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अलविदा सतीश कौशिक: हंसमुख चेहरे के पीछे बसता था एक भावुक इंसान

Thu, 09 Mar 2023 10:06 PM IST
Joy Bimal Roy जॉय बिमल रॉय
Updated Thu, 09 Mar 2023 10:06 PM IST
सार

आखिरी बार मेरी उनसे मुलाकात निर्माता जयंती लाल गडा के दफ्तर के नीचे हुई। वह एक कार में बैठे थे जो गडा को उनके बेटे ने तोहफे के तौर पर दी थी। वह उसी गर्मजोशी से मिले। उसके बाद हम कभी नहीं मिले। जहां भी रहो, तुम्हें शांति मिले।

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Actor Satish Kaushik dies at 66, his memories a review article on it
सतीश कौशिक को श्रृद्धासुमन - फोटो : Twitter

विस्तार

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अभिनेता, निर्देशक सतीश कौशिक हमारे बीच नहीं रहे। 66 साल के थे वह। वह हमारे बीच से चले गए, इस बात पर ही यकीन नहीं हो रहा। हमेशा जोश से लबरेज और दूसरों को हंसाते रहने वाले। सतीश से जुड़ी मेरी यादें काफी पहले की हैं।

साल 1982 की बात है। मैं तब मशहूर निर्देशक श्याम बेनेगल का सहायक बना बना था। बतौर सहायक निर्देशक मेरी पहली फिल्म थी, ‘मंडी’। हैदराबाद के करीब एक छोटे से कस्बे में इस फिल्म की शूटिंग लगातार दो महीने चलनी थी। फिल्म की पूरी यूनिट रेलगाड़ी की एक सेकंड क्लास बोगी, जो कि सिर्फ हमारे लिए ही आरक्षित थी, से अपने गंतव्य की ओर चल पड़ी। साथ में जो मुसाफिर थे, उनमें से मैं किसी को नहीं पहचानता था। तब तक मैं किसी भी ऐसे शख्स से मुखातिब नहीं हुआ था जिसे मैं पसंद नहीं करता था या जिसके साथ मेरा सामंजस्य नहीं बैठता था।

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इसे मेरी बेवकूफी ही कहेंगे, मैं ये मानकर चल रहा था कि सब लोग मुझे पसंद करेंगे और मेरी पटरी सबके साथ आसानी से बैठ जाएगी।


सफर पर निकलने से पहले मां ने घर की बनी हुई ढेर सारी मिठाई मेरे सामान के साथ बांध दी थी ताकि उनका लाडला कभी भूखा न रहे। ट्रेन चल पड़ी तो मेरा दिमाग भी चल पड़ा। मैं सोचने लगा कि सबसे मिलता हूं, अपना परिचय देता हूं और इसके लिए मैंने जो बहाना तलाशा वह था घर की बनी हुई मिठाई को अपनापे के तौर पर इनके बीच बांटना। लेकिन, मामला कुछ ज्यादा जमा नहीं। मेरे अपनेपन की मिठास रिश्तों की चाशनी नहीं बना सकी।

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लेकिन, इस पूरी मंडली में दो लोग अपवाद निकले। ये थे सतीश कौशिक और इला अरुण।


मैं इन दोनों की गर्मजोशी और इनका अपनापन कभी भूल नहीं सकता। ये एक तरह से मुझे बिना जताए मिला एक ऐसा भरोसा था कि मेरा सफर अब आराम से कट जाएगा। हालांकि, इस यात्रा में तमाम ऐसी बातें हुईं जिन्हें मैं भूलना भी चाहूं तो नहीं भूल सकता। शूटिंग शुरू हुई तो माहौल बदतर होता गया। केवल महिलाओं को ही पता था कि उन्हें क्या किरदार करने हैं। पुरुषों को इस बारे में श्याम बाबू ने कुछ नहीं बताया था। नतीजा ये हुआ कि हर कोई उन्हें प्रभावित करने की कोशिश में लग गया। खाने का मौका दरबार में बदल जाता और श्याम बाबू बन जाते ‘महाराजा’। और, सारे पुरुष कलाकार दरबारियों की तरह उनकी जी हुजूरी में लग जाते। एक तरह से एक अलग ही तमाशा चलता रहता। किसी ने गाना गाया, किसी ने किसी की नकल उतारी। एक ने शायरी भी सुनाई, लेकिन मुझे सबसे ज्यादा भाए सतीश कौशिक।

 

कमाल के कलाकार थे सतीश

उन्होंने रेलगाड़ी की नकल उतारी। एक खास तरह की शटक, पटक की आवाज निकालते हुए उन्होंने हमारी पूरी यात्रा को शुरू से आखिर तक दोहरा दिया। ये बिल्कुल ओरिजिनल था और खोजपरक भी। हालांकि ये सब उनके किरदारों में तब्दील नहीं हो सका और इन कलाकारों के मुंह इसके बाद दिन पर दिन फूलकर और कुप्पा होते गए। उधर, सतीश कौशिक को गुर्दे में तकलीफ हुई और वह वहां से बिना एक भी दिन की शूटिंग किए वापस लौट गए। लेकिन, श्याम बाबू के जेहन में सतीश कौशिक की कलाकारी अपनी छाप छोड़ चुकी थी। उन्होंने सतीश को अपनी फिल्म ‘सुसमन’ में एक चापलूस सरकारी अफसर का किरदार दिया।

सतीश कमाल के कलाकार थे। मैंने उन दिनों उन्हें थोड़ा और करीब से जाना और ये भी जाना कि दूसरों को हमेशा हंसाते रहने वाली इस शख्सियत के भीतर एक बेहद गंभीर लेकिन भावुक इंसान छुपा है। आखिरी बार मेरी उनसे मुलाकात निर्माता जयंती लाल गडा के दफ्तर के नीचे हुई। वह एक कार में बैठे थे जो गडा को उनके बेटे ने तोहफे के तौर पर दी थी। वह उसी गर्मजोशी से मिले। और, उसके बाद हम कभी नहीं मिले। जहां भी रहो, तुम्हें शांति मिले, सतीश। तुम हमेशा बहुत याद आओगे।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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