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भारत और वैदिक विज्ञान: कहानी, फिजिक्स, केमेस्ट्री, मैथ्स और सर्जरी में हजारों साल पहले हुए प्रयोगों की

Dr. Praveen Tiwari डॉ.प्रवीण तिवारी
Updated Thu, 05 Aug 2021 10:56 AM IST
सार

आधुनिक विज्ञान के रास्ते पर बहुत आगे निकल चुकी दुनिया के ज्ञान का एक सिरा प्राचीन भारत के एक संसार में जाकर भी खुलता है। खोजी, अनुसंधानकर्ता और जिज्ञासु विद्वजन की दृष्टि के बूते ही प्रगति, समृृद्धि और विज्ञान की असीम संभावनाओं के साथ जी रहा आधुनिक विश्व भारतीय वैदिक सभ्यता और ज्ञान परंपरा का ना केवल ऋणि है बल्कि कृतज्ञ भी है।

दरअसल, वो हमारे पुरखे ही थे जिन्होंने  कैमेस्ट्री, मैथ्स, फिजिक्स और चिकित्सा शास्त्र के प्रारंभिक सूत्र देकर मानवजाति का कल्याण किया। फिर भला उन्हें याद क्यों ना किया जाए और उनके कामों की स्मृतियों को नई पीढ़ी के साथ साझा क्यों ना किया जाए? 

प्राचीन भारत और वैदिक ज्ञान-विज्ञान की कहानियों की इस श्रृंखला में डॉ. प्रवीण तिवारी बता रहे हैं  उन ऋषियों व दार्शनिकों की कहानी, जिनसे शुरू हुई गणित, मेडिकल साइंस और फिजिक्स की नई धारा। 

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Ancient Indian mathematics and physics chemistry maths in ancient india know about  Baudhayana sutras
समकोण त्रिभुज से सम्बन्धित पाइथागोरस प्रमेय सबसे पहले महर्षि बोधायन की देन है। पायथागोरस का जन्म तो ईसा के जन्म के 8 वी शताब्दी पहले हुआ था। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारत भूमि पर ज्ञान-विज्ञान की जो परंपरा रही है उसे हम दो तरह से समझ सकते हैं। पहला भौतिकी, रसायन और गणित आदि पर लिखे गए ग्रंथों का अध्ययन और दूसरा इनके रचयिता वैज्ञानिकों, जिन्हें हम ऋषि मुनि या आचार्यों के तौर पर संबोधित करते थे। भारत ने निर्विवाद रूप से गणित के क्षेत्र में दुनिया को बहुत कुछ दिया है।

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आइंस्टीन तो यहां तक कह गए कि दुनिया को भारत का आभारी रहना चाहिए क्योंकि उसने पूरी दुनिया को गणितीय गणनाएं या गिनना सिखाया है। हमारे देश से सिर्फ धन धान्य नहीं लूटा गया बल्कि वैज्ञानिक सिध्दांतों की या तो चोरी हुई या उन्हें नष्ट कर दिया गया।
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इसके पीछे की महत्वपूर्ण वजह थी बाकी सभ्यताओं का पिछड़ापन और ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में आधारभूत कमियां। ये ज्ञान-विज्ञान की चोरी भी उन्हीं के काम की होती है जो पहले से थोड़ा बहुत जानते हैं। 
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भारत के इन महान वैज्ञानिकों के बारे में हम सभी को जानना चाहिए क्योंकि इन्होंने ही हमारी वैदिक परंपरा को सही मायनों में समझा और आगे की पीढ़ियों को समझाया। ऐसे ही कुछ महान वैज्ञानिकों के विषय में ये लेख जानकारी देता है। यूं तो ये विषय बहुत विस्तारित है लेकिन इस लेख में हम फिजिक्स, केमेस्ट्री, मैथ्स, सर्जरी और आयुर्वेद के क्षेत्र में योगदान देने वाले प्राचीनतम भारतीय वैज्ञानिकों की बात करेंगे। 


