बाबा साहेब आंबेडकर जयंती 2021: सामाजिक जनतंत्र की उदात्त दृष्टि
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बाबा साहेब आंबेडकर के चिंतन और उनकी उदात्त दृष्टि पर जब भी मन जाता है, सामाजिक जनतंत्र के लिए किए उनके कार्य जहन में कौंधने लगते हैं। यह महज संयोग ही नहीं है कि संविधान सभा की आखिरी बैठक जब हुई तो बाबा साहेब आंबेडकर ने सामाजिक जनतंत्र को ही केन्द्र में रखते अपना उदबोधन दिया था। उनका कहना था कि जाति प्रथा और लोकतंत्र साथ-साथ नहीं रह सकते। इसलिए भारतीय संविधान में ऐसे नियमों की पहल हुई, जिनमें देश के किसी भी हिस्से में रहने वाले नागरिकों के लिए जातीय और भाषायी आधार पर कोई भेद-भाव नहीं हो। मैं यह मानता हूं कि किसी भी राष्ट्र का निर्माण उसकी परंपराएं, संस्कृति, धर्म, जातियां और भाषाएं मिलकर ही करती हैं।
इसलिए राष्ट्रवाद में संकीर्णता का कहीं कोई स्थान नहीं है। संविधान सभा में प्रारूप के प्रावधानों और उनके औचित्य को सिद्ध करने का मुख्य कार्य डाॅ. आंबेडकर और अन्य ‘प्रारूप समिति’ सदस्यों पर ही था। अपने सुयोग्य सहयोगियों के साथ मिलकर संविधान का जो प्रारूप उन्होंने बनाया उसमें देश की परंपराओं, आस्था और विश्वास को एक तरह से उन्होंने स्वर दिया, पर इसमें मूल बात यही थी कि प्रथमतः देश के सभी नागरिक भारतीय हैं और बाद में उनकी कोई और पहचान।
संविधान और डाॅ. आंबेडकर
संविधान सभा में डाॅ. आंबेडकर के दिए वक्तव्यों की गहराई में जाएंगे तो यह भी पाएंगे कि वहां राजनीति, कानून, इतिहास, दर्शन का अपूर्व संगम है। किसी एक जाति नहीं, सभी का समानता का भाव है। नवंबर, 1948 में संविधान के प्रारूप पर विचार करने के लिए उन्होंने अपना प्रस्ताव रखते हुए कहा था कि हमने भारत वर्ष को राज्यों का संघ नहीं बल्कि एक संघ राज्य कहा है। मैं यह मानता हूं, डाॅ. आंबेडकर भारत में सामाजिक विभक्तिकरण से चिंतित थे इसलिए उन्होंने कहा कि लोकशाही को हम बनाना चाहते हैं तो हमें अपनी राह के रोड़ों को पहचानना ही होगा क्योंकि जनतंत्र में जनता की निष्ठा की नींव पर ही संविधान का भव्य महल खड़ा हो सकता है।
मुझे लगता है, डाॅ. आंबेडकर के विचार वास्तविक रूप में उस राष्ट्रवाद से ही जुड़े हैं जिनमें व्यक्ति और व्यक्तियों के बीच जाति, वर्ण और धर्म में किसी तरह का कोई भेदनहीं है। देश का हर नागरिक सिद्धान्तः समान है। समाज-व्यवस्था और सामाजिक सोच के अंतर्गत हम सभी में समरसता है। इसी से हमारा राष्ट्र अनेकता में भी एकता का उत्कृष्ट उदाहरण है।
भारतीय संविधान की उद्देशिका में भी इसीलिए समस्त नागरिकों के लिए समता तथा बंधुता की बात कही गयी है। डाॅ. आंबेडकर ने इस दृष्टि से भारतीयता को भी अपने चिंतन में व्यापक परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित किया है। राष्ट्र निर्माण के लिए उन्होंने भूमि, वहां के समाज और श्रेष्ठ परम्पराओं को महत्व देते हुए इस बात पर भी जोर दिया कि राष्ट्र कोई भौतिक इकाई नहीं है।
राष्ट्र भूतकालीन लोगों द्वारा किए गए सतत प्रयासों, त्याग और देशभक्ति का परिणाम है। उन्होंने राष्ट्र को जीवंत बताते हुए यह भी कहा कि राष्ट्रीयता सामाजिक चेतना है और इसी से व्यक्ति एक दूसरे के निकट आता है। बंधुता की भावना इसी से विकसित होती है इसमें संकीर्णता के विचार सबसे बड़ी बाधा हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मैं चाहता हूं कि भारत के सभी लोग अपने आपको भारतीय और केवल भारतीय समझें।
यदि किसी कारण से ऐसा नहीं हो पाता है तो हम यह सबसे बड़ा पाप कर बैठेंगे और मैं हमेशा अपने सामर्थ्य के साथ इसका विरोध करता रहूंगा। बतौर भारतीय संविधान शिल्पी डाॅ. आंबेडकर ने फ्रेंच रिवॉल्यूशन से तीन शब्द लिए। लिबर्टी, इक्वालिटी और फैटर्निटी। संविधान के मूल में सम्मिलित इन शब्दों ने उनके राजनीतिक और सामाजिक जीवन दर्शन को भी गहरे से प्रभावित किया। इसीलिए संविधान के मूल अधिकारों में अनुच्छेद 14 से 18 के माध्यम से समानता के अधिकार की व्याख्या है।
