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छ्त्तीसगढ: एंबुलेंस पर माओवादियों ने हमला क्यों किया?
आलोक प्रकाश पुतुल/रायपुर से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
Updated Tue, 15 Apr 2014 10:24 AM IST
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छत्तीसगढ के कोंडागांव के कैटपदर गांव में अब सन्नाटा पसरा हुआ है।
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शनिवार को इसी गांव के श्रवण कुमार नेताम दरभा के माओवादी हमले में मारे गए थे। वह उस एंबुलेंस के टेक्नीशियन थे, जिसे माओवादियों ने बारूदी सुरंग लगा कर उडा दिया था।
श्रवण की इसी 17 अप्रैल को शादी थी। गांव की ही एक लडकी से शादी की तैयारी जोर-शोर से चल रही थी। लेकिन अब उनके घर में मातम फैला हुआ है।
एंबुलेंस के ड्राइवर वासु सेठिया भी इस हमले में मारे गए। उनकी गर्भवती पत्नी फिलहाल इस हालत में नहीं हैं कि वह कोई बात कर सकें।
लेकिन यह सवाल गांव की गलियों से लेकर चौक-चौराहों तक हर आने-जाने वाले से टकराता है - एंबुलेंस पर माओवादियों ने हमला क्यों किया?
छत्तीसगढ में लोकसभा चुनाव के पहले दौर में शनिवार को माओवादियों ने दो बडे हमले किए थे। माओवादियों के चुनाव बहिष्कार के बीच पहला हमला बीजापुर जिले में एक मतदान दल पर हुआ था, जिसमें सात लोग मारे गए थे।
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दूसरा हमला बस्तर के दरभा के पास स्वास्थ्य विभाग की 108 संजीवनी एंबुलेंस पर हुआ था, जिसमें सीआरपीएफ के छह जवानों समेत आठ लोगों की मौत हो गई।
अब माओवादियों की ओर से बीजापुर में मतदान दल पर हमले को लेकर माफीनामा आया है लेकिन इस माफीनामे में एंबुलेंस पर हुए हमले को लेकर माओवादी चुप हैं।
एंबुलेंस की ढाल
छत्तीसगढ में घायलों और मरीजों के लिए राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही संजीवनी 108 एंबुलेंस की निशुल्क सेवा कई सालों से जारी है। यह पहला अवसर नहीं है, जब माओवादियों ने एंबुलेंस पर हमला किया हो।
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ठीक दो साल पहले 12 अप्रैल 2012 को सुकमा के गोरगुंडा में भी माओवादियों ने एक एंबुलेंस पर हमला किया था। लेकिन उस हमले में कोई हताहत नहीं हुआ था। बाद में माओवादियों ने एंबुलेंस पर किए गए हमले के लिए माफी मांगी थी।
इस ताजा हमले को लेकर कहा जा रहा है कि माओवादी हमले से बचने के लिए सुरक्षाबल के जवान एंबुलेंस का लगातार इस्तेमाल कर रहे थे।
चुनाव के दौरान भी जवान या तो एंबुलेंस जैसी पुलिस की गाडियों का इस्तेमाल कर रहे थे या फिर सीधे-सीधे एंबुलेंस का ही उपयोग अपने आने-जाने के लिए कर रहे थे।
माना जा रहा है कि माओवादियों के पास इस बात की सूचना थी और इसी आधार पर उन्होंने हमला किया।
इससे पहले भी बस्तर में पुलिस बल अपनी बसों को किसी निजी बस का नाम दे कर इस्तेमाल करती रही है।
सरकारी अधिकारी अपनी गाडियों में प्रेस या मीडिया लिख कर घूमते रहे हैं, जिसको लेकर पत्रकारों ने भी आपत्ति दर्ज कराई है।
यहां तक कि बसों को राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही 109 संजीवनी एंबुलेंस के रंग में रंग कर और उस पर एंबुलेंस लिख कर भी सुरक्षाबल के जवान उसका इस्तेमाल करते रहे हैं।
हालांकि छत्तीसगढ के नक्ल ऑपरेशन के काम में लगे अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक आरके विज इससे इंकार करते हैं। वह कहते हैं, "ऐसी कोई बात मेरी जानकारी में नहीं है और प्रथम दृष्टया ये बात मुझे सही नहीं लगती।"
