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सरकारी संस्थान का निजीकरण होने पर उसके खिलाफ याचिका पोषणीय नहीं: हाईकोर्ट
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि याचिका के लंबित रहने के दौरान किसी सरकारी संस्थान का निजीकरण हो जाता है तो उसके खिलाफ याचिका पोषणीय नहीं रह जाती। न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने वर्ष 2000 से लंबित याचिका को गैर-पोषणीय मानते हुए खारिज कर दिया।
बिजनौर स्थित यूपी स्टेट शुगर कॉर्पोरेशन में याची नसीरुद्दीन श्रमिक था। उसे चोरी के मामले में विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई के बाद जून 1998 में तीन वार्षिक वेतन वृद्धियां रोकने की सजा दी गई। याची ने इसके खिलाफ अपील दायर की। अपीलीय प्राधिकारी ने सजा को बढ़ाते हुए दिसंबर 1999 में सेवा से बर्खास्त कर दिया। याची ने बर्खास्तगी आदेश को वर्ष 2000 में हाईकोर्ट में चुनौती दी।
कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद याची की दलील को सही माना कि वैधानिक अपील में सजा को बढ़ाने (बर्खास्तगी में बदलने) का अधिकार नहीं है। ऐसे में अपीलीय प्राधिकारी का आदेश कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं था। अदालत ने आगे कहा कि याचिका के लंबित रहने के दौरान उत्तर प्रदेश राज्य गन्ना विकास निगम की बिजनौर इकाई का विनिवेश हो गया। इसे एक निजी संस्थान ने अधिग्रहित कर लिया गया। इस बदलाव के कारण अब यह इकाई सरकारी नहीं रही। इसके खिलाफ दायर याचिका गैर पोषणीय हो गई।
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हाईकोर्ट ने याची की 25 वर्षों की लंबी कानूनी लड़ाई को ध्यान में रखते हुए याचिका खारिज करते हुए आदेश दिया कि वह अपनी शिकायत लेकर श्रम न्यायालय के समक्ष जा सकता है। श्रम न्यायालय में देरी को माफ कर दिया जाएगा। साथ ही श्रम न्यायालय इस मामले को एक वर्ष के भीतर तय करने का प्रयास करेगा।
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बिजनौर स्थित यूपी स्टेट शुगर कॉर्पोरेशन में याची नसीरुद्दीन श्रमिक था। उसे चोरी के मामले में विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई के बाद जून 1998 में तीन वार्षिक वेतन वृद्धियां रोकने की सजा दी गई। याची ने इसके खिलाफ अपील दायर की। अपीलीय प्राधिकारी ने सजा को बढ़ाते हुए दिसंबर 1999 में सेवा से बर्खास्त कर दिया। याची ने बर्खास्तगी आदेश को वर्ष 2000 में हाईकोर्ट में चुनौती दी।
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कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद याची की दलील को सही माना कि वैधानिक अपील में सजा को बढ़ाने (बर्खास्तगी में बदलने) का अधिकार नहीं है। ऐसे में अपीलीय प्राधिकारी का आदेश कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं था। अदालत ने आगे कहा कि याचिका के लंबित रहने के दौरान उत्तर प्रदेश राज्य गन्ना विकास निगम की बिजनौर इकाई का विनिवेश हो गया। इसे एक निजी संस्थान ने अधिग्रहित कर लिया गया। इस बदलाव के कारण अब यह इकाई सरकारी नहीं रही। इसके खिलाफ दायर याचिका गैर पोषणीय हो गई।
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हाईकोर्ट ने याची की 25 वर्षों की लंबी कानूनी लड़ाई को ध्यान में रखते हुए याचिका खारिज करते हुए आदेश दिया कि वह अपनी शिकायत लेकर श्रम न्यायालय के समक्ष जा सकता है। श्रम न्यायालय में देरी को माफ कर दिया जाएगा। साथ ही श्रम न्यायालय इस मामले को एक वर्ष के भीतर तय करने का प्रयास करेगा।