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आजादी का अमृत महोत्सव: मल्टीवर्स की मरीचिका में फंसा प्रजातंत्र का युवा जनतंत्र

Mon, 15 Aug 2022 01:07 PM IST
Swati shaiwal Sharma स्वाति शर्मा
Updated Mon, 15 Aug 2022 01:07 PM IST
सार

हम अपना 75 वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं। और दुनिया भर के सामने अपनी शक्ति और अद्भुत सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन भी कर रहे हैं। युवा पीढ़ी एक ऐसे दौर में जी रही है जहां उसके पास साधन तो हैं लेकिन सही संवाद नहीं है। कोई उसे यह बताने वाला नहीं है कि उसके पहले की पीढ़ी ने जो मेहनत की उसका फल उसे मिल रहा है और यही मेहनत उसे अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए करनी होगी।

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Azadi Ka Amrit Mahotsav: Indian youth and the illusion of multiverse
ऊर्जा से लबरेज युवा पीढ़ी: युवा पीढ़ी एक ऐसे दौर में जी रही है जहां उसके पास साधन तो हैं लेकिन सही संवाद नहीं है। - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

हम अपना 75 वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं। और दुनिया भर के सामने अपनी शक्ति और अद्भुत सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन भी कर रहे हैं। एक देश के रूप में हमने कई मुकाम हासिल किए हैं, कई सीढ़ियां बुलंदी की चढ़ी हैं। नए कीर्तिमानों, नई उपलब्धियों के साथ हम एक नौजवान राष्ट्र के तौर पर दुनिया से मुखातिब हैं।

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आज के समय मे किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत है उसकी युवा जनसंख्या। युवा जनसंख्या यानी युवा राष्ट्र। अधिक ऊर्जावान, अधिक क्षमतावान और तेज गति से विकास की ओर बढ़ता हुआ। इस लिहाज से देखा जाए तो भारत एक बहुत महत्वपूर्ण पड़ाव पर है क्योंकि हमारी आबादी का एक बड़ा हिस्सा युवा है। हमारे युवा क्षमतावान भी हैं और आज से बीस साल पहले की पीढ़ी की तुलना में अधिक साधन संपन्न भी। इस लिहाज से यह वाकई स्वर्ण युग है हमारे लिए लेकिन फिर वो क्या है जो इस पीढ़ी को सही दिशा नहीं दे पा रहा?
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देश में जिस तेजी से 4जी और 5जी स्पीड पकड़ रहे हैं, उसी तेजी से और भी बहुत कुछ घट रहा है। पिछले 2 सालों में कई ऐसे घटनाक्रम हैं जो युवाओं की भूमिका और उनके व्यवहार पर प्रश्न उठाते हैं। कुछ समय पहले सामने आईं बुल्ली बाई और सुल्ली एप जैसी स्थितियां उपरोक्त प्रश्न को और गहरा बना देती हैं। इस मामले में पकड़े गए युवा 20-25 साल की उम्र के थे और सब अच्छे पढ़े-लिखे हैं। कुछ ने तो बकयादा इंजीनियरिंग की डिग्री ली है और उसका उपयोग उन्होंने तकनीकी अपराध करने के लिए किया। ये एकमात्र उदाहरण नहीं है। इसके अलावा धमकियां देने और दिनदहाड़े खून कर देने वाले गैंगस्टर, ऑनलाइन फ्रॉड कर रहे, गेम की लत में खुद को या अपनों को नुकसान पहुंचाने वाले, किसी चुनौती या बात से दुखी हो जान देने वाले युवाओं की संख्या में भी तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है।

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युवा पीढ़ी एक ऐसे दौर में जी रही है जहां उसके पास साधन तो हैं लेकिन सही संवाद नहीं है। कोई उसे यह बताने वाला नहीं है कि उसके पहले की पीढ़ी ने जो मेहनत की उसका फल उसे मिल रहा है और यही मेहनत उसे अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए करनी होगी। लिहाजा युवा ऊर्जा और प्रतिभा से तो सम्पन्न है लेकिन वैचारिक स्तर पर वह आउटसोर्सिंग पर ज्यादा निर्भर है।


ऐसा नहीं है कि आज के युवा भावनात्मक रूप से समृद्ध नहीं हैं बल्कि कई मायनों में आज की पीढ़ी प्रैक्टिकल और इमोशनल दोनों एप्रोच का बैलेंस रखने वाली अद्भुत पीढ़ी है। लेकिन उसकी यह खूबी ही उसके लिए आत्मघाती बनती जा रही है। यह पीढ़ी दुनियादारी के मामले में भी प्रैक्टिकल बनना चाहती है लेकिन भूल जाती है कि पाश्चात्य देशों की परिवार और समाज की व्यवस्था, भारतीय  समाज से बहुत अलग है। वहीं युवाओं का इमोशनल होना इसे उन लोगों के सामने वल्नरेबल बना रहा है जो इसका फायदा अपने स्वार्थ के लिए उठा रहे हैं। आतंकवाद से लेकर राजनीति तक आप इसके उदाहरण देख सकते हैं।

