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अब मशीनें दिखाएंगी मुक्ति का मार्ग: क्या आध्यात्मिकता भी एआई के हवाले होगी?
Sat, 06 Jun 2026 07:32 AM IST
नितिन गौतम
एडम जेम्स फेंटन, अमर उजाला
एडम जेम्स फेंटन, अमर उजाला
Published by: नितिन गौतम
Updated Sat, 06 Jun 2026 07:32 AM IST
सार
अगर लोग एआई को अपना आध्यात्मिक गुरु स्वीकारने लगे हैं, तो यह मान लेना चाहिए कि स्थिति गंभीर है।
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एआई
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
जेनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के युग में एक नया सवाल तेजी से उभर रहा है कि क्या भविष्य में आध्यात्मिक मार्गदर्शन भी एआई के हाथों में चला जाएगा? इस सवाल से मेरा सामना तब हुआ, जब मैंने ‘अपोस्टल स्टीफन’ नामक एक एआई चैटबॉट से बातचीत की। मैंने उससे केवल चर्चों और धार्मिक सभाओं की सामान्य जानकारी मांगी थी, पर उसने बार-बार मेरा नाम, ई-मेल और फोन नंबर मांगना शुरू कर दिया। मैंने अपनी निजी जानकारी साझा करने से इन्कार कर दिया, फिर भी वह जानकारियां मांगता रहा।
अचानक उसने मुझे ‘दोबारा जन्म लेने’ की प्रक्रिया समझानी शुरू कर दी, मुक्ति की प्रार्थना करवाई और यह संकेत दिया कि मेरा आध्यात्मिक पुनर्जन्म हो चुका है। इसके बाद उसने एक बार फिर से मेरी व्यक्तिगत जानकारी मांगी। क्या एआई आधारित आध्यात्मिकता का भविष्य ऐसा ही होगा या यह सिर्फ किसी खास धार्मिक संगठन के प्रचार का एक तरीका है? आज लगभग हर प्रमुख धर्म का अपना एआई चैटबॉट मौजूद है। विभिन्न धार्मिक समुदायों से जुड़े कई प्लेटफॉर्म धार्मिक प्रश्नों के उत्तर देने और आध्यात्मिक मार्गदर्शन करने का दावा करते हैं, लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि एआई धार्मिक और संवेदनशील विषयों पर गलत, भ्रामक या अनुचित उत्तर दे सकता है, जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
धार्मिक एआई चैटबॉट, जिन्हें कई लोग ‘गॉडबॉट’ के नाम से भी जानते हैं, तकनीक और आस्था के मेल का एक नया और तेजी से उभरता हुआ चलन है। इनमें से अधिकांश निजी कंपनियों, उद्यमियों द्वारा विकसित किए जाते हैं। इसलिए, इनमें निहित मूल्य, प्राथमिकताएं व पूर्वाग्रह भी उन्हीं लोगों के प्रभाव में होते हैं, जिन्होंने इन्हें बनाया है। ऐसे कई मामले सामने आए, जिनमें ऐसे चैटबॉट्स ने उपयोगकर्ताओं को स्वयं को या दूसरों को नुकसान पहुंचाने वाले व्यवहार के लिए दुष्प्रेरित किया। इनमें से कई घटनाएं तब हुईं, जब लोग चैटबॉट्स के साथ बेहद व्यक्तिगत और भावनात्मक बातचीत कर रहे थे। इस समस्या को ‘एआई साइकोसिस’ के नाम से जाना जाता है। यह समझने के लिए कि एआई धार्मिक समुदायों को कैसे प्रभावित कर रहा है, मैंने और मेरी टीम ने ब्रिटेन के विभिन्न धर्मों से जुड़े धार्मिक नेताओं से बातचीत की। अध्ययन में एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया कि धार्मिक समुदाय एआई को लेकर एकमत नहीं है।
