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कुरुक्षेत्र: सियासत के आकाश में धूमकेतु की तरह चमके थे अमर सिंह
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अमर सिंह। (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला।
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शाम को खबर आई कि सिंगापुर में इलाज करा रहे राज्यसभा सांसद अमर सिंह नहीं रहे। सिंह का कुछ वर्ष पहले किडनी प्रत्यारोपण हुआ था और उसके बाद से ही उनका स्वास्थ्य संतुलन बिगड़ गया था। अमर सिंह दरअसल भारतीय राजनीति के आकाश पर एक धूमकेतु की तरह उभरे और छा गए और उसी तरह उनका अवसान भी हो गया।
आज जिस राजनीतिक शैली के लिए भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और मौजूदा गृह मंत्री अमित शाह को मीडिया राजनीति के चाणक्य की उपमा देता है, अमर सिंह उस राजनीतिक शैली के पुरोधा थे। वो भी तब जबकि उनके पास महज एक नेता मुलायम सिंह के उत्तर प्रदेश में सीमित जनाधार और एक पार्टी जो एक राज्य तक ही सीमित थी, की ताकत और समर्थन था। जबकि अमित शाह के पास भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता नरेंद्र मोदी और देश के सत्ता तंत्र की ताकत, देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी समेत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सभी अनुषांगिक संगठनों के जनाधार और संगठन बल का समर्थन है।
बीसवीं सदी के आखिरी दशक की शुरुआत में जब देश और दुनिया में जिस आर्थिक उदारवाद और भूमंडलीकरण की शुरुआत हुई उससे राजनीति भी अछूती नहीं रही। इसी दौर में राष्ट्रीय राजनीति में नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी, हरिकिशन सिंह सुरजीत और सोनिया गांधी जैसे धीर गंभीर राजनेताओं का वर्चस्व बढ़ा तो देश के अनेक राज्यों में छत्रपों ने भी राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत हस्तक्षेप शुरू कर दिया था। हालांकि इसकी शुरुआत 1989 में केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह
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की अगुआई में बनी राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार से हो गई थी, जिसमें देवीलाल, चंद्रशेखर, एनटी रामराव, एम करुणानिधि, ज्योति बसु, बीजू पटनायक, रामकृष्ण हेगड़े, अजित सिंह, रामविलास पासवान, शरद यादव जैसे क्षेत्रीय छत्रपों का बोलबाला था।
लेकिन इन छत्रपों के स्वार्थों के टकराव और भाजपा की महत्वाकांक्षाओं ने इस प्रयोग को महज 10-11 महीनों में ही असफल कर दिया था। लेकिन 1990 के बाद जब नरसिंह राव सरकार के तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने आर्थिक उदारीकरण का वैश्विक एजेंडा लागू किया तो भारतीय राजनीति में भी विचार पर बाजार हावी होने लगा और विचार पर अड़े रहने वाले नेताओं ने या तो खुद को एक सीमा तक समझौता परस्त बना लिया या फिर वह राजनीति से बाहर होते चले गए।
इसी दौर में भारतीय राजनीति में तीन ऐसे नेताओं का उदय हुआ जो विचारधारा पर अड़ने से ज्यादा व्यवहारिक राजनीति को तरजीह देते हुए सियासी समझौते, सौदे और लचीलेपन के हिमायती थे। भाजपा में प्रमोद महाजन, कांग्रेस में अहमद पटेल और समाजवादी पार्टी में अमर सिंह इस बदलती राजनीति के प्रतीक बनकर उभरे। 1996 से 2004 तक अटल आडवाणी युग की भाजपा और एनडीए सरकार में प्रमोद महाजन ने संघ निष्ठ भाजपा में व्यवहारिक राजनीति की वो बुनियाद रखी जिस पर आज नरेंद्र मोदी और अमित शाह की सियासत की इमारत खड़ी है। इसी तरह इसी दौर में कांग्रेस में अहमद पटेल सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव बने और 2004 में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार बनवाने से लेकर 2014 तक उसे चलवाने में सियासत के सफर में जितने भी टेढे मेढ़े रास्ते अपनाए जा सकते थे, उन पर चलते हुए पटेल कांग्रेस के सबसे बड़े रणनीतिकार साबित हुए।