इसी संबंध में संविधान के अनुच्छेद 19 से 22 के माध्यम से स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है और अनुच्छेद 23 और 24 में शोषण के विरूद्ध अधिकार दिया गया है। महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि अनुच्छेद 19 (2) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार में भी किसी भी जाति, वर्ग या समुदाय के विरूद्ध अनर्गल अभिव्यक्ति को बाधित किया गया है। संविधान के अंतर्गत इसमें किसी भी तरह देश की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता को नुकसान नहीं होना चाहिए।
इन तीन चीजों के संरक्षण के लिए अगर कोई कानून है या बन रहा है, तो उसमें भी बाधा नहीं आनी चाहिए। अनुच्छेद 25 से 28 के माध्यम से भारतीय संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। मैं यह मानता हूं कि विश्वभर के संविधानों में यह भारतीय संविधान ही है, जिसमें इस तरह से मूल अधिकारों की विषद् व्याख्या की गयी है। डाॅ. अंबेडकर का चिंतन इसलिए भी गहराई से प्रभावित करता है कि उन्होंने लगभग सभी क्षेत्रों में मौलिक दृष्टि रखते अपने आपको आगे बढ़ाया।
समाज-व्यवस्था और सामाजिक सोच
महिला शिक्षा से जुड़े उनके चिंतन पर जाएंगे तो यह भी लगेगा कि महिलाओं को नौकरियों में आरक्षण की पहल के वह एक तरह से पहले सूत्रधार थे। मुंबई की महिला सभा को संबोधित करते हुए कभी उन्होंने कहा भी था कि “नारी राष्ट्र की निर्मात्री है, हर नागरिक उसकी गोद में पलकर बढ़ता है, नारी को जागृत किए बिना राष्ट्र का विकास संभव नहीं है।” उनके इस विचार आलोक की गहराई में जाएंगे तो यह भी पता चलेगा कि भारतीय संदर्भ में संभवतः वह पहले ऐसे अध्येता थे, जिन्होंने जातीय संरचना में महिलाओं की स्थिति को जेंडर की दृष्टि से समझने की कोशिश की। बाकायदा इसके लिए महिला अधिकारों की पैरवी भी की। उनका मूल दृष्टिकोण यही था कि कैसे समाज में सभी स्तरों पर समानता की स्थापना हो।
इसलिए उन्होंने समाज को श्रेणीविहीन और वर्णविहीन करने पर निरन्तर जोर दिया। उनका यह कहा तो सदा ही मन को आलोकित करता है कि ‘क्रांति लोगों के लिये होती है, न कि लोग क्रांति के लिये होते हैं।’ डाॅ. आंबेडकर विराट व्यक्तित्व के थे। इसलिए उन्हें किन्हीं संकीर्णताओं में आबद्ध करना, उनके व्यक्तित्व को कमजोर करने का प्रयास है। मैं तो बल्कि यह भी मानता हूं कि किसी विशेष वर्ग, जाति से उन्हें जोड़कर देखना भी बौद्धिक दरिद्रता है। वह उदात्त दृष्टि के महापुरूष थे। राष्ट्र के सर्वांगीण विकास से जुड़े उनके चिंतन और राष्ट्र निर्माण में उनकी जो भूमिका रही है, उसमें सभी को समान देखे जाने की उदात्त सोच को व्यापक अर्थों में व्याख्यायित किए जाने की भी जरूरत है।
इस बात को भी समझे जाने की जरूरत है कि संविधान में अनुच्छेद 370 भी उनकी इच्छा के विरूद्ध जोड़ा गया जिसे आजादी के 72 वर्षों के बाद वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री श्री अमित शाह की दृढ़ इच्छाशक्ति और संकल्प से हटाया गया है। उनके समग्र चिंतन और दृष्टि को एकांगी दृष्टि से देखने की बजाय समग्रता से गहराई से उस पर विचार करने की जरूरत है। डाॅ. आंबेडकर के विचारों की समग्रता में जाएंगे तो यह भी लगेगा कि देश की एकता और अखण्डता के साथ समानता के बीज वहां पर हैं। समानता और न्याय के साथ बहुजन हिताय बहुजन सुखाय का उनका दर्शन इसलिए आज भी प्रासंगिक है और आने वाले कल में भी यह प्रासंगिक रहेगा।
लेखक राजस्थान के राज्यपाल हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।