ारिका के विषय में ‘मैं और मेरा साया’ के गीत ‘डोला हो डोला’ पर बात करते हुए गुलज़ार ने कहा, इनका परिचय कराना बहुत मुश्किल काम है। क्योंकि इस एक शक्सियत में बहुत-सी शक्सियत हैं। आप भी इसे देखिए, नीलकांत हज़ारिका की दस संतान में सबसे बड़े बहुमुखी प्रतिभा के धनी भूपेन हज़ारिका पार्श्व गायक, गीतकार, संगीतकार, अभिनेता, एडिटर, फ़िल्ममेकर, प्रोफ़ेसर (गुवाहाटी इश्वविद्यालय) क्या कुछ नहीं थे।
कुछ समय उन्होंने गोहाटी के ऑल इंडिया रेडियो में काम किया। उनकी गायकी की शुरुआत उनकी माँ से सुनी हुई लोरियों से हुई। माँ शांतिप्रिया हज़ारिका ने उन्हें न केवल लोरियाँ सुनाई, बल्कि असम के परम्परागत संगीत से भी परिचित कराया।
‘रुदाली’ फ़िल्म के एकल एवं युगल सारे गाने उन्होंने गाए। युगल में उनका साथ दिया है लता मंगेशकर तथा आशा भोसले ने। फ़िल्मों में उनके पार्श्व गायन की शुरुआत ‘इंद्रमालती’ से ही हो गई थी। फ़िल्म के म्युजिक डॉयरेक्ट भी वे थी। इस फ़िल्म की दूसरी पार्श्व गायिका शमशाद बेगम थीं। आज दोनों जीवित नहीं हैं। भूपेन हज़ारिका की 5 नवम्बर 2011 में मुंबई में मृत्यु हुई।
26 फ़िल्मों में पार्श्व गायन करने वाले भूपेन हज़ारिका ने ‘रुदाली’ के अलावा ‘शिराज’, ‘शकुंतला’, ‘ए रिवर कॉल्ड तितास’, ‘चमेली मेमसाब’, ‘देवदास’, ‘एक पल’, ‘दर्मियान’, ‘गज गामिनी’ ‘चिंगारी’ आदि फ़िल्मों में गाने गाए। 14 फ़िल्मों का निर्देशन किया। 21 फ़िल्मों का म्युजिक कम्पोज किया। ‘थ्रू मेलॉडी एंड रिदम’, ‘मेरा धर्म मेरी माँ’, ‘फ़ॉर हूम द सन साइन्स’, ‘प्रतिध्वनि’, ‘शकुंतला’, ‘सिराज’ उनकी निर्देशित कुछ फ़िल्मों के नाम हैं।
उनके लिखे असमी गीत मात्र फ़िल्मी एवं मनोरंजन केलिए नहीं होते हैं। ‘ओ गंगा बहती हो क्यों?’ में वे आज की स्थिति से व्यथित होकर गंगा से पूछ रहें हैं, इतने अत्याचार, क्रूरता और अन्याय के बावजूद तुम क्यों बहती हो? जब चारो ओर हाहाकार मचा हुआ है, तुम क्यों बहती हो? उनके गीत सांप्रदायिक सद्भाव, वैश्विक न्याय, संवेदना लिए होते हैं। असमी, हिन्दी फ़िल्मों के साथ-साथ उन्होंने बाँग्लादेश की फ़िल्मों केलिए भी गीत गाए। इस तरह वे अपनी स्वर सम्पदा से देश की सामा पार कर जाते हैं।
उन्हें तीन फ़िल्मों के निर्देशन (‘शकुंतला’, ‘प्रतिध्वनि’ एवं ‘लोती घोती’) केलिए राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ, एक फ़िल्म ‘चमेली’ के म्युजिक कॉम्पोजीशन केलिए भी राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ यानि चार राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिले। साथ ही पद्म भूषण, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और फ़िल्म का सबसे बड़ा पुरस्कार दादा साहेब फ़ालके भी मिला।
उन्हें संगीत नाटक अकादमी की फ़ेलोशिप भी मिली थी। मरणोपरांत भारत रत्न (2012) एवं पद्म विभूषण (2019) भी मिला। ‘रुदाली’ फ़िल्म केलिए उन्हें जापान में एशिया पैसेफ़िक इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल का सर्वोत्तम म्युजिक पुरस्कार मिला। किसी भारतीय को यह पहली बार मिला था।
अपने गीतों में असम लोक संगीत का प्रयोग करने वाले भूपेन हज़ारिका ने असम तथा पूर्वोत्तर की संस्कृति और असम के लोग संगीत को हिन्दी सिनेमा में लाकर पूर्वोत्तर-संस्कृति और असम संगीत को राष्ट्रीय पहचान दिलाई। भूपेन हज़ारिका के गीतों का विभिन्न भारतीय भाषाओं खासकर हिन्दी तथा बाँग्ला में अनुवाद हुआ है, जिन्हें उन्होंने स्वयं गाया है, ये गीत खूब लोकप्रिय हैं।
असम अपने कलाकारों को बहुत प्यार एवं सम्मान करता है। जीते-जी और मरणोपरांत भी। अभी हाल में हमने 19 सितम्बर 2025 को गुजरे जुबिन गर्ग के संदर्भ में इसे देखा है। ‘बार्ड ऑफ़ ब्रह्मपुत्र’ भूपेन हज़ारिका के गुजरने पर उनके अंतिम संस्कार में हजारों लोग आए। उनके जीवित रहते 2009 में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन ने गुवाहाटी में उनकी आदमकद मूर्ति लगाई।
इसके भी पहले 1979 में अरुणाचल प्रदेश सरकार ने उन्हें स्वर्ण पदक प्रदान किया। वायसकोर्नी बोरा एवं अर्नब जन डेका ने 1986 में फ़ीचरलेंथ की डॉक्यूमेंट्री बायोपिक ‘मोई एटी ज़ाज़ाबोर’ (‘आई एम ए वांडरर’) बनाई है। इस फ़िल्म का संगीत पुरस्कृत असमी संगीतकार, गीतकार, गायक जिम अंकन डेका ने बनाया है। 1993 में वे असम साहित्य सभा के प्रेसिडेंट चुने गए।
2010 में असम क्रिकेट एसोसिएशन ने बर्षापारा स्टेडियम का नाम बदल कर डॉक्टर भूपेन हज़ारिका क्रिकेट स्टेडियम किया। लोहित पर बने भारत के सबसे लंबे रोड ब्रिज का नाम उनके नाम पर है। एक मत गणना में राष्टीय गान के बाद ‘मानुष मानुषेर जोनो’ गीत बांग्लादेश का लोकप्रिय गीत पाया गया।
इस घुमक्कड़ एवं अनुशासनहीन व्यक्ति के जीवन को ढ़र्रे पर लाने का काम कल्पना लाजमी ने किया। 17 साल की कल्पना चौथे दशक में चल रहे भूपेन के प्रेम में पड़ गईं और उनकी सुख-दु:ख का अंत तक साथ देती रहीं। निष्ठा के साथ उनकी देखभाल करती रहीं।
8 सितम्बर 2022 को उनके 96वें जन्मदिन पर भूपेन हज़ारिका को सम्मान देते हुए गूगल ने डूडल बनाया। उनके मृत्यु दिवस पर श्रद्धांजलि!
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