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Ameen Sayani: जैसे अमीन सयानी नहीं हिंदुस्तान बोल रहा हो!

Wed, 21 Feb 2024 02:23 PM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Wed, 21 Feb 2024 02:23 PM IST
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Ameen Sayani passes away the radio show remembered throughout  generation Pankaj Shukla exclusive updates
अमीन सयानी - फोटो : सोशल मीडिया
ये बात उन दिनों की है जब घर में रेडियो रखने के लिए भी लाइसेंस लेना होता था। इमरजेंसी लग चुकी थी और पापा ने सरकारी नौकरी छोड़कर गांव के बच्चों को 11वीं और 12वीं में अंग्रेजी पढ़ाने का फैसला कर लिया था। बचपन में जोधपुर के कॉन्वेंट स्कूल से निकलकर गांव के करीब प्राइमरी स्कूल, कोलवा में आने का ये जो ‘अलौकिक’ सा अनुभव था, उसमें हर हफ्ते बड़े भाई, मम्मी और पापा के साथ फिल्म देखने का मौका तो छूटा ही, और भी तमाम चीजें साथ छोड़ती रहीं। लेकिन, पापा जोधपुर से एक अदद जो मेरी सबसे प्रिय वस्तु साथ लाए थे, वह थी रेडियो। पूरा रविवार बस रेडियो और मैं। एस कुमार्स का फिल्मी मुकदमा मेरा फेवरिट प्रोग्राम बन चुका था और तभी पता ये चला कि कोई तो स्टेशन है जो अगर रेडियो पकड़ ले तो नए फिल्मी गानों से फिजा महक सकती है।
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रेडियो सीलोन का सिग्नल रेडियो को गोल पहिया घुमा कर और लाल निशान को एक मिमी से भी कम स्थान के बीच संतुलित कर पाने की साधना जिसने कर ली थी, रेडियो उस रोज उसी के कब्जे में रहता था। जिस दिन उनके कार्यक्रम की पहली लाइन ‘बहनों और भाइयों, मैं आपका दोस्त अमीन सयानी बोल रहा हूं!’ सुनने को मिल जाए, यूं लगता था कि वाकई हमने अर्जुन की तरह नीचे पानी में देखकर ऊपर घूमते चक्र के पार टंगी मछली वेध दी है। कुछ ऐसा ही होता था रेडियो सीलोन स्टेशन का फिलिप्स के रेडियो में पकड़ लेना। अक्सर दो तीन गाने तो बस रेडियो सीलोन का सिगनल पकड़वाने में ही निकल जाते और फिर अगर सिगनल मिल भी जाए तो रेडियो को एक खास दिशा में साधकर बैठना भी कम चुनौती भरा नहीं होता था।
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बिनाका गीतमाला में जो गीत बजते, उन्हीं गीतों पर उन दिनों जब रात रात भर चलने वाली नौटंकियों में राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर जैसी वेशभूषा धरे नर्तक-नर्तकियां स्वांग रचते तो अमीन सयानी की आवाज बार बार फिर कानों में गूंजती। उनका हर पायदान पर बजने वाले गीतों का जिस अंदाज में परिचय कराना औरउसके चलते उन सुपरहिट गीतों के गीतकारों और संगीतकारों के नाम याद हो जाना भी कुछ कमाल नहीं था। बिनाका गीतमाला से मेरा ये परिचय साल 1975-76 के आसपास बना। उन दिनों विविध भारती पर ले देकर बस सुबह का चित्रलोक और रात का छायागीत ही फिल्मी गीतों से मनोरंजन के दो जरिये थे। लेकिन रेडियो सीलोन में तो बिल्कुल नए नए गीत बजते और वह भी लगातार, धुआंधार। अमीन सयानी की आवाज का सम्मोहन अलग। और, फिर तो जब भी किसी विज्ञापन में ये एक अलग सा ही ओज लिए अमीन सयानी की आवाज सुनाई पड़ती यूं लगता कि बिनाका गीतमाला ही चल रहा है।
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एस कुमार्स का फिल्मी मुकदमा अपना रंग जमा ही चुका था। लेकिन उसके पहले विविध भारती का जो पहला प्रायोजित कार्यक्रम सेरिडॉन के साथी शुरू हुआ, उसमें भी तो आवाज अमीन सयानी की ही थी। शालीमार सुपरलैक जोड़ी और भी न जाने कितने प्रायोजित कार्यक्रमों की शान अमीन सयानी की आवाज के बूते ही होती थी। अमीन सयानी को ही रेडियो को वह पहला उद्घोषक माना जाता है जिन्होंने हिंदी को साहित्यिक भाषा से निकालकर आम बोल चाल की भाषा के रूप में रेडियो पर जगह दी। उनकी आवाज में हिंदी के साथ उर्दू, फारसी और अरबी शब्द यूं घुल मिल जाते जैसे अमीन सयानी नहीं हिंदुस्तान बोल रहा हो। बोली की ये रंगत उन्हें अपनी मां कुलसुम सयानी से हासिल हुई जो सन 60 तक कोई 20 साल हिंदी, उर्दू और गुजराती में एक अखबार रहबर निकालती रहीं थी और अमीन सयानी उनके काम में खूब हाथ बंटाया करते।


अमीन सयानी के बड़े भाई हमीद सयानी का रेडियो पर बड़ा नाम रहा है। अंग्रेजी उद्घोषकों में वह अव्वल दर्जे के उद्घोषक रहे। अमीन ने अपने बड़े भाई को ही अपना गुरु माना। अदा भाई से और भाषा मां से लेकर अमीन सयानी ने अपना जो एक मुकाम रेडियो पर बनाया, उसके किस्से सात समंदर पार तक सुने जाते हैं। विदेश से मांग बढ़ी तो वह अपने रेडियो प्रोग्राम रिकॉर्डकर खाड़ी देशों और अमेरिका तक भेजने लगे। बीबीसी रेडियो पर उनका फिल्मी सितारों के इंटरव्यू का कार्यक्रम भी खूब मशहूर हुआ। रेडियो की मेरी पहली यादों में वैसे तो मोदी के मतवाले राही, हवामहल और कब्बन मिर्जा का नफासत से छायागीत कार्यक्रम में ‘आवाज की दुनिया के दोस्तों को कब्बन मिर्जा का आदाब’, कहना भी शामिल है। लेकिन एस कुमार्स का फिल्मी मुकदमा और बिनाका गीतमाला की हरियाली अब तक वैसी ही ताजा है जैसी कोई पचास साल पहले के अरते परते के मेरे बचपन में खिली रहती थी।
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