बोधायन के शुल्ब सूत्र और पाइथागोरस 

महान वैज्ञानिकों के बारे में जानने से पहले हमे साहित्य की चोरी को समझना होगा। चोरी वही करता है जिसके लिए चुराए हुए सामान का कोई मूल्य हो। ज्यादातर हमलावर हमारे गौरवशाली अतीत के अंशों को ध्वस्त करते गए क्योंकि वे ज्ञान विज्ञान से अपरिचित थे, लेकिन युनान जैसी कई सभ्यताएं थीं जो इन ग्रंथों और सिध्दांतों को अपनी भाषा में अनुवादित करने का काम करते रहे। ये लोग निश्चित तौर पर पहले से काम कर रहे थे, लेकिन उतने उन्नत नहीं थे जितने भारत के वैज्ञानिक। 

उदाहरण के लिए पाइथागोरस गणित जानते थे इसीलिए उन्होंने बोधायन के शुल्ब सूत्र को युनान ले जाकर बोधायन की एक प्रमेय को अपने नाम से प्रचलित करवाया। निश्चित तौर पर पाइथागोरस बोधायन को श्रेय देते, लेकिन बाद के विचारकों में अहम का भाव रहा होगा और वो भारत के ज्ञान-विज्ञान को सर्वोत्कृष्ट मानने से बचते रहे। रही-सही कसर हमारे ‘अध्यात्मिक युध्दों’ ने पूरी कर दी। 

बौद्ध और जैन विचारधाराओं के प्रादुर्भाव ने बहुत कुछ बचाया तो बहुत कुछ नष्ट भी हो गया क्योंकि उस समय गणित, भौतिकी, रसायन, खगोल आदि शास्त्रों से अधिक लड़ाई मत मतांतर की हो गई थी। इस सबके बावजूद हमारे गौरवशाली अतीत के अंश उन महान वैज्ञानिकों के जीवन के रूप में मौजूद है जिन्होंने हमारी विज्ञान परंपरा को इतना समृध्द बनाया था। इनमें से कुछ महत्वपूर्ण नामों के बारे में इस लेख के जरिए जानते हैं। निश्चित तौर पर इनके बारे में विस्तार से लिखा जाना चाहिए, लेकिन ये भी महत्वपूर्ण होगा कि पहले हम इन नामों और इनके काम को जान लें। 

 

  1. बौधायन (800 से 600 ई. पू. शुल्ब सूत्र संपादित हुए) (गणित) 

समकोण त्रिभुज से सम्बन्धित पाइथागोरस प्रमेय सबसे पहले महर्षि बोधायन की देन है। पायथागोरस का जन्म तो ईसा के जन्म के 8 वी शताब्दी पहले हुआ था। ये वही समय है जब बौधायन द्वारा रचित शुल्ब सूत्र के संपादन का कार्य भारत के की गणितज्ञ कर रहे थे। हमारे यहां इसे ईसा के जन्म के 15 वी शताब्दी पहले से ही ये पढ़ायी जाती थी। बौधायन का यह निम्न लिखित सूत्र है : 

दीर्घचतुरश्रस्याक्ष्णया रज्जुः पार्श्वमानी तिर्यग् मानी च यत् पृथग् भूते कुरूतस्तदुभयं करोति ॥ 
अर्थ- विकर्ण पर कोई रस्सी तानी जाए तो उस पर बने वर्ग का क्षेत्रफल ऊर्ध्व भुजा पर बने वर्ग तथा क्षैतिज भुजा पर बने वर्ग के योग के बराबर होता है। 

 

यह कथन 'पाइथागोरस प्रमेय' का सबसे प्राचीन लिखित कथन है। 

वे शुल्ब सूत्र के साथ ही श्रौतसूत्र के भी रचयिता थे। पाइथागोरस की तरह युक्लिड भी युनानी गणितज्ञ थे। उन्हीं की ज्यामिति को पूरे विश्व में माना जाता है लेकिन यूक्लिड द्वारा दिए गए सिध्दांतों को भी बौधायन सैंकड़ों साल पहले भारत में दे चुके थे। निश्चित तौर पर वो भी दूसरे दार्शनिकों की तरह भारत के वैदिक गणित से वाकिफ थे। भारत में रेखागणित या ज्यामिति को शुल्व शास्त्र भी कहा जाता था। बौधायन के सूत्र वैदिक संस्कृत में हैं तथा धर्म, दैनिक कर्मकाण्ड, गणित आदि से सम्बन्धित हैं।  

