बांग्लादेश से रिश्तों में जमी बर्फ़ पिघलती क्यों नहीं?
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बांग्लादेश और भारत के रिश्ते ऐतिहासिक तो हैं लेकिन इनकी निरंतरता भंग क्यों हो जाती है- यह एक पहेली है। जिस देश के स्वाधीनता संग्राम में हिंदुस्तान ने निर्णायक भूमिका निभाई हो,उस देश के व्यवहार में वह उपकार का भाव क्यों नहीं दिखाई देता?
यकीनन, उसका यह उपकृत रवैया पहले था, लेकिन शायद यह उसकी कमज़ोरी मान लिया गया, इसलिए पिछले दो दशक से दोनों देशों के संबंधों में गर्माहट नहीं दिखाई दे रही है। आज आम बांग्लादेशी भारत को लेकर बहुत सहज महसूस नहीं करता। भारत को इसकी पड़ताल करने की जरूरत है ।
कैसा रिश्ता समझा जाए बांग्लादेश-भारत का?
प्रधानमंत्री शेख हसीना की भारत यात्रा में हुए समझौतों के साथ ही दोनों मुल्कों के बीच समझौतों की शतकीय साझेदारी हो चुकी है। इसके बाद भी शेख़ हसीना प्याज का निर्यात रोकने पर औपचारिक चुटकी लेने से नहीं चूकी तो इसका अर्थ समझने की आवश्यकता हिंदुस्तान को है। इशारा यह भी है कि आप पाकिस्तान और बांग्लादेश को एक ही पलड़े में रखकर नहीं तौल सकते।
बांग्लादेश,नेपाल,म्यांमार ,श्रीलंका और भूटान एक तरह से स्वतंत्र देश होते हुए भी भारतीयों को पराए से कभी नहीं लगते रहे हैं, लेकिन हालिया वर्षों में नेपाल, म्यांमार, श्रीलंका और बांग्लादेश के साथ एक ख़ास क़िस्म का ठंडापन आया है और इसे कोई नकार नहीं सकता।
यह पहेली ख़ुद हिंदुस्तान के लोग नहीं समझ सके हैं कि रोहिंग्या शरणार्थियों के मामले में भारत ने कूटनीतिक उदासीनता क्यों बरती? म्यांमार और बांग्लादेश के बीच चीन ने न्यूयॉर्क में समझौता कराया तो हमारे विदेश मंत्रालय के लिए क्या यह एक बड़ा झटका नहीं था।
म्यांमार और बांग्लादेश की नेत्रियों को एक मंच पर लाना बहुत कठिन नहीं था, फिर हमारे कान क्यों खड़े नहीं हुए? जिन परियोजनाओं में भारत की भागीदारी हो सकती थी, वे चीन की ओर जाती दिखाई से रही हैं। तीस्ता जल विवाद भी ठंडे बस्ते में अटका हुआ है।
शेख हसीना और भारत
शेख़ हसीना और उनके परिवार के साथ भारत के संबंध बेहद गहरे और भावनात्मक रहे हैं। माता और पिता शेख़ मुजीबुर्रहमान तथा तीन भाइयों की हत्या के बाद शेख़ हसीना की जान को ख़तरा था तो भारत ने ही बरसों तक उन्हें संरक्षण दिया था। वे जर्मनी से भारत आईं और छह साल तक भारत सरकार की सुरक्षा में रहीं।
सन् 1981 में वे बांग्लादेश लौटीं और फिर सत्ता में आईं। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनकी भरपूर मदद भी की। शेख़ हसीना एक तरह से भारत को अपना दूसरा घर मानती रही हैं। इसके बावजूद भारत आम बांग्लादेशी का दिल जीतने में नाक़ाम रहा है। इसका फ़ायदा सीधा सीधा चीन उठा रहा है। भारतीय विदेश नीति के नियंताओं को गंभीरता से इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।