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चर्च ऑफ इंग्लैंड के एआई सलाहकार रेवरेंड डॉ. साइमन क्रॉस ने बताया कि आज के अधिकांश ‘गॉडबॉट्स’ को विभिन्न धर्मों की पवित्र पुस्तकों और धार्मिक साहित्य के आधार पर प्रशिक्षित किया जाता है। इसके लिए लार्ज लैंग्वेज मॉडल जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग किया जाता है। आमतौर पर ये धार्मिक एआई चैटबॉट मुख्यतः दो रूपों में काम करते हैं। पहला, वर्चुअल असिस्टेंट के रूप में, जो संस्थाओं की वेबसाइटों पर जानकारी उपलब्ध कराते हैं। ‘अपोस्टल स्टीफन’ इसी प्रकार का एक उदाहरण है। दूसरा, अनौपचारिक आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में, जो लोगों को धार्मिक सलाह देने लगते हैं। असली जोखिम इसी दूसरे रूप में छिपा हुआ है। इसका सबसे चर्चित उदाहरण ‘फादर जस्टिन एआई’ था, जिसे एक कैथोलिक संगठन ने विकसित किया था। शुरू में यह एक पादरी की तरह दिखाई देता था और धार्मिक प्रश्नों के उत्तर देता था। बाद में, इसने पाप-स्वीकार करने और क्षमा प्रदान करने जैसी भूमिकाओं की नकल करनी शुरू कर दी। पर, जब इसने कैथोलिक शिक्षाओं के विपरीत कई विवादास्पद उत्तर देने शुरू किए, तो इसे बंद करना पड़ा।
लोग चैटबॉट्स से अपने सवालों को खुलकर साझा करते हैं। यही वजह है कि धार्मिक एआई चैटबॉट्स तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ी चिंता यह है कि एआई में आध्यात्मिक अनुभव जैसी मानवीय क्षमताएं नहीं हैं। अधिकांश एआई प्रणालियां लाभ कमाने के लिए विकसित की जा रही हैं। ऐसे में, यह आशंका बनी रहती है कि धार्मिक और आध्यात्मिक जरूरतों का भी व्यावसायीकरण हो सकता है। एक चिंता यह भी है कि एआई विभिन्न धार्मिक परंपराओं को मिलाकर नई मिश्रित व्याख्याएं तैयार कर सकता है, जिसे शोधकर्ताओं ने ‘जेनरेटिव हाइब्रिडिटी’ कहा है। इससे धार्मिक समझ गहरी होने के बजाय भ्रम और वैचारिक टकराव बढ़ने का खतरा पैदा होता है। एक बात स्पष्ट है कि तकनीक चाहे कितनी भी उन्नत क्यों न हो जाए, उसके उपयोग की दिशा तय करने की जिम्मेदारी अब भी इन्सानों के हाथ में ही है। आने वाले वर्षों में वही तय करेगा कि एआई मानवता का सहयोगी बनता है या उसके लिए एक नई चुनौती।
सोरा 2
यह ओपनएआई द्वारा विकसित एक उन्नत जेनरेटिव एआई मॉडल है, जिसे प्रॉम्प्ट के आधार पर उच्च-गुणवत्ता व सिनेमाई वीडियो बनाने के लिए तैयार किया गया है। यह वीडियो निर्माण से जुड़े कई जटिल कार्यों को भी संभालता है। यह लाइटिंग, कैमरे की गति, दृश्य संरचना, वस्तुओं की प्राकृतिक गतिविधि, भौतिक नियमों के अनुरूप व्यवहार और दृश्य के वातावरण को स्वचालित रूप से समझकर प्रस्तुत कर सकता है। इसके अलावा, यह वीडियो के साथ ऑडियो तैयार करने में भी सक्षम है, जिससे परिणाम अधिक वास्तविक और प्रभावशाली बनते हैं।
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अचानक उसने मुझे ‘दोबारा जन्म लेने’ की प्रक्रिया समझानी शुरू कर दी, मुक्ति की प्रार्थना करवाई और यह संकेत दिया कि मेरा आध्यात्मिक पुनर्जन्म हो चुका है। इसके बाद उसने एक बार फिर से मेरी व्यक्तिगत जानकारी मांगी। क्या एआई आधारित आध्यात्मिकता का भविष्य ऐसा ही होगा या यह सिर्फ किसी खास धार्मिक संगठन के प्रचार का एक तरीका है? आज लगभग हर प्रमुख धर्म का अपना एआई चैटबॉट मौजूद है। विभिन्न धार्मिक समुदायों से जुड़े कई प्लेटफॉर्म धार्मिक प्रश्नों के उत्तर देने और आध्यात्मिक मार्गदर्शन करने का दावा करते हैं, लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि एआई धार्मिक और संवेदनशील विषयों पर गलत, भ्रामक या अनुचित उत्तर दे सकता है, जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
