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Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Ajit Pawar passes away in plane crash life and memories of maharashtra politics A Saga of Political Resilience

‘प्रैक्टिकल पॉलिटिशियन मानें जाते थे अजित पवार, कार्यकर्ताओं के लिए 'काम के आदमी' थे दादा

Hari Govind Vishwakarma हरगोविंद विश्वकर्मा
Updated Wed, 28 Jan 2026 11:56 AM IST
सार

Ajit Pawar Biography And Political Career: अजित पवार महाराष्ट्र की राजनीति के एक दबंग, प्रशासनिक रूप से दक्ष और निर्णय लेने वाले सशक्त नेता रहे थे। शरद पवार की विरासत से आगे बढ़कर उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। विवादों और राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद, अपने जमीनी समर्थन और स्पष्ट कार्यशैली से वे सदैव प्रासंगिक रहे।

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Ajit Pawar passes away in plane crash life and memories of maharashtra politics A Saga of Political Resilience
अजित दादा को अक्सर ‘प्रैक्टिकल पॉलिटिशियन’ कहा जाता था। - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

Ajit Pawar Plane Crash:  महाराष्ट्र की राजनीति में कल तक अजित दादा ऐसा नाम था, जिसे शक्ति, रणनीति, प्रशासनिक दक्षता और विवाद, इन सभी के समुच्चय के रूप में देखा जाता था। वे जितने सख्त निर्णयों और तेज राजनीतिक चालों के लिए जाने जाते थे, उतने ही अपने अनौपचारिक, सहज और पत्रकारों से खुले संवाद के लिए भी। सत्ता के गलियारों में उनकी मौजूदगी हमेशा खबर बनती थी। वे कभी समर्थकों के लिए भरोसे का प्रतीक थे, तो कभी विरोधियों के लिए चुनौती।

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एक बार बारामती क्षेत्र का एक साधारण पार्टी कार्यकर्ता आर्थिक संकट में था। उसके बेटे की कॉलेज फीस भरनी थी। बात किसी तरह अजित दादा तक पहुंच गई। उन्होंने न कोई प्रचार किया, न किसी को बताया। बस निजी तौर पर फीस भरवा दी। बाद में जब उस कार्यकर्ता ने धन्यवाद कहा, तो अजित दादा ने कहा, “तू पक्षासाठी ठाम उभा राहतोस, तर पक्षही तुझ्यासाठी ठाम उभा राहील (तू पार्टी के लिए खड़ा रहता है, तो पार्टी भी तेरे लिए खड़ी रहेगी)।
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एनसीपी के संस्थापक और वरिष्ठ नेता शरद पवार के भतीजे अजित अनंतराव पवार का जन्म 22 जुलाई 1959 को महाराष्ट्र के पुणे जिले में हुआ। पवार परिवार का राजनीतिक इतिहास राज्य की राजनीति में गहराई से जुड़ा रहा है। ग्रामीण पृष्ठभूमि, सहकारिता आंदोलन और मराठा राजनीति की समझ उन्हें विरासत में मिली। बचपन से ही उन्होंने राजनीति को बहुत नज़दीक से देखा और समझा। उनकी शिक्षा मुख्यतः महाराष्ट्र में ही हुई। छात्र जीवन में वे बहुत मुखर नहीं थे, लेकिन सामाजिक गतिविधियों और ग्रामीण मुद्दों के प्रति उनकी रुचि साफ़ दिखाई देती थी। यही रुचि आगे चलकर उनके राजनीतिक जीवन की नींव बनी।

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अजित दादा ने 1980 के दशक में सक्रिय राजनीति में कदम रखा। 1991 में वे पहली बार बारामती विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए। बारामती, जो पवार परिवार का गढ़ माना जाता है, वहीं से अजित दादा ने अपनी राजनीतिक पहचान मजबूत की। स्थानीय विकास, सिंचाई, सहकारिता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था उनके प्रमुख मुद्दे रहे। अगले साल उन्हें सुधाकर राव नाईक मंत्रिमंडल में बतौर राज्य मंत्री शामिल किया गया।


2010 में विलासराव देशमुख मंत्रिमंडल में पहली बार वह उपमुख्यमंत्री बने। उन्होंने पांच बार राज्य के उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। कई बार वित्त मंत्रालय का प्रभार संभाला और राज्य का बजट प्रस्तुत किए और राज्य की आर्थिक दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