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आज जिस राजनीतिक शैली के लिए भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और मौजूदा गृह मंत्री अमित शाह को मीडिया राजनीति के चाणक्य की उपमा देता है, अमर सिंह उस राजनीतिक शैली के पुरोधा थे। वो भी तब जबकि उनके पास महज एक नेता मुलायम सिंह के उत्तर प्रदेश में सीमित जनाधार और एक पार्टी जो एक राज्य तक ही सीमित थी, की ताकत और समर्थन था। जबकि अमित शाह के पास भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता नरेंद्र मोदी और देश के सत्ता तंत्र की ताकत, देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी समेत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सभी अनुषांगिक संगठनों के जनाधार और संगठन बल का समर्थन है।
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बीसवीं सदी के आखिरी दशक की शुरुआत में जब देश और दुनिया में जिस आर्थिक उदारवाद और भूमंडलीकरण की शुरुआत हुई उससे राजनीति भी अछूती नहीं रही। इसी दौर में राष्ट्रीय राजनीति में नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी, हरिकिशन सिंह सुरजीत और सोनिया गांधी जैसे धीर गंभीर राजनेताओं का वर्चस्व बढ़ा तो देश के अनेक राज्यों में छत्रपों ने भी राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत हस्तक्षेप शुरू कर दिया था। हालांकि इसकी शुरुआत 1989 में केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह
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की अगुआई में बनी राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार से हो गई थी, जिसमें देवीलाल, चंद्रशेखर, एनटी रामराव, एम करुणानिधि, ज्योति बसु, बीजू पटनायक, रामकृष्ण हेगड़े, अजित सिंह, रामविलास पासवान, शरद यादव जैसे क्षेत्रीय छत्रपों का बोलबाला था।
लेकिन इन छत्रपों के स्वार्थों के टकराव और भाजपा की महत्वाकांक्षाओं ने इस प्रयोग को महज 10-11 महीनों में ही असफल कर दिया था। लेकिन 1990 के बाद जब नरसिंह राव सरकार के तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने आर्थिक उदारीकरण का वैश्विक एजेंडा लागू किया तो भारतीय राजनीति में भी विचार पर बाजार हावी होने लगा और विचार पर अड़े रहने वाले नेताओं ने या तो खुद को एक सीमा तक समझौता परस्त बना लिया या फिर वह राजनीति से बाहर होते चले गए।
इसी दौर में भारतीय राजनीति में तीन ऐसे नेताओं का उदय हुआ जो विचारधारा पर अड़ने से ज्यादा व्यवहारिक राजनीति को तरजीह देते हुए सियासी समझौते, सौदे और लचीलेपन के हिमायती थे। भाजपा में प्रमोद महाजन, कांग्रेस में अहमद पटेल और समाजवादी पार्टी में अमर सिंह इस बदलती राजनीति के प्रतीक बनकर उभरे। 1996 से 2004 तक अटल आडवाणी युग की भाजपा और एनडीए सरकार में प्रमोद महाजन ने संघ निष्ठ भाजपा में व्यवहारिक राजनीति की वो बुनियाद रखी जिस पर आज नरेंद्र मोदी और अमित शाह की सियासत की इमारत खड़ी है। इसी तरह इसी दौर में कांग्रेस में अहमद पटेल सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव बने और 2004 में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार बनवाने से लेकर 2014 तक उसे चलवाने में सियासत के सफर में जितने भी टेढे मेढ़े रास्ते अपनाए जा सकते थे, उन पर चलते हुए पटेल कांग्रेस के सबसे बड़े रणनीतिकार साबित हुए।