 

बौधायन सूत्र के अन्तर्गत निम्नलिखित 6 ग्रन्थ आते हैं- 

1. बौधायन श्रौतसूत्र - यह सम्भवतः 19 प्रश्नों के रूप में है। 
2. बौधायन कर्मान्तसूत्र - 21 अध्यायों में 
3. बौधायन द्वैधसूत्र - 4 प्रश्न 
4. बौधायन गृह्यसूत्र - 4 प्रश्न 
5. बौधायन धर्मसूत्र - 4 प्रश्नों में 
6. बौधायन शुल्बसूत्र - 4 अध्यायों में 

बाद में आर्यभट्ट, वराहमिहिर, भास्कराचार्य प्रथम एवं द्वितीय आदि जैसे कई गणितज्ञों ने भारतीय गणित को समृध्द किया।  

 

Ancient Indian mathematics and physics chemistry maths in ancient india know about  Baudhayana sutras
सुश्रुत संहिता में शल्य चिकित्सा के विभिन्न पहलुओं को विस्तार से समझाया गया है। शल्य क्रिया के लिए सुश्रुत 125 तरह के उपकरणों का प्रयोग करते थे। - फोटो : Pixabay/Amarujala

सुश्रुत 800 ई. पू. (शल्य चिकित्सा) 

भारतीय प्राचीन शास्त्रों के विषय में ये कहा जाता है कि आप दुनिया के किसी ज्ञान-विज्ञान के बारे में सोचिए और आपको वो वहां मिल जाएगा। गणित ही नहीं चिकित्सा क्षेत्र में भी भारत में हजारों साल पहले महत्वपूर्ण कार्य हो चुके हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में जिनका सबसे ज्यादा कार्य आज भी मिलता है वो सुश्रुत हैं। सुश्रुत उस ईसा से 800 वर्ष पूर्व भी शल्य चिकित्सा करते थे। यानी भारत में सर्जरी का इतिहास कितना पुराना है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

दरअसल, उन्होंने आधुनिक चिकित्साशास्त्र से हजारों साल पहले सुश्रुत संहिता की रचना की थी। आप इसी से उनके कार्य का अंदाजा लगा लीजिए कि आज से 2500 साल पहले वो प्लास्टिक सर्जरी जैसी शल्यक्रियाओं को अंजाम दिया करते थे। इसके साक्ष्य अंग्रेजों के भारत आने पर भी मिलते थे।

फर्स्ट नोज सर्जरी के नाम से जिस सर्जरी को ब्रिटिश चिकित्सकों ने प्रचारित किया वो दक्षिण के ग्रामीण इलाकों में हुआ करती थी। उस वक्त भारत में सुश्रुत संहिता का बहुत सम्मान था और उसी के आधार पर शल्य क्रियाएं होती थीं।  

सुश्रुत संहिता में शल्य चिकित्सा के विभिन्न पहलुओं को विस्तार से समझाया गया है। शल्य क्रिया के लिए सुश्रुत 125 तरह के उपकरणों का प्रयोग करते थे। ये उपकरण शल्य क्रिया की जटिलता को देखते हुए खोजे गए थे। इन उपकरणों में विशेष प्रकार के चाकू, सुइयां, चिमटियां आदि हैं।

सुश्रुत ने 300 प्रकार की ऑपरेशन प्रक्रियाओं की खोज की। सुश्रुत ने कॉस्मेटिक सर्जरी में विशेष निपुणता हासिल कर ली थी। सुश्रुत नेत्र शल्य चिकित्सा भी करते थे। सुश्रुतसंहिता में मोतियाबिंद के ऑपरेशन करने की विधि को विस्तार से बताया गया है। उन्हें शल्य क्रिया द्वारा प्रसव कराने का भी ज्ञान था।

सुश्रुत को टूटी हुई हड्डियों का पता लगाने और उनको जोडऩे में विशेषज्ञता प्राप्त थी। शल्य क्रिया के दौरान होने वाले दर्द को कम करने के लिए वे मद्यपान या विशेष औषधियां देते थे। मद्य संज्ञाहरण का कार्य करता था। इसलिए सुश्रुत को संज्ञाहरण का पितामह भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त सुश्रुत को मधुमेह व मोटापे के रोग की भी विशेष जानकारी थी।