धीरे-धीरे वे महाराष्ट्र की राजनीति में एक ऐसे नेता के रूप में उभरे, जो फाइलों पर तेजी से काम करवाने और निर्णय लेने के लिए जाना जाता है। सिंचाई परियोजनाओं को लेकर वे अक्सर चर्चा में रहे। समर्थकों का कहना है कि उन्होंने सूखा प्रभावित क्षेत्रों में पानी पहुंचाने के लिए बड़े फैसले लिए, वहीं आलोचक उन पर अनियमितताओं के आरोप भी लगाते रहे।

राजनीति में जहां कई नेता मीडिया से दूरी बनाकर रखते थे, वहीं उनका अंदाज़ अलग रहा। वे पत्रकारों से अपेक्षाकृत फ्रेंडली माने जाते थे। प्रेस कॉन्फ्रेंस में वे सीधे सवालों का जवाब देने से नहीं कतराते, कभी-कभी तीखे शब्दों में भी। अनौपचारिक बातचीत में उनका व्यवहार सहज रहा, जिससे रिपोर्टरों के बीच उनकी अलग पहचान बनी। हालांकि, उनका यह खुलापन कई बार विवादों का कारण भी बना, क्योंकि उनके कुछ बयान सुर्खियों में आ जाते थे। फिर भी, पत्रकारों के साथ उनका संवाद कायम रहा। कई लोग उन्हें मुंहफट भी कहते थे।

अजित दादा का राजनीतिक सफर विवादों से अछूता नहीं रहा। भ्रष्टाचार के कई आरोप, सिंचाई घोटाले से जुड़े सवाल, और कुछ सार्वजनिक बयानों को लेकर वे अक्सर विपक्ष के निशाने पर रहे। उनके आलोचक कहते थे कि उनकी कार्यशैली आक्रामक और सत्ता-केंद्रित थी। इसके बावजूद, वे हर बार राजनीतिक रूप से वापसी करने में सफल रहे। यह उनकी संगठनात्मक पकड़ और जमीनी समर्थन को दर्शाता था।


2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के बाद अजित दादा ने अचानक बड़ा राजनीतिक कदम उठाया, जिसने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी। यह घटना उनकी छवि को और अधिक चर्चित बना गई, एक ऐसे नेता के रूप में, जो अप्रत्याशित फैसले लेने से नहीं हिचकता। बाद के वर्षों में भी उन्होंने बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में खुद को प्रासंगिक बनाए रखा।

अजित दादा को अक्सर ‘प्रैक्टिकल पॉलिटिशियन’ कहा जाता था। वे भावनात्मक राजनीति से अधिक गणित और जमीनी हकीकत पर भरोसा करते थे। प्रशासनिक मामलों में उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती थी। वे अपने अधिकारियों से कड़ा काम लेते हैं और परिणाम चाहते थे। उनके समर्थक उन्हें ‘काम का आदमी’ कहते थे। राज्य के किसी नौकरशाह में इतनी हिम्मत नहीं थी कि उन्हें ना कह दे।

महाराष्ट्र की राजनीति में अजित दादा का प्रभाव निर्विवाद था। वे केवल शरद पवार के भतीजे के रूप में नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक कद के बल पर पहचाने जाते थे। ग्रामीण महाराष्ट्र, विशेषकर पश्चिमी क्षेत्र में उनकी पकड़ मजबूत रही। भविष्य में उनकी भूमिका को लेकर राजनीतिक विश्लेषक अलग-अलग राय रखते थे, लेकिन इतना तय था कि महाराष्ट्र की राजनीति में उनका नाम लंबे समय तक चर्चा में रहेगा।

अजित दादा का जीवन संघर्ष, सत्ता, विवाद और प्रशासनिक दक्षता की कहानी है। पत्रकारों से उनका फ्रेंडली रवैया, तेज-तर्रार बयान और निर्णायक नेतृत्व, इन सबने मिलकर उन्हें एक अलग पहचान दी। वे ऐसे नेता रहे, जिन्हें नजरअंदाज करना न तो समर्थकों के लिए संभव था और न ही विरोधियों के लिए। यही कारण था कि वह महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे प्रभावशाली और चर्चित चेहरों में गिने जाते थे।


                      

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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