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आजादी का अमृत महोत्सव: मतदाता का परिपक्व होना ही लोकतंत्र का अमृत कलश, इस दिशा में प्रयास आवश्यक

Mon, 15 Aug 2022 04:39 PM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Mon, 15 Aug 2022 04:39 PM IST
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azadi ka amrit mahotsav, voters role in sustaining democracy
लोकतंत्र के लिए वोटरों का जागरूक होना जरूरी - फोटो : Twitter

स्वाधीनता के 75 वर्षों में एक संप्रभु स्वाधीन राष्ट्र के रूप में भारत ने क्या हासिल किया, कितना हासिल किया, किन मामलों में हम अब भी पीछे हैं, भारत के समानांतर स्वतंत्र हुए राष्ट्र अथवा चीन जैसा देश जहां नई साम्यवादी शासन प्रणाली लागू हुई, वो आज हमारी तुलना में कहां खड़ा है आदि कई सवाल हैं, जो हर जागरूक भारतीय के मन को मथते हैं।

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इन सवालों के कई जवाब हो सकते हैं, सकारात्मक भी नकारात्मक भी, क्योंकि उपलब्धियों का डाटा अपेक्षाओं की भौतिक तुला में ही तौला जाएगा। लेकिन जो सबसे अहम बात है और शायद सबसे बड़ी उपलब्धि भी कि भारत ने इन 75 वर्षों में बड़े संघर्ष के बाद हासिल लोकतंत्र को न सिर्फ कायम रखा है बल्कि इसके स्थायित्व और वैविध्य को लेकर देश का मतदाता उत्तरोत्तर परिपक्व होता जा रहा है। बावजूद इसके कि आज राजनीतिक पार्टियां एक दूसरे पर मतदाता को रिझाने ‘रेवड़ी बांटने’, वोटर को खरीदने या गुमराह करने जैसे आरोप लगा रही है।
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जागृत मतदाता बेहतर समाज की नींव

देश में लोकशाही की कायमी का कारण न केवल शिक्षा का प्रसार है, बल्कि मतदाता की उस अंतरात्मा का भी जागृत होना है, जो वोटर को परिस्थिति और वक्त की पुकार के अनुसार मत डालने को प्रेरित करता है। बीते एक दशक में इसका सबसे बढ़िया उदाहरण दिल्ली प्रदेश का है, जहां मतदाता लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों में अलग-अलग ढंग से वोट व्यवहार करता है।
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दिल्ली के बारे में कहा जा सकता है कि वह सुशिक्षितों का शहर है, लेकिन यही ट्रेंड हमें उन दूर-दराज के अनपढ़ और आदिवासी इलाकों में भी देखने को मिल रहा है, जिसे अमूमन हम ‘पिछड़ा’ कह देते हैं। ऐसे क्षेत्र भौतिक विकास की परिभाषा में भले मिसफिट हों, लेकिन मतदाता की मैच्योरिटी के मामले में अगड़े और परिपक्व ही माने जाने चाहिए। महत्वपूर्ण यह है कि इस देश का वोटर राजनीतिक विविधता को भी संभाले हुए है।

पहले कांग्रेस और अब भाजपा के रूप में एक पार्टी का सर्वसत्तावाद वोटर खारिज भी करता रहा है। यही राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विविधता की भारत की आत्मा की सुंदरता है। स्वतंत्रता की 75 वीं सालगिरह पर हम यह विश्वास से कह सकते हैं कि आने वाले समय में भी कोई कितना ही नीचे गिर जाए, भारत की आत्मा को ठेस नहीं पहुंचा सकेगा। 

जहां तक अपेक्षाओं की बात है तो बहुत सी मंजिलें ऐसी हैं, जहां तक हमें पहुंचना चाहिए था, लेकिन नहीं पहुंच सके हैं। बीते साढ़े सात दशकों में देश में अभी भुखमरी है, कुपोषण है, शिशुओं की अकाल मौत और अपेक्षानुरूप रोजगार की कमी है, हर सिर को छत नहीं है, हर बच्चे को शिक्षा नसीब नहीं है, इलाज की  सुविधाएं नहीं है, गरीबी है। राजनीतिक पार्टियां सत्ता स्वार्थ के लिए समाज की विभाजक रेखाओं को और गाढ़ा करने में जुटी हुई हैं। इसका अंतिम छोर क्या है, कोई नहीं जानता। इसके बाद भी यह सच्चाई है आज भारत की आवाज दुनिया में सुनी जा रही हैं।