सुश्रुत श्रेष्ठ शल्य चिकित्सक होने के साथ-साथ श्रेष्ठ शिक्षक भी थे। उन्होंने अपने शिष्यों को शल्य चिकित्सा के सिद्धांत बताये और शल्य क्रिया का अभ्यास कराया। प्रारंभिक अवस्था में शल्य क्रिया के अभ्यास के लिए फलों, सब्जियों और मोम के पुतलों का उपयोग करते थे।

मानव शरीर की अंदरूनी रचना को समझाने के लिए सुश्रुत शव के ऊपर शल्य क्रिया करके अपने शिष्यों को समझाते थे। इन्होंने शल्य चिकित्सा के साथ-साथ आयुर्वेद के अन्य पक्षों जैसे शरीर सरंचना, काय चिकित्सा, बाल रोग, स्त्री रोग, मनोरोग आदि की जानकारी भी दी। 

 

कणाद 600 ई. पू. (भौतिकी) 

फिजिक्स या भौतिकी के क्षेत्र में महर्षि कणाद का योगदान अतुलनीय है। उनका नाम कणाद ही कणों पर काम करने की वजह से पड़ा। आज अणु परमाणुओं के लिए जिन नियमों पर चर्चा होती है ऐसे की नियम आचार्य कणाद आज से 2600 साल पहले दे चुके थे। वे परमाणु संरचना पर सर्वप्रथम प्रकाश डालने वाले महापुरूष थे। आचार्य कणाद का जन्म 600 ईसा पूर्व हुआ था। उनका नाम आज भी डॉल्टन के साथ जोड़ा जाता है, क्योंकि पहले कणाद ने बताया था कि पदार्थ अत्यन्त सूक्ष्म कणों से बना हुआ हैंI उनका यह विचार दार्शनिक था, उन्होंने इन सूक्ष्म कणों को परमाणु नाम दिया। बाद में डॉल्टन ने परमाणु का सिद्धांत प्रस्तुत किया। परमाणु को अंग्रेजी भाषा में एटम कहते हैं।
 

कणाद का कहना था– "यदि किसी पदार्थ को बार-बार विभाजित किया जाए और उसका उस समय तक विभाजन होता रहे, जब तक वह आगे विभाजित न हो सके, तो इस सूक्ष्म कण को परमाणु कहते हैं। परमाणु स्वतंत्र रूप से नहीं रह सकते। परमाणु का विनाश कर पाना भी सम्भव नहीं हैं।" 

 


वायुपुराण में उनका जन्म स्थान प्रभास पाटण बताया है। स्वतंत्र भौतिक विज्ञानवादी दर्शन प्रकार के आत्मदर्शन के विचारों का सबसे पहले महर्षि कणाद ने सूत्र रूप में लिखा। कण अर्थात् परमाणु तत्व का सूक्ष्म विचार इन्होंने किया है, इसलिए इन्हें "कणाद" कहते हैं। वैशेषिक भारतीय दर्शनों में से एक दर्शन है। इसके मूल प्रवर्तक ऋषि कणाद हैं। यह एक स्वतंत्र भौतिक विज्ञानवादी दर्शन है। इसके अलावा महर्षि कणाद ने ही न्यूटन से पूर्व गति के तीन नियम बताए थे। 

 

वेगः निमित्तविशेषात कर्मणो जायते। वेगः निमित्तापेक्षात कर्मणो जायते नियतदिक क्रियाप्रबन्धहेतु। वेगः संयोगविशेषविरोधी॥ वैशेषिक दर्शन, अर्थात् वेग या मोशन (motion) पांचों द्रव्यों पर निमित्त व विशेष कर्म के कारण उत्पन्न होता है तथा नियमित दिशा में क्रिया होने के कारण संयोग विशेष से नष्ट होता है या उत्पन्न होता है। 

 

 

चरक 200 से 300 ई. पू. (आयुर्वेद) 

