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एटीएम से कैश आउट, उपभोक्ता फटेहाल
ब्यूरो, अमर उजाला फतेहपुर
Updated Mon, 12 Dec 2016 11:53 PM IST
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सिविल लाइन विजया बैंक के एटीएम में लगी लंबी लाइन।
- फोटो : Amar ujala
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सोमवार को उपभोक्ताओं को कैश के लिए दर दर भटकना पड़ा। बारावफात की छुट्टी होने से बैंक बंद रहें। ऐसे में लोगों को कैश के लिए एटीएम के चक्कर लगाने पड़े। विजया बैंक के एटीएम में दिनभर लंबी लाइन लगी रही। पहले नंबर को लेकर उपभोक्ताओं में धक्का मुक्की भी हुई। हालांकि अन्य बैंकों के एटीएम में कैश आउट था। बूथों के शटर बंद रहने से उपभोक्ताओं को भटकना पड़ा। सिविल लाइन विजया बैंक के एटीएम में दिनभर लोगों की लाइन लगी रही। उपभोक्ताओं ने कैश निकाला हालांकि शाम तक कैश खत्म हो गया। इसी प्रकार स्टेट बैंक पत्थरकटा शाखा के एटीएम में कै श न होने से बंद रहा। पंजाब नेशनल बैंक सिविल लाइन के एटीएम का शटर भी बंद रहा। बैंक आफ बड़ौदा, एक्सिस, एचडीएफसी, आईडीबीआई बैंकों के एटीएम में कैश न होने से शटर गिरा रहा।
देखो, साहब काम हम तभी करेंगे जब दो हजार की नोट नहीं पकड़ाओगे। चाहे तो सौ, पचास रुपये कम दे देना। फुटकर कराने में बहुत दिक्कत होती है। पांच सौ और हजार रुपये की नोट बंद होने के बाद से तो हमरी कमर जैसे टूट गई है। यह कहना है बाकरगंज मंडी में सुबह जुटने वाले मजदूरों का। ये घंटों इंतजार करते हैं। जैसे ही इन्हें कोई काम देने वाला मिलता है, वे साफ- साफ कह देते हैं कि मजदूरी तो छुट्टे पैसे में ही लेंगे। नहीं तो शाम को आटा तेल मिलना मुश्किल होगा। इनकी निर्धा्रित मजदूरी ढाई सौ रुपये प्रतिदिन की है। फुटकर पैसे मिलने पर दो सौ में भी वे जाने को तैयार हैं।
नोटबंदी से मजदूरी पर खराब असर पड़ा है। पहले तो काम नहीं मिलता। यदि कोई काम देने वाला आया तो उसे अन्य मजदूर घेर लेते हैं और मोलभाव शुरू हो जाता है। जितनी मजदूरी मिलनी चाहिए उतनी नहीं मिल पाती। ऐसे में परिवार चलाना मुश्किल हो रहा है।
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- जगदीश कुमार पटेल, मदरियापुर।
पिछले एक हफ्ते से आकर लौट जाते थे। किसी तरह एक काम मिला है। नोटबंदी से तो ऐसा लग रहा है कि अब दूसरा काम शुरू करना पड़ेगा। जो काम देते हैं, काम ढाई सौ का होता है और पकड़ाते दो हजार की नोट हैं। सबसे ज्यादा दिक्कत फुटकर पैसे की हो गई है।
- नरेंद्र कुमार, मदरियापुर।
।
‘नोटबंदी का फैसला सही है इससे कालाधन बाहर आएगा लेकिन प्रधानमंत्री को बैंकों में रुपया ज्यादा डालना चाहिए था। चार दिन से काम न मिलने की वजह से लौट रहे हैं। एक जगह काम मिला है जिससे थोड़ी राहत है।’
- गुड्डू, जलाला।
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देखो, साहब काम हम तभी करेंगे जब दो हजार की नोट नहीं पकड़ाओगे। चाहे तो सौ, पचास रुपये कम दे देना। फुटकर कराने में बहुत दिक्कत होती है। पांच सौ और हजार रुपये की नोट बंद होने के बाद से तो हमरी कमर जैसे टूट गई है। यह कहना है बाकरगंज मंडी में सुबह जुटने वाले मजदूरों का। ये घंटों इंतजार करते हैं। जैसे ही इन्हें कोई काम देने वाला मिलता है, वे साफ- साफ कह देते हैं कि मजदूरी तो छुट्टे पैसे में ही लेंगे। नहीं तो शाम को आटा तेल मिलना मुश्किल होगा। इनकी निर्धा्रित मजदूरी ढाई सौ रुपये प्रतिदिन की है। फुटकर पैसे मिलने पर दो सौ में भी वे जाने को तैयार हैं।
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नोटबंदी से मजदूरी पर खराब असर पड़ा है। पहले तो काम नहीं मिलता। यदि कोई काम देने वाला आया तो उसे अन्य मजदूर घेर लेते हैं और मोलभाव शुरू हो जाता है। जितनी मजदूरी मिलनी चाहिए उतनी नहीं मिल पाती। ऐसे में परिवार चलाना मुश्किल हो रहा है।
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पिछले एक हफ्ते से आकर लौट जाते थे। किसी तरह एक काम मिला है। नोटबंदी से तो ऐसा लग रहा है कि अब दूसरा काम शुरू करना पड़ेगा। जो काम देते हैं, काम ढाई सौ का होता है और पकड़ाते दो हजार की नोट हैं। सबसे ज्यादा दिक्कत फुटकर पैसे की हो गई है।
- नरेंद्र कुमार, मदरियापुर।
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‘नोटबंदी का फैसला सही है इससे कालाधन बाहर आएगा लेकिन प्रधानमंत्री को बैंकों में रुपया ज्यादा डालना चाहिए था। चार दिन से काम न मिलने की वजह से लौट रहे हैं। एक जगह काम मिला है जिससे थोड़ी राहत है।’
- गुड्डू, जलाला।