Azadi Ka Amrit Mahotsav: Indian youth and the illusion of multiverse
एक राष्ट्रीय सर्वे के अनुसार देश की काम करने लायक कानूनी उम्र के 450 मिलियन के करीब आबादी में से बड़ा प्रतिशत काम करना ही नहीं चाह रहा है। - फोटो : social media

मल्टीवर्स की मरीचिका 

इसे विडंबना ही कहिए कि आज के युवा का टैलेंटेड स्वरूप उसके लिए कई ऐसे रास्तों को खोल रहा है जिनपर चलना केवल उसके लिए ही नहीं सबके लिए खतरा पैदा कर सकता है। उसकी प्रतिभा ही उसके लिए अभिशाप बनती जा रही है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण इंटरनेट की वर्चुअल दुनिया के जरिये समझा जा सकता है, जो अपराध, प्रताड़ना, एब्यूज़ और छद्म रिश्तों की दुनिया बनती जा रही है।

 

एक निजी कम्पनी के लिए प्लेसमेंट का काम करने वाली एक परिचित ने कुछ दिनों पहले बताया कि, उसके पास 12 वीं या ग्रेजुएशन के बाद जॉब करने के इच्छुक लोगों के कॉल तो आते हैं लेकिन सबको ऐसा जॉब चाहिए जहां 25-30 हजार सैलेरी हो, ग्लैमर हो और अच्छी प्रोफ़ाइल हो। उक्त परिचित ने हंसते हुए कहा- मैं समझा कर परेशान हूँ कि जॉब तुम्हारी पढ़ाई, स्किल, एक्सपीरियंस और टैलेंट के ऊपर निर्भर करता है। उसके बाद मेहनत से तुम और अच्छा कमा सकते हो लेकिन नहीं सबको रातों रात सीईओ का जॉब चाहिए। वो भी बिना किसी टैलेंट के। उनकी भी गलती नहीं है। उनमें से कुछ लोग हजारों रुपये तो वर्चुअल दुनिया मे रील बनाकर या गेम खेलकर पा जाते हैं। तो बाकियों को भी ऐसा ही पैसा चाहिए।

 
एक राष्ट्रीय सर्वे के अनुसार देश की काम करने लायक कानूनी उम्र के 450 मिलियन के करीब आबादी में से बड़ा प्रतिशत काम करना ही नहीं चाह रहा है। मुम्बई की एक निजी फर्म, सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी प्राइवेट की इसी साल आई इस रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार लाखों युवाओं ने सही नौकरी न मिलने के कारण फ्रस्ट्रेशन में नौकरियां छोड़ दी हैं। इनमे एक बड़ा प्रतिशत महिलाओं का भी है।
 
अभी करीब 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष की उम्र के अंतर्गत आयी है। यानी आने वाले कुछ साल हमारे देश के लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। क्योंकि इसके बाद तो फिर अधेड़ों और बूढ़ों की संख्या में ही इजाफा होना है।

कई शताब्दियों पहले एक ऐसे यूनिवर्स की कल्पना की गई जिसे मल्टीवर्स यानी अनंत ब्रम्हांड कहा गया। मार्वल कॉमिक्स या एवेंजर्स को जानने वाली आज की जेनरेशन भी इस शब्द से वाकिफ है। अनंत ब्रम्हांड यानी जहां एक साथ कई यूनिवर्स इकट्ठे हो जाते हों। हर यूनिवर्स में आपकी अलग पहचान है। एक में अगर आप हीरो हैं तो हो सकता है किसी में आप विलेन भी हों। मार्वल कॉमिक्स और सुपरहीरोज़ की दुनिया से इतर इस मल्टीवर्स को लेकर कई वैज्ञानिकों और विचारकों ने विभिन्न थ्योरीज़ भी दी हैं।

खैर, तो इस मल्टीवर्स की ही तरह आज के भारतीय युवा भी एक साथ कई यूनिवर्स में जी रहे हैं। उन्हें रातोंरात पैसा भी कमाना है, रिश्तों से लेकर जॉब तक में फटाफट सफल होना है, कम मेहनत में ज्यादा पाना है और इसके साथ ही उन्हें अपने इमोशनल सेल्फ को भी सपोर्ट करना है। ये आसान नहीं है। खासकर उस देश मे जहां बच्चे के अंडरवियर-बनियान से लेकर उसके करियर और दूल्हा-दुल्हन तक का चयन पैरेंट्स करने पर उतारू रहते हैं। ये सब करने वालों का प्रतिशत 70 के करीब है, या उससे भी ज्यादा। इसलिए ये तो कहिएगा ही मत कि अब तो लड़का/लड़की अपने निर्णय खुद लेते हैं। ना जी, अब भी ऐसा करने वाले युवा बहुत कम हैं। जो कर लेते हैं, वे विद्रोही करार दिए जाते हैं।