200-300 ई. पूर्व आयुर्वेद के आचार्य महर्षि चरक हए थे, जिनकी गणना भारतीय औषधि विज्ञान के मूल प्रवर्तकों में होती है। चरक की शिक्षा तक्षशिला में हुई। इनका रचा हुआ ग्रंथ 'चरक संहिता' आज भी वैद्यक का अद्वितीय ग्रंथ माना जाता है। चरक एक महर्षि एवं आयुर्वेद विशारद के रूप में विख्यात हैं। वे कुषाण राज्य के राजवैद्य थे। चरक संहिता में रोगनाशक एवं रोगनिरोधक दवाओं का उल्लेख है तथा सोना, चांदी, लोहा, पारा आदि धातुओं के भस्म एवं उनके उपयोग का वर्णन मिलता है।

आचार्य चरक ने आचार्य अग्निवेश के अग्निवेशतन्त्र में कुछ स्थान तथा अध्याय जोड्कर उसे नया रूप दिया जिसे आज चरक संहिता के नाम से जाना जाता है। इस बात से ये भी स्पष्ट होता है कि उनसे बहुत पहले से ही मेडिकल साइंस के क्षेत्र में भारत में कार्य हो रहा था। निश्चित तौर पर उन्होंने इसे और परिष्कृत और समृध्द बनाया। 

 

Ancient Indian mathematics and physics chemistry maths in ancient india know about  Baudhayana sutras
महान रसायन शास्त्री प्रफुल्ल चंद्र रे की पुस्तक द हिस्ट्री ऑफ हिंदु केमेस्ट्री में विस्तार से भारत के समृध्द प्राचीन रसायन या रस शास्त्र - फोटो : सोशल मीडिया

अब बात करते हैं युनानी और अन्य विधाओं की। दरअसल आठवीं शताब्दी में इस ग्रंथ का अरबी भाषा में अनुवाद हुआ और यह शास्त्र पश्चिमी देशों तक पहुंचा। चरक संहिता में व्याधियों के उपचार तो बताए ही गए हैं, प्रसंगवश स्थान-स्थान पर दर्शन और अर्थशास्त्र के विषयों की भी उल्लेख है। उन्होंने आयुर्वेद के प्रमुख ग्रन्थों और उसके ज्ञान को इकट्ठा करके उसका संकलन किया।

चरक ने भ्रमण करके चिकित्सकों के साथ बैठकें की, विचार एकत्र किए और सिद्धांतों को प्रतिपादित किया और उसे पढ़ाई लिखाई के योग्य बनाया । भारतीय चिकित्सा परंपरा को इसी से समझ लीजिए कि चरकसंहिता आयुर्वेद में प्रसिद्ध है, लेकिन इसके उपदेशक अत्रिपुत्र पुनर्वसु, ग्रंथकर्ता अग्निवेश और प्रतिसंस्कारक चरक बताए गए हैं। 

चरकसंहिता में पालि साहित्य के कुछ शब्द मिलते हैं, जैसे अवक्रांति, जेंताक (जंताक-विनयपिटक), भंगोदन, खुड्डाक, भूतधात्री (निद्रा के लिए)। इससे चरकसंहिता का उपदेशकाल उपनिषदों के बाद और बुद्ध के पूर्व निश्चित होता है। इसका प्रतिसंस्कार कनिष्क के समय 78 ई. के लगभग हुआ। 


नागार्जुन (50 ई. पू. से 150 ईसवी) (रसायन शास्त्र) 

महान रसायन शास्त्री प्रफुल्ल चंद्र रे की पुस्तक द हिस्ट्री ऑफ हिंदु केमेस्ट्री में विस्तार से भारत के समृध्द प्राचीन रसायन या रस शास्त्र के बारे में लिखा गया है। पुरातन भारतीय रसायन शास्त्र के साक्ष्य नागार्जुन द्वारा रचित ग्रंथों से मिलते हैं। इनका जन्म महाकौशल मे हुआ था जिसकी राजधानी श्रीपुर थी जिसे वर्तमान मे छत्तीसगढ कहते है। नागार्जुन का जन्म 50 ई.पू. से 120 ईसवी तक माना जाता है। 