अमर सिंह
- फोटो : सोशल मीडिया
अमर सिंह जिन्होंने कोलकाता में युवक कांग्रेस से अपनी सियासी यात्रा शुरू की, लेकिन बाद में वह एक उद्योग घराने के संपर्क अधिकारी बनकर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में सक्रिय हो गए। अपनी कांग्रेसी पृष्ठभूमि के कारण अमर सिंह कांग्रेस नेता माधवराव सिंधिया के बेहद करीब हो गए। क्योंकि जिस औद्योगिक घराने के लिए अमर सिंह काम करते थे, सिंधिया के भी उस घराने से करीबी रिश्ते थे। सिंधिया ने अमर सिंह को मध्य प्रदेश के भिंड जिले से अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का सदस्य भी बनवा दिया और उनकी कोशिश लोकसभा के चुनाव में अमर सिंह को भिंड से कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा लड़वाने की थी। लेकिन उसमें उन्हें कामयाबी नहीं मिली।
इसी दौर में अमर सिंह ने अपने औद्योगिक संपर्कों के जरिए पहले चंद्रशेखर और फिर उनसे अलग हुए मुलायम सिंह यादव की निकटता हासिल कर ली। विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार गिराने और चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री बनवाने के पीछे जिन औद्योगिक घरानों की भूमिका थी, उनके और नेताओं के बीच संपर्क सूत्र का काम अमर सिंह ने बखूबी किया। लेकिन तब वह पर्दे के पीछे काम करने वाले सत्ता के एक बिचौलिये थे। लेकिन कांग्रेस में ज्यादा भाव न मिलता देख अमर सिंह ने 1996 में खुलकर समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया और मुलायम सिंह यादव ने तुरंत उन्हें सपा का राष्ट्रीय महासचिव बना दिया। इसके बाद अमर सिंह राजनीति के मैदान में खुलकर कूद पड़े। वह सपा में मुलायम सिंह यादव के आंख, कान, नाक सब बन गए और उनकी हैसियत पार्टी में मुलायम सिंह यादव के बाद नंबर दो के ताकतवर नेता की हो गई। यहां तक कि मुलायम ने उन पर इस कदर भरोसा किया कि मुलायम परिवार के अन्य सदस्यों की गिनती भी पार्टी में अमर सिंह के बाद होने लगी।
अमर सिंह ने भी मुलायम सिंह यादव के सारथी की भूमिका निभाई। वह उत्तर प्रदेश के इस खांटी धरतीपुत्र नेता को मुंबई की मायानगरी से लेकर लंदन और मास्को की चमकती दुनिया में भी ले गए। अनिल अंबानी, सुब्रत राय सहारा, आदि गोदरेज, जैसे अनेक उद्योगपति, अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, बोनी कपूर, महेश भट्ट जैसी कई फिल्मी हस्तियां, क्रिकेटर और राजनेता बरास्ता अमर सिंह सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के दरबार के नौरत्न बन गए। जो सपा पहले महज यादवों की अगुआई में पिछड़ों और मुसलमानों की पार्टी थी और जिसका जनाधार महज गांवों और कस्बों तक सीमित था, उसमें अमर सिंह ने राजपूत कार्ड खेलते हुए ठाकुरों और अन्य अगड़ी जातियों को जोड़ने के साथ साथ उसे एक शहरी पहचान भी दे दी।
हालांकि अमर सिंह के सपा में बढ़ते वर्चस्व से न सिर्फ मुलायम परिवार बल्कि सपा के तमाम वरिष्ठ नेता जो समाजवादी और लोकदलीय वैचारिक पृष्ठभूमि के थे, बेहद असहज हो गए और इनमें से कुछ को सत्यपाल मलिक, के.सी.त्यागी, रघु ठाकुर, मोहन प्रकाश और आगे चलकर राज बब्बर, बेनी प्रसाद वर्मा, मोहम्मद आजम जैसों को पार्टी से बाहर भी जाना पड़ा। बाद में बेनी प्रसाद वर्मा और मोहम्मद आजम की सपा में वापसी हो गई। वहीं जनेश्वर मिश्र, बृजभूषण तिवारी, मोहन सिंह, भगवती सिंह, रामशरण दास, रेवती रमण सिंह, जैसे कई पुराने नेता मन मसोसकर पार्टी में बने रहे। मुलायम परिवार में जहां अमर सिंह को लेकर धीरे धीरे बंटवारा हो गया और जहां प्रो. रामगोपाल यादव और अखिलेश यादव अमर सिंह के खिलाफ लामबंद हो गए, वहीं शिवपाल सिंह यादव अमर सिंह के करीब होते चले गए।