Azadi Ka Amrit Mahotsav: Indian youth and the illusion of multiverse
सही गलत के असमंजस में युवा: आप और हम भी यदि अपने घरों में, अपने आस पास बच्चों से संवाद बनाए रखें तो उम्मीदों का उजाला अवश्य फैलेगा। - फोटो : पिक्साबे

भ्रम में जीवन दुविधा में युवा

पिछले 5 सालों से ठीक काम करने वाले मेरे फोन ने अब उम्र का तकाजा पेश करना शुरू कर दिया था। नया फोन लाना ही होगा ये सोचकर घर से निकले। दुकान पर पहुंच कर देखा ठीक ठाक फीचर वाले फोन किफायती दामों पर थे। दुकानदार अभी डेमो दे ही रहा था कि 3 नौजवान भीतर आए। आते ही उन्होंने दुकानदार से सबसे महंगे फोन की पड़ताल की। उस फोन को देखने के बाद उन्होंने उसकी ईएमआई (मासिक किश्त) के बारे में पूछा और दुकानदार ने 5 हजार कुछ रुपये बताए। जिस बच्चे को फोन खरीदना था उसने बिना झिझके इस ईएमआई के लिए हां भर दी। उसके डॉक्युमेंट्स देखने के बाद दुकानदार का पहला रिएक्शन था-'बेटे आप तो स्टूडेंट हो, वो भी सिर्फ 16 साल के। ये फोन तो एक्ज़ीक्यूटिव्स वगैरह के लिए है। आपको इससे कम में अच्छा फोन मिल जाएगा।' शायद दुकानदार भी मेरी पीढ़ी वाला रहा होगा। लेकिन वो बच्चा उसी फोन से संतुष्ट था। तीनों ही बच्चे वेशभूषा और बोलचाल से साधारण मध्यमवर्गीय परिवार के लग रहे थे। उस समय बच्चों के पास शायद कुछ राशि नही थी, इसलिए वे कुछ दिन बाद आने का कहकर चले गए।

उनके जाते ही दुकानदार व्यथित होकर बोला- रोज कम से कम 2 बच्चे ऐसे आते हैं। कोशिश करता हूँ कि उन्हें समझा सकूं। माँ बाप पढ़ाई में पैसा लगा रहे हैं और औलादों को शो ऑफ करना है। गलती उनकी भी क्या कहूँ। दुनिया दिखावे वाली हो गई है और माँ बाप के पास बच्चों से बात करने को टाइम ही नहीं है। मैं इससे ज्यादा और क्या कर सकता हूँ। धंधा भी करना है और मैं नही बेचूंगा तो वो दूसरी जगह से खरीद लेंगे।'

मैं उससे सहमत थी। घर वापस आते समय मेरे दिमाग में थे ढेर सारे प्रश्न। क्या वो बच्चा इतनी पॉकेटमनी पाता होगा? इस ईएमआई की भरपाई वो कैसे करेगा? क्या उसके पैरेंट्स को वाकई मालूम होगा कि उनका बच्चा क्या कर रहा है? क्या फोन की इस लालसा का यही अंत होगा? आदि, इत्यादि।
 

हमारे देश में फिलहाल युवाओं के तीन वर्ग हैं। पहला वो जो दिन रात या तो खुद के चुने या माँ बाप के सुझाए करियर और पैकेज को पाने के लिए मेहनत कर रहा है और एक दिन किसी और देश को सेवाएं देगा। दूसरा वो जिसके पास अकूत साधन और संपन्नता है और उसका जीवन धुएं और बादलों में उड़ रहा है। और तीसरा वो जिसके पास ज्यादा कुछ नही लेकिन उसे रातों रात अमीर और फेमस बनना है। तीनों ही स्थितियों में नुकसान तो देश का ही है। ऐसे में कुछ साल पहले एक फौजी कैप्टन से हुई मुलाकात याद आती है।


दरअसल, मात्र 28 साल के उस नौजवान ने बहुत उदास होते हुए कहा था-'दीदी, फौज में अब भी ढेर सारे पोस्ट खाली हैं। यंगस्टर्स यहां आना भी चाहते हैं तो इसलिए कि पक्की सरकारी नौकरी मिलेगी। देश के लिए जान देने का जज्बा कम से कम है। खुद मेरे साथ पढ़ने वाले ज्यादातर दोस्त विदेशों में हैं। लेकिन मुझे इस वर्दी से प्यार है और मुझे यकीन है कि आने वाले टाइम में फिर से लोग सेना से जुड़ने में इसी जज्बे को दिखाएंगे। कहते कहते उसकी आंखों में चमक जाग उठी। तो दुआ यही है कि ईश्वर उसके उसके भरोसे को हमेशा बनाये रखें।
 
आप और हम भी यदि अपने घरों में, अपने आस पास बच्चों से संवाद बनाये रखें तो उम्मीदों का उजाला अवश्य फैलेगा। दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र की अगली पीढ़ी को दिशा देने की जिम्मेदारी आखिर हमें भी तो लेनी होगी।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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