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धार्मिक एआई चैटबॉट, जिन्हें कई लोग ‘गॉडबॉट’ के नाम से भी जानते हैं, तकनीक और आस्था के मेल का एक नया और तेजी से उभरता हुआ चलन है। इनमें से अधिकांश निजी कंपनियों, उद्यमियों द्वारा विकसित किए जाते हैं। इसलिए, इनमें निहित मूल्य, प्राथमिकताएं व पूर्वाग्रह भी उन्हीं लोगों के प्रभाव में होते हैं, जिन्होंने इन्हें बनाया है। ऐसे कई मामले सामने आए, जिनमें ऐसे चैटबॉट्स ने उपयोगकर्ताओं को स्वयं को या दूसरों को नुकसान पहुंचाने वाले व्यवहार के लिए दुष्प्रेरित किया। इनमें से कई घटनाएं तब हुईं, जब लोग चैटबॉट्स के साथ बेहद व्यक्तिगत और भावनात्मक बातचीत कर रहे थे। इस समस्या को ‘एआई साइकोसिस’ के नाम से जाना जाता है। यह समझने के लिए कि एआई धार्मिक समुदायों को कैसे प्रभावित कर रहा है, मैंने और मेरी टीम ने ब्रिटेन के विभिन्न धर्मों से जुड़े धार्मिक नेताओं से बातचीत की। अध्ययन में एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया कि धार्मिक समुदाय एआई को लेकर एकमत नहीं है।
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लोग चैटबॉट्स से अपने सवालों को खुलकर साझा करते हैं। यही वजह है कि धार्मिक एआई चैटबॉट्स तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ी चिंता यह है कि एआई में आध्यात्मिक अनुभव जैसी मानवीय क्षमताएं नहीं हैं। अधिकांश एआई प्रणालियां लाभ कमाने के लिए विकसित की जा रही हैं। ऐसे में, यह आशंका बनी रहती है कि धार्मिक और आध्यात्मिक जरूरतों का भी व्यावसायीकरण हो सकता है। एक चिंता यह भी है कि एआई विभिन्न धार्मिक परंपराओं को मिलाकर नई मिश्रित व्याख्याएं तैयार कर सकता है, जिसे शोधकर्ताओं ने ‘जेनरेटिव हाइब्रिडिटी’ कहा है। इससे धार्मिक समझ गहरी होने के बजाय भ्रम और वैचारिक टकराव बढ़ने का खतरा पैदा होता है। एक बात स्पष्ट है कि तकनीक चाहे कितनी भी उन्नत क्यों न हो जाए, उसके उपयोग की दिशा तय करने की जिम्मेदारी अब भी इन्सानों के हाथ में ही है। आने वाले वर्षों में वही तय करेगा कि एआई मानवता का सहयोगी बनता है या उसके लिए एक नई चुनौती।
सोरा 2
यह ओपनएआई द्वारा विकसित एक उन्नत जेनरेटिव एआई मॉडल है, जिसे प्रॉम्प्ट के आधार पर उच्च-गुणवत्ता व सिनेमाई वीडियो बनाने के लिए तैयार किया गया है। यह वीडियो निर्माण से जुड़े कई जटिल कार्यों को भी संभालता है। यह लाइटिंग, कैमरे की गति, दृश्य संरचना, वस्तुओं की प्राकृतिक गतिविधि, भौतिक नियमों के अनुरूप व्यवहार और दृश्य के वातावरण को स्वचालित रूप से समझकर प्रस्तुत कर सकता है। इसके अलावा, यह वीडियो के साथ ऑडियो तैयार करने में भी सक्षम है, जिससे परिणाम अधिक वास्तविक और प्रभावशाली बनते हैं।