अमर सिंह किस हद तक व्यवहारिक राजनेता थे और उनकी शैली किस कदर वैचारिक जकड़नों से आजाद थी इसे उत्तर प्रदेश से लेकर केंद्र तक सपा और मुलायम सिंह यादव के बदलते फैसलों से समझा जा सकता है। कांग्रेस, भाजपा और वाम दल और तीसरे मोर्चे की राजनीति में हर जगह अमर सिंह बराबर दखल रखते थे और उनके मित्रों की हर दल में कमी नहीं थी। 1996 के लोकसभा चुनावों के बाद एचडी देवेगौड़ा को प्रधानमंत्री बनाने में अमर सिंह की अहम भूमिका थी।
उन्होंने ही तत्कालीन माकपा महासचिव और संयुक्त मोर्चे के शिल्पकार हरिकिशन सिंह सुरजीत को इसके लिए राजी किया और मुलायम सिंह यादव से लेकर बीजू पटनायक, चंद्रबाबू नायडू, एम करुणानिधि, लालू प्रसाद यादव जैसे छत्रपों को राजी करने में भी अमर सिंह का सियासी कौशल काम आया। केंद्र सरकार में मुलायम सिंह यादव के रक्षा मंत्री, जनेश्वर मिश्र के पेट्रोलियम, बेनी प्रसाद वर्मा के संचार मंत्री बनने से अमर सिंह और सपा का दबदबा केंद्रीय स्तर पर कायम हुआ।
इसी दौर में अमर सिंह ने अपने औद्योगिक संपर्कों के जरिए पहले चंद्रशेखर और फिर उनसे अलग हुए मुलायम सिंह यादव की निकटता हासिल कर ली। विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार गिराने और चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री बनवाने के पीछे जिन औद्योगिक घरानों की भूमिका थी, उनके और नेताओं के बीच संपर्क सूत्र का काम अमर सिंह ने बखूबी किया। लेकिन तब वह पर्दे के पीछे काम करने वाले सत्ता के एक बिचौलिये थे। लेकिन कांग्रेस में ज्यादा भाव न मिलता देख अमर सिंह ने 1996 में खुलकर समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया और मुलायम सिंह यादव ने तुरंत उन्हें सपा का राष्ट्रीय महासचिव बना दिया। इसके बाद अमर सिंह राजनीति के मैदान में खुलकर कूद पड़े। वह सपा में मुलायम सिंह यादव के आंख, कान, नाक सब बन गए और उनकी हैसियत पार्टी में मुलायम सिंह यादव के बाद नंबर दो के ताकतवर नेता की हो गई। यहां तक कि मुलायम ने उन पर इस कदर भरोसा किया कि मुलायम परिवार के अन्य सदस्यों की गिनती भी पार्टी में अमर सिंह के बाद होने लगी।
अमर सिंह ने भी मुलायम सिंह यादव के सारथी की भूमिका निभाई। वह उत्तर प्रदेश के इस खांटी धरतीपुत्र नेता को मुंबई की मायानगरी से लेकर लंदन और मास्को की चमकती दुनिया में भी ले गए। अनिल अंबानी, सुब्रत राय सहारा, आदि गोदरेज, जैसे अनेक उद्योगपति, अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, बोनी कपूर, महेश भट्ट जैसी कई फिल्मी हस्तियां, क्रिकेटर और राजनेता बरास्ता अमर सिंह सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के दरबार के नौरत्न बन गए। जो सपा पहले महज यादवों की अगुआई में पिछड़ों और मुसलमानों की पार्टी थी और जिसका जनाधार महज गांवों और कस्बों तक सीमित था, उसमें अमर सिंह ने राजपूत कार्ड खेलते हुए ठाकुरों और अन्य अगड़ी जातियों को जोड़ने के साथ साथ उसे एक शहरी पहचान भी दे दी।
