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मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव 2018: टिकट बंटवारे को लेकर ‘जाति के जाल’ में फंसी पार्टियां

Sun, 11 Nov 2018 11:52 AM IST
चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sun, 11 Nov 2018 11:52 AM IST
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Madhya pradesh assembly election 2018: Parties considering caste in ticket allocation BJP congress
भाजपा-कांग्रेस
मध्यप्रदेश में कुछ सीटों को छोड़कर ज्यादातर सीटों पर उम्मीदवारों के नाम सामने आ चुके हैं। दो नवंबर को भाजपा ने जब उम्मीदवारों की अपनी पहली सूची जारी की तब ब्रजेंद्र प्रताप सिंह के नाम  अचानक सुर्खियां में आ गया। ब्रजेंद्र को पवई सीट से भाजपा का टिकट मिला जिसके बाद वे चुनाव प्रचार में कूद पड़े। ब्रजेंद्र इस सीट से 2008 में जीते थे जबकि पिछले विधानसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। 
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इस फैसले ने राज्य के कृषि राज्य मंत्री को हैरत में डाल दिया जिन्हें पार्टी ने 50 किलोमीटर दूर पन्ना से प्रत्याशी बनाया है। इस फैसले पर पार्टी सूत्रों का कहना है की आतंरिक रिपोर्ट के अनुसार स्थानीय कार्यकर्ता कांग्रेस के ब्राह्मण उम्मीदवार के मुकाबले ब्राह्मण को टिकट नहीं दिए जाने से नाराज थे। इसको देखते हुए भाजपा ने सिंह की जगह पर ओबीसी समुदाय के नेता प्रह्लाद लोधी को चुना। इस निर्वाचन क्षेत्र में ओबीसी वर्ग की खासी संख्या है। 
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राजनीति के दूसरे ध्रुव पर भी जाति ने उम्मीदवारों के चयन में बड़ी भूमिका निभाई। कांग्रेस ने बुधनी से अरुण यादव (ओबीसी) को शिवराज सिंह चौहान (किरार) के मुकाबले खड़ा किया। पार्टी का लक्ष्य गैर किरार मतदाताओं को इकठ्ठा करके बुधनी में जीत दर्ज करने की है। दोनों ही प्रमुख पार्टियों, भाजपा और कांग्रेस ने टिकट बंटवारे में जातीय समीकरण का भली भांति ख्याल रखा है। 
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जातिगत समीकरण की कहानी, आंकड़ों की जुबानी 

230 सीटों वाली विधानसभा में 148 अनारक्षित सीटों पर पार्टी ने सभी जातिगत समीकरणों का ख्याल रखा है। नक्सल प्रभावी बालाघाट जिले में दोनों ही पार्टियों ने क्षेत्र में ओबीसी की संख्या को देखते हुए ओबीसी उम्मीदवार उतारे हैं। 

148 अनारक्षित सीटों पर कांग्रेस पार्टी ने 40 फीसदी अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), 27 फीसदी ठाकुर और 23 फीसदी ब्राह्मण उम्मीदवारों को मौका दिया है। बाकी बची सीटों पर विपक्षी पार्टी ने अन्य सवर्ण वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय को टिकट दिया है। 

भाजपा ने 39 फीसदी टिकट अन्य पिछड़ा वर्ग, 24 फीसदी टिकट ठाकुर और 23 फीसदी टिकट ब्राह्मण उम्मीदवारों को दिया है। 34 सीटें अनुसूचित जाति (एससी) जबकि 41 सीटें अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित हैं। 

हालांकि आधिकारिक तौर पर कोई भी पार्टी जातिगत समीकरणों को स्वीकार नहीं करती। वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा कि उम्मीदवार के जीत दर्ज करने की क्षमता ही उसे टिकट दिए जाने का कारण बनती है। मगर कोई भी पार्टी जातिगत समीकरणों को नजरअंदाज नहीं कर सकती। विंध्य क्षेत्र में ब्राह्मण और ठाकुरों के प्रभुत्व को दरकिनार नहीं किया जा सकता। इसी तरह हर क्षेत्र के अपने समीकरण हैं। 

भाजपा उपाध्यक्ष विजेश लुनावत ने इस मुद्दे पर कहा कि भाजपा कार्यकर्ताओं के कैडर वाली पार्टी है। यहां कार्यकर्ता अपने काम की वजह से आगे बढ़ता है, जाति की वजह से नहीं। 


राज्य कांग्रेस के प्रवक्ता भूपेंद्र गुप्ता ने कहा, "किसी भी राजनीतिक दल के लिए जीतना निश्चित रूप से एक कारक है लेकिन इसका मतलब पार्टी के सिद्धांतों से समझौता करना नहीं है। कांग्रेस का इतिहास है वह भाजपा की तरह जाति या मजहब में विश्वास नहीं करती।" 
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