लेकिन जगदलपुर में दैनिक भास्कर के वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र मिश्र कहते हैं, "हमने सुरक्षाबल की ऐसी बसों की तस्वीरों के साथ खबरें छापी हैं, जिसमें सीआरपीएफ की बस को 108 संजीवनी की शक्ल दे दी गई थीं और उसका इस्तेमाल सुरक्षाबल के जवान कर रहे थे। हमने तब भी आशंका जताई थी कि ऐसा करना नागरिकों के लिए और खुद सुरक्षाबल के लिए भी खतरनाक हो सकता है।"
माओवादी कवि वरवरा राव इस पूरे मामले की व्याख्या समझाने वाले अंदाज में करते हैं।
वरवरा कहते हैं, "जब पुलिस किसी स्कूल पर कब्जा करके वहां रुकती है तो उसे पुलिस कैंप कहा जाता है। इसी तरह जब आप एंबुलेंस का इस्तेमाल पुलिस के परिवहन के लिए करते हैं तो वह पुलिस की गाडी में तब्दील हो जाती है। माओवादियों ने इसी पुलिस वाहन पर हमला किया।"
सुरक्षा बल की कमी
हालांकि ताजा हमले के मामले में बीजापुर पहुंचे राज्य के मुख्य सचिव विवेक ढांढ का कहना है कि एंबुलेंस में सवार होने की लालसा में सीआरपीएफ के जवानों की मौत हो गई। वह अपनी बात में यह भी जोडते हैं कि राज्य सरकार ने जितनी मांग की थी, उसके अनुरूप सुरक्षाबल नहीं दिया गया।
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि बस्तर के कुल 1,797 मतदान केंद्रों में से 1,407 को अति संवेदनशील घोषित किया गया था। माओवाद प्रभावित छत्तीसगढ में चुनाव के लिए कुल 377 कंपनियां केंद्र सरकार से मांगी गई थीं। लेकिन केवल 44 कंपनियां ही केंद्र ने मुहैया करवाईं।
राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह कहते हैं, "जितनी पुलिस फोर्स हमने मांगी थी, उसका एक चौथाई भी हमें नहीं दिया गया।"
विपक्षी कांग्रेस सरकार के इस दावे से सहमत नहीं है। पार्टी का कहना है कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक निकाय है और चुनाव आयोग ने राज्य सरकार के साथ सुरक्षा बलों को काम पर लगाया था। अब रमन सिंह अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए बयानबाजी कर रहे हैं।
राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी कहते हैं, "जवानों की हत्या के लिए रमन सरकार की प्रशासनिक अक्षमता जिम्मेदार है और पुलिस का खुफिया तंत्र पंगु साबित हुआ है।"
लेकिन माओवादी हमलों को पास से देखने वाले बस्तर के पत्रकार नरेश मिश्रा इसे सुरक्षाबल की कमी से कहीं अधिक माओवादियों के नीति पारंगत होने से जोडते हैं।
नरेश कहते हैं, "यहां मामला फोर्स की कमी से जुडा हुआ नहीं है। यह माओवादियों की सफल गुरिल्ला युद्ध की नीति का मसला है। हमारा सुरक्षा बल जिस तरीके से अपनी नीतियां बनाता है, उससे कहीं तेजी से माओवादी अपनी नीतियों में फेरबदल कर के मात देने का काम करते हैं।"
नई दुनिया के संपादक रुचिर गर्ग भारत के उन चुनिंदा पत्रकारों में से हैं, जिन्होंने 90 के दशक में माओवादियों के साथ अलग-अलग अवसरों पर कई-कई दिन गुजारे हैं और उसकी रिपोर्टिंग की है।
रुचिर गर्ग इस पूरे मसले को माओवादियों की हताशा से जोडते हैं। उनका कहना है कि बस्तर में जिस तरीके से मतदान हुआ है, उसने तमाम सरकारी अव्यवस्था के बीच यह साबित किया है कि जनता की आस्था बुलेट के बजाए बैलेट में बढी है।
रुचिर गर्ग कहते हैं, "व्यवस्था को भी यह सोचना होगा कि आखिर बस्तर का आम आदमी उसके एजेंडे में कहीं है भी या नहीं? या वह महज एक वोट भर है?"