हालांकि अमर सिंह के सपा में बढ़ते वर्चस्व से न सिर्फ मुलायम परिवार बल्कि सपा के तमाम वरिष्ठ नेता जो समाजवादी और लोकदलीय वैचारिक पृष्ठभूमि के थे, बेहद असहज हो गए और इनमें से कुछ को सत्यपाल मलिक, के.सी.त्यागी, रघु ठाकुर, मोहन प्रकाश और आगे चलकर राज बब्बर, बेनी प्रसाद वर्मा, मोहम्मद आजम जैसों को पार्टी से बाहर भी जाना पड़ा। बाद में बेनी प्रसाद वर्मा और मोहम्मद आजम की सपा में वापसी हो गई। वहीं जनेश्वर मिश्र, बृजभूषण तिवारी, मोहन सिंह, भगवती सिंह, रामशरण दास, रेवती रमण सिंह, जैसे कई पुराने नेता मन मसोसकर पार्टी में बने रहे। मुलायम परिवार में जहां अमर सिंह को लेकर धीरे धीरे बंटवारा हो गया और जहां प्रो. रामगोपाल यादव और अखिलेश यादव अमर सिंह के खिलाफ लामबंद हो गए, वहीं शिवपाल सिंह यादव अमर सिंह के करीब होते चले गए।
अमर सिंह किस हद तक व्यवहारिक राजनेता थे और उनकी शैली किस कदर वैचारिक जकड़नों से आजाद थी इसे उत्तर प्रदेश से लेकर केंद्र तक सपा और मुलायम सिंह यादव के बदलते फैसलों से समझा जा सकता है। कांग्रेस, भाजपा और वाम दल और तीसरे मोर्चे की राजनीति में हर जगह अमर सिंह बराबर दखल रखते थे और उनके मित्रों की हर दल में कमी नहीं थी। 1996 के लोकसभा चुनावों के बाद एचडी देवेगौड़ा को प्रधानमंत्री बनाने में अमर सिंह की अहम भूमिका थी।
उन्होंने ही तत्कालीन माकपा महासचिव और संयुक्त मोर्चे के शिल्पकार हरिकिशन सिंह सुरजीत को इसके लिए राजी किया और मुलायम सिंह यादव से लेकर बीजू पटनायक, चंद्रबाबू नायडू, एम करुणानिधि, लालू प्रसाद यादव जैसे छत्रपों को राजी करने में भी अमर सिंह का सियासी कौशल काम आया। केंद्र सरकार में मुलायम सिंह यादव के रक्षा मंत्री, जनेश्वर मिश्र के पेट्रोलियम, बेनी प्रसाद वर्मा के संचार मंत्री बनने से अमर सिंह और सपा का दबदबा केंद्रीय स्तर पर कायम हुआ।
अमर सिंह
- फोटो : social media
अमर सिंह के अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा और एनडीए सरकार से कितने गहरे रिश्ते थे कि 2003 में भाजपा ने न सिर्फ मायावती सरकार से अपना समर्थन वापस लिया बल्कि भाजपा नेता और तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष केशरीनाथ त्रिपाठी ने अपने विधिक कौशल से मुलायम सिंह यादव की सरकार भी बनवा दी जो 2007 तक निर्बाध रूप से चली। जिस सियासी इवेंट प्रबंधन के लिए आज पूरा देश भाजपा का लोहा मानता है, उसे अमर सिंह ने 2003 में उत्तर प्रदेश में सपा सरकार बनने के बाद शुरू कर दिया था।
चाहे उत्तर प्रदेश औद्योगिक विकास परिषद के जरिए देश भर के नामी उद्योगपतियों को लखनऊ बुलाकर राज्य में निवेश का वातावरण तैयार करना हो या सैफई महोत्सव जैसै आयोजन शुरू करवाकर बॉलीवुड के सितारों की पूरी बारात को इटावा के उस गांव को पूरे देश में चर्चित करवा देना हो जहां सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव पैदा हुए। लखनऊ से लेकर दिल्ली और मुंबई के पांच सितारा होटलों में अमर सिंह और उनके मित्रों द्वारा दी जाने वाली शानदार दावतों को कौन भूल सकता है जहां सियासत के सारे झगड़े टंटे भूलकर बड़े-बड़े नेता अभिनेता और उद्योगपति मीडिया दिग्गज जमा होते थे और देर रात तक जश्न होता था।
अमर सिंह अपनी दोस्ती और दुश्मनी दोनों के लिए मशहूर रहे। उन्होंने जिससे दोस्ती की उसे हर संकट से उबारा। कई नामी गिरामी लोग जिनमें फिल्मी दुनिया के भी दिग्गज शामिल हैं आज अगर सफलता के शिखर पर हैं तो उसके पीछे अमर सिंह की मदद का बड़ा हाथ है। लेकिन अमर सिंह ने सियासत में जितनी दोस्ती कमाई उससे कम दुश्मनी भी नहीं कमाई। एक समय कांग्रेस के शिखर नेतृत्व के खिलाफ अमर सिंह की बयानबाजी आगे चलकर उन्हें बेहद महंगी पड़ी जब मुलायम सिंह से अलग होने के बाद उन्होंने कांग्रेस प्रवेश की बहुत कोशिश की लेकिन कोई भी कांग्रेसी दिग्गज कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को अमर सिंह के पार्टी प्रवेश के लिए राजी नहीं कर सका। 