हम निरीहता से एक निश्चयात्मक भूमिका में हैं, क्योंकि हमने अपनी विशाल आबादी को अपने विकास का बड़ा अस्त्र बना लिया है। भारत को अपनी ताकत का मोलभाव करना आ गया है। इसके पहले पं.नेहरू और इंदिरा गांधी के जमाने तक दो ध्रुवीय विश्व  में भारत ने गुटनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में एक धुरी बनने  की कोशिश की थी, जिसमें हमे आंशिक सफलता भी मिली, लेकिन 21वीं आते-आते वैश्विक संतुलन बदल चुका है। लिहाजा भारत विश्व के दस अग्रणी देशों में शुमार है, इस सत्य को झुठलाना आईने को नकारने के समान है।

75 वर्षों की उपलब्धियां

बीते 75 वर्षों में हमने कई कामयाबियां हासिल की हैं। याद करें कि 1947 तक विदेशी सत्ता के अधीन रहते हुए भारत कहां था और अब कहां है? पहला मुद्दा तो आबादी का ही है। तब देश की आबादी 33 करोड़ थी, आज 135 करोड़ है, हालांकि यह कोई बहुत अच्छी बात नहीं है। क्योंकि संसाधनों के वितरण की असमानता और गहरी हुई है।

आर्थिक समता के मोर्चे पर हम कामयाब नहीं हुए हैं। हालांकि अगर जीडीपी (सकल राष्ट्रीय उत्पादन)  की बात करें तो 1947 में भारत की जीडीपी 2.7 लाख करोड़ रुपये थी जो 2020-21 में 135.58 लाख करोड़ हो गई।

आजादी के वक्त भारत की जीडीपी कुल वैश्विक जीडीपी की महज 3 फीसदी थी। पहले हमारी अर्थव्यवस्था में आधी हिस्सेदारी कृषि की थी, अब यह 16 फीसदी रह गई है। भारत में साक्षरता केवल 12 फीसदी थी, जो 74.37 फीसदी हो गई, इसमें  भी अहम बिंदु महिला साक्षरता का है। 1947 में देश में महिला साक्षरता केवल 7.3 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 70.3 प्रतिशत हो गई है। इसी तरह स्वतंत्रता के समय देश में प्रति व्यक्ति औसत वार्षिक आय 249.60 रु. थी, जो वर्ष 2020-21 में बढ़कर 91 हजार 481 लाख करोड़ रु. हो चुकी है।


भारत अब एक प्रमुख सैन्य शक्ति और अंतरिक्ष शक्ति भी है। हम सूचना प्रौद्योगिकी के बड़े हब भी हैं। भारत की बढ़ती ताकत और हैसियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पहले हम गुट निरपेक्ष देश के रूप में महाशक्तियों के चंगुल से खुद को बचाने की कोशिश करते थे, आज हम महाशक्तियों के बीच संतुलन साधने की कवायद कर रहे हैं।

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मतदान - फोटो : amar ujala

भारत के आंतरिक नक्शे में बदलाव

बीते 75 वर्षों में भारत का आंतरिक नक्शा भी कई बार बदला है। 15 अगस्त 1947 को (विभाजित) भारत में कुल 584 देशी रियासतें थीं, जिनमें चार- हैदराबाद, जम्मू कश्मीर, मैसूर और बड़ोदा बड़ी रियासतें थीं। भारत के स्वाधीनता के साथ ही इनमें अधिकांश का विलय भारत संघ में हो गया था। आजादी के बाद देश में चार अलग-अलग श्रेणियों में कुल 31 राज्य गठित किए गए। इसके बाद देश में राज्यों का भाषाई आधार पर पुनर्गठन हुआ और 14 राज्य और 6 केन्द्र शासित प्रदेश बने।

स्वतंत्रता के साथ लोगों की राजनीतिक सांस्कृतिक आकांक्षाएं बढ़ती गईं, उन्हें पूरा करने के लिए और कुछ राज्य बने। 2022 आते-आते देश में कोई रियासत नहीं बची और कुल राज्यों की संख्या 28 और केन्द्र शासित प्रदेश की तादाद 8 हो गई है। 