महाराष्ट्र के नागलवाड़ी ग्राम में उनकी प्रयोगशाला होने के प्रमाण मिले हैं। कुछ प्रमाणों के अनुसार वे 'अमरता' की प्राप्ति की खोज करने में लगे हुए थे और उन्हें पारे और लोहे के निष्कर्षण का ज्ञान था। 

रस रत्नाकर उनकी प्रसिध्द रचना है लेकिन अन्य रचनाओं की तरह इसे भी लगातार इनके बाद के कई विद्वानों ने संकलित और संपादित किया। इसलिए कई बार इसके रचनाकारों को लेकर भ्रम की स्थिति बनती है। किंतु रस रत्नाकर ग्रंथ से ये तो सिध्द होता है कि रसायन शास्त्र का इतिहास भारत में अत्यंत प्राचीन था।  

नागार्जुन ने ही अलकेमी की आधारशिला रखी थी, ये वो पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने अन्य धातुओं को सोने में बदलने की विधि का वर्णन किया है। उन्होंने इसका सफलता पूर्वक प्रदर्शन भी किया था। 

नागार्जुन ने रसायन शास्त्र और धातु विज्ञान पर बहुत शोध कार्य किया। रसायन शास्त्र पर इन्होंने कई पुस्तकों की रचना की जिनमें 'रस रत्नाकर' और 'रसेन्द्र मंगल' बहुत प्रसिद्ध हैं। रसायनशास्त्री व धातुकर्मी होने के साथ साथ इन्होंने अपनी चिकित्सकीय सूझबूझ से अनेक असाध्य रोगों की औषधियाँ तैयार की। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में इनकी प्रसिद्ध पुस्तकें 'कक्षपुटतंत्र', 'आरोग्य मंजरी', 'योग सार' और 'योगाष्टक' हैं। 


रस-रत्नाकर ग्रंथ में मुख्य रस माने गए निम्न रसायनों का उल्लेख किया गया है- 

(1) महारस (2) उपरस (3) सामान्यरस (4) रत्न (5) धातु (6) विष (7) क्षार (8) अम्ल (9) लवण (10) भस्म। 

जिनमें महारस - (1) अभ्रं (2) वैक्रान्त (3) भाषिक (4) विमला (5) शिलाजतु (6) सास्यक (7) चपला (8) रसक आदि हैं। उपरस: - (1) गंधक (2) गैरिक (3) काशिस (4) सुवरि (5) लालक (6) मन: शिला (7) अंजन (8) कंकुष्ठ। सामान्य रस- (1) कोयिला (2) गौरीपाषाण (3) नवसार (4) वराटक (5) अग्निजार (6) लाजवर्त (7) गिरि सिंदूर (8) हिंगुल (9) मुर्दाड श्रंगकम्। इसी प्रकार दस से अधिक विष भी बताए गए हैं। 

रस रत्नाकर अध्याय 9 में रसशाला यानी प्रयोगशाला का विस्तार से वर्णन भी है। इसमें 32 से अधिक यंत्रों का उपयोग किया जाता था, जिनमें मुख्य हैं- (1) दोल यंत्र (2) स्वेदनी यंत्र (3) पाटन यंत्र (4) अधस्पदन यंत्र (5) ढेकी यंत्र (6) बालुक यंत्र (7) तिर्यक् पाटन यंत्र (8) विद्याधर यंत्र (9) धूप यंत्र (10) कोष्ठि यंत्र (11) कच्छप यंत्र (12) डमरू यंत्र। 

यूं तो ये एक विस्तारित ग्रंथ है लेकिन इन कुछ उद्धरणों से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन्होंने रसायन शास्त्र पर महत्वपूर्ण शोध किए थे। 

भारत में भौतिकी, रसायन, गणित, चिकित्सा, आयुर्वेद आदि पर तो गंभीर शोध हुए ही, अध्यात्म और योग की दृष्टि से भारत ने मनोविज्ञान के क्षेत्र में भी अतुलनीय योगदान दिया। एक आलेख में समस्त इतिहास को समेटना संभव नहीं होता। वेद और विज्ञान की इस कड़ी में कुछ और महत्वपूर्ण जानकारियों को आगे भी आपके साथ साझा करेंगे।  



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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