2008 में जब अमेरिका के साथ नागरिक परमाणु समझौते को लेकर वाम दलों की समर्थन वापसी के कारण मनमोहन सरकार गिरने के कगार पर थी तब अमर सिंह ने छाती ठोंककर न सिर्फ सपा का समर्थन उसे दिलाया बल्कि भाजपा के कुछ सांसदों से भी क्रॉस वोटिंग करवाकर यूपीए सरकार को बचाया। हालांकि बाद में उस प्रकरण को लेकर हुए एक स्टिंग आपरेशन को लेकर उन्हें जेल भी जाना पड़ा। इसके बावजूद उन्हें कांग्रेस में प्रवेश नहीं मिल सका।
समाजवादी पार्टी में अमर सिंह का पराभव शुरू हुआ जब राज्य में मायावती की सरकार थी। मुलायम परिवार में रामगोपाल यादव और अखिलेश अमर सिंह के खिलाफ इस कदर हो गए कि आखिर मुलायम सिंह यादव को अमर सिंह को पार्टी से बाहर करने का फैसला लेना पड़ा। इसके पहले 2009 के लोकसभा चुनावों में रामपुर से सपा उम्मीदवार और फिल्म अभिनेत्री जयाप्रदा को लेकर अमर सिंह और मोहम्मद आजम खान में इस कदर ठनी कि आजम खान पार्टी से बाहर हो चुके थे। सपा से निकलने के बाद अमर सिंह ने अपने राजनीतिक पुनर्वास की बहुत कोशिश की लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली जबकि बिना अमर सिंह 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने 225 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई जिसका पूरा श्रेय अखिलेश यादव के युवा नेतृत्व को मिला।
लेकिन 2017 आते-आते अमर सिंह की मुलायम सिंह से फिर नजदीकी बढ़ गई और मुलायम ने न सिर्फ उन्हें पार्टी में लिया बल्कि राज्यसभा की सीट भी दे दी। लेकिन इसे अखिलेश और रामगोपाल खेमा बर्दाश्त नहीं कर सका और एक बार मुलायम परिवार में इस कदर झगड़ा हुआ पहले रामगोपाल यादव को मुलायम सिंह यादव ने पार्टी से निकाला फिर वापस लिया। फिर अखिलेश मुलायम को हटाकर सपा अध्यक्ष बने और मामला चुनाव आयोग गया जहां अखिलेश खेमे की जीत हुई।
इन तमाम सियासी घटनाओं के बाद अमर सिंह फिर सियासी बियाबान में खो गए। अखिलेश ने उन्हें सपा से निष्कासित कर दिया लेकिन वह राज्यसभा के असंबद्ध सदस्य बने रहे। बिगड़ती सेहत और साख दोनों ने कभी सियासत के इस चतुर महारथी को मौजूदा दौर में अप्रासंगिक कर दिया। लेकिन कमजोर होते इस सिंह ने हिम्मत नहीं हारी और अपनी नजदीकी राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ, भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बढ़ानी शुरू कर दी। मोदी सरकार को अपनी तरफ से एकतरफा समर्थन और संघ की तारीफ करके अमर सिंह ने अपने सियासी पुनर्वास की कोशिश तो की और बदले में उन्हें मंच से प्रधानमंत्री मोदी की सराहना भी मिली। लेकिन स्वास्थ्य ने साथ नहीं दिया और धीरे धीरे अमर सिंह अपने इलाज के लिए सिंगापुर के उस अस्पताल पर निर्भर हो गए जहां उन्होंने किडनी प्रत्यारोपण कराया था। उन्होंने आखिरी सांस भी वहीं ली।
चाहे उत्तर प्रदेश औद्योगिक विकास परिषद के जरिए देश भर के नामी उद्योगपतियों को लखनऊ बुलाकर राज्य में निवेश का वातावरण तैयार करना हो या सैफई महोत्सव जैसै आयोजन शुरू करवाकर बॉलीवुड के सितारों की पूरी बारात को इटावा के उस गांव को पूरे देश में चर्चित करवा देना हो जहां सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव पैदा हुए। लखनऊ से लेकर दिल्ली और मुंबई के पांच सितारा होटलों में अमर सिंह और उनके मित्रों द्वारा दी जाने वाली शानदार दावतों को कौन भूल सकता है जहां सियासत के सारे झगड़े टंटे भूलकर बड़े-बड़े नेता अभिनेता और उद्योगपति मीडिया दिग्गज जमा होते थे और देर रात तक जश्न होता था।