दरअसल जनभावना और प्रशासन को समाज की अंतिम पंक्ति तक पहुंचाने की दृष्टि से राज्यों का विभाजन और पुनर्गठन भी लोकतंत्र की गहराती जड़ों का ही प्रमाण है। 1947 में जब इस प्राचीन देश की 90 फीसदी जनता अशिक्षित थी, तब दुनिया में यह सवाल पूछा जा रहा था कि ऐसे अनपढ़ लोगों के हाथ में लोकतंत्र कैसे सुरक्षित रह सकता है? भारत के संविधान ने हर शिक्षित-अशिक्षित, हर छोटे- बड़े हर अमीर-गरीब को समान मताधिकार दिया है।

मतदाता का परिपक्व होना जरूरी

सवाल यह भी था कि जिन्हें अक्षर ज्ञान तक नहीं वो राजनीतिक सत्ता के मर्म को कैसे समझ पाएंगे, जबकि लोकतंत्र के मूल्य समाज के नैतिक उत्थान और आत्म ज्ञान के फलस्वरूप जन्मे हैं। इन्हें संभालने के लिए देश की आत्मा का जागृत रहना और मतदाता का परिपक्व होना नितांत जरूरी है।  यही परिपक्वता चुनाव रूपी लोकतंत्र के उत्सव में मतदाता की बढ़ती भागीदारी और राजनीतिक विचार वैविध्य का भी सुखद संकेत है। पहले आम चुनाव में देश में कुल 53 सियासी पार्टियों ने भाग लिया था तो 2019 में यही संख्या चार गुना बढ़कर 2 हजार 2293 तक पहुंच गई।

यह बात अलग है कि इनमें से बहुत सी पार्टियों का वजूद नाम मात्र का है।

जहां तक चुनाव में वोटर की भागीदारी की बात है तो 1951-52 में हुए पहले आम चुनाव में देश में औसत मतदान का प्रतिशत 45.70 था, जो 2019 के आम चुनाव में बढ़कर 67.40 हो गया। पहले दो आम चुनावों में महिला वोटरों के अलग से आंकड़े उपलब्ध नहीं है, लेकिन 1962 के आम चुनावों में महिला वोटरों की भागीदारी 46.6 फीसदी रही, लेकिन 2019 के आम चुनाव में महिला वोटरों ने मतदान में पुरूष मतदाताओं को भी पीछे छोड़ दिया। इस चुनाव में कुल 67.18 फीसदी महिला मतदाताओं ने वोट डाले, जबकि पुरुष मतदाताओं का प्रतिशत 67.01 फीसदी ही रहा।


महिला मतदाताओं की यह जागरूकता भारत में लोकतंत्र के कायम रहने की सुखद शाश्वति है।   

यही वो बिंदु है, जिस पर हर भारतीय 75 सालों में खरा उतरा है। उसने एक दलीय सत्तावाद से बहुदलीय गठबंधन और बहुदलीय गठबंधन से एक दल के वर्चस्व वाले गठबंधन तक कई राजनीतिक प्रयोग सफलता से आजमाए हैं। शर्त यही कि देश सुरक्षित रहे। बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में कई बार लगा था कि लोकतंत्र का दिया अब बुझा-तब बुझा, लेकिन मतदाता ने उसकी लौ निष्कंप बनाए रखी। जहां उसने अधिनायकवाद को खारिज किया तो सर्वसत्तावाद पर भी समय रहते लगाम डाली। कमजोर राजनीतिक गठबंधनों को डस्टबिन में डाला तो अधिनायकवादी गठबंधनों को झटका देने में भी कोताही नहीं की। 

इसका बड़ा कारण यही है कि इस देश का अनपढ़ और कम पढ़ा-लिखा मतदाता भी समझता है कि देश सुरक्षित है तो प्रदेश सुरक्षित है, प्रदेश सुरक्षित है तो गांव सुरक्षित है और गांव सुरक्षित है तो वह स्वयं और समाज सुरक्षित है। यही वह भाव है, जो लोकतंत्र की कायमी की गारंटी देता है। यही अमृत कलश है, जो बीते 75 सालों के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मंथन से निकला है।  


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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