अमर सिंह अपनी दोस्ती और दुश्मनी दोनों के लिए मशहूर रहे। उन्होंने जिससे दोस्ती की उसे हर संकट से उबारा। कई नामी गिरामी लोग जिनमें फिल्मी दुनिया के भी दिग्गज शामिल हैं आज अगर सफलता के शिखर पर हैं तो उसके पीछे अमर सिंह की मदद का बड़ा हाथ है। लेकिन अमर सिंह ने सियासत में जितनी दोस्ती कमाई उससे कम दुश्मनी भी नहीं कमाई। एक समय कांग्रेस के शिखर नेतृत्व के खिलाफ अमर सिंह की बयानबाजी आगे चलकर उन्हें बेहद महंगी पड़ी जब मुलायम सिंह से अलग होने के बाद उन्होंने कांग्रेस प्रवेश की बहुत कोशिश की लेकिन कोई भी कांग्रेसी दिग्गज कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को अमर सिंह के पार्टी प्रवेश के लिए राजी नहीं कर सका। 2008 में जब अमेरिका के साथ नागरिक परमाणु समझौते को लेकर वाम दलों की समर्थन वापसी के कारण मनमोहन सरकार गिरने के कगार पर थी तब अमर सिंह ने छाती ठोंककर न सिर्फ सपा का समर्थन उसे दिलाया बल्कि भाजपा के कुछ सांसदों से भी क्रॉस वोटिंग करवाकर यूपीए सरकार को बचाया। हालांकि बाद में उस प्रकरण को लेकर हुए एक स्टिंग आपरेशन को लेकर उन्हें जेल भी जाना पड़ा। इसके बावजूद उन्हें कांग्रेस में प्रवेश नहीं मिल सका।
समाजवादी पार्टी में अमर सिंह का पराभव शुरू हुआ जब राज्य में मायावती की सरकार थी। मुलायम परिवार में रामगोपाल यादव और अखिलेश अमर सिंह के खिलाफ इस कदर हो गए कि आखिर मुलायम सिंह यादव को अमर सिंह को पार्टी से बाहर करने का फैसला लेना पड़ा। इसके पहले 2009 के लोकसभा चुनावों में रामपुर से सपा उम्मीदवार और फिल्म अभिनेत्री जयाप्रदा को लेकर अमर सिंह और मोहम्मद आजम खान में इस कदर ठनी कि आजम खान पार्टी से बाहर हो चुके थे। सपा से निकलने के बाद अमर सिंह ने अपने राजनीतिक पुनर्वास की बहुत कोशिश की लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली जबकि बिना अमर सिंह 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने 225 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई जिसका पूरा श्रेय अखिलेश यादव के युवा नेतृत्व को मिला।
लेकिन 2017 आते-आते अमर सिंह की मुलायम सिंह से फिर नजदीकी बढ़ गई और मुलायम ने न सिर्फ उन्हें पार्टी में लिया बल्कि राज्यसभा की सीट भी दे दी। लेकिन इसे अखिलेश और रामगोपाल खेमा बर्दाश्त नहीं कर सका और एक बार मुलायम परिवार में इस कदर झगड़ा हुआ पहले रामगोपाल यादव को मुलायम सिंह यादव ने पार्टी से निकाला फिर वापस लिया। फिर अखिलेश मुलायम को हटाकर सपा अध्यक्ष बने और मामला चुनाव आयोग गया जहां अखिलेश खेमे की जीत हुई।
इन तमाम सियासी घटनाओं के बाद अमर सिंह फिर सियासी बियाबान में खो गए। अखिलेश ने उन्हें सपा से निष्कासित कर दिया लेकिन वह राज्यसभा के असंबद्ध सदस्य बने रहे। बिगड़ती सेहत और साख दोनों ने कभी सियासत के इस चतुर महारथी को मौजूदा दौर में अप्रासंगिक कर दिया। लेकिन कमजोर होते इस सिंह ने हिम्मत नहीं हारी और अपनी नजदीकी राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ, भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बढ़ानी शुरू कर दी। मोदी सरकार को अपनी तरफ से एकतरफा समर्थन और संघ की तारीफ करके अमर सिंह ने अपने सियासी पुनर्वास की कोशिश तो की और बदले में उन्हें मंच से प्रधानमंत्री मोदी की सराहना भी मिली। लेकिन स्वास्थ्य ने साथ नहीं दिया और धीरे धीरे अमर सिंह अपने इलाज के लिए सिंगापुर के उस अस्पताल पर निर्भर हो गए जहां उन्होंने किडनी प्रत्यारोपण कराया था। उन्होंने आखिरी सांस भी वहीं ली।