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सादगी की सियासत के सहारे रमन सिंह

Tue, 12 Nov 2013 09:06 AM IST
Updated Tue, 12 Nov 2013 09:06 AM IST
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simplictiy and raman singh

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री का नाम उनके राज्य को छोड़ कर अन्य राज्यों के लोगों ने तब ध्यान से सुनना शुरू किया जब राष्ट्रीय मीडिया ने उन्हें नरेंद्र मोदी का विकल्प बताना शुरू कर दिया।

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पिछले दो तीन साल से लगातार राष्ट्रीय मीडिया में ग़रीबों के लिए एक रुपए किलो अनाज वितरण कार्यक्रम की बात और मुफ़्त नमक की बात रह-रह कर सुनाई देने लगी।

बिजली उत्पादन में छलांग लगाने के साथ छत्तीसगढ़ के जगमगाते जीडीपी ग्रोथ की चर्चा भी यहाँ वहाँ दिखाई देने लगी। तमाम राष्ट्रीय हिंदी-अंग्रेज़ी अख़बारों में छत्तीसगढ़ सरकार के विज्ञापन भी ख़ूब दिखे।
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भारतीय जनता पार्टी के कई अन्य नेताओं की तरह रमन सिंह ख़ुद भी इस बात से नहीं घबराये कि उनका नाम क्लिक करें नरेंद्र मोदी के विकल्प की तरह उछाला जा रहा है।
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चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों की मानें तो किसी ज़माने में आयुर्वेदिक डॉक्टर की पढ़ाई कर चुके रमन सिंह माओवादी हिंसा और ऑपरेशन ग्रीन हंट से लहूलुहान राज्य में तीसरी बार सरकार बनाएंगे।

मलमल के दस्ताने, लोहे के हाथ

रमन सिंह नरेंद्र मोदी के उलट बिलकुल तेज़ तर्रार नहीं हैं। वो कर्कश कड़े बयानों पर जैसे-को-तैसा वाले सुर में बात नहीं करते।

लेकिन छत्तीसगढ़ से छपने वाले दैनिक अख़बार नई दुनिया के संपादक रुचिर गर्ग कहते हैं, "किसी ज़माने में छत्तीसगढ़ भाजपा में रमेश बैस और दिलीप सिंह जूदेव जैसे नेताओं के सामने रमन सिंह क़द के मामले में मुख्यमंत्री बनने के बाद भी बहुत कमज़ोर थे। जैसे-जैसे वक़्त बीतता गया रमन सिंह राज्य में अपनी पार्टी का एकमात्र चेहरा बन गए।"

आज हालत यह है कि अटल बिहारी वाजपेयी की भांजी और भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रह चुकी करुणा शुक्ला को विधान सभा का टिकट तक नहीं दिया गया।

करुणा शुक्ला अब कांग्रेस का प्रचार कर रही हैं और पानी पी पी कर रमन सिंह और भाजपा को कोस रही हैं। कांग्रेस के अजीत जोगी चार साल के बेहद विवादित कार्यकाल के बाद 2003 में मुख्यमंत्री बने रमन सिंह जोगी की तुलना में लोगों को बेहद शांत लगे।

राज्य में दस सालों से विपक्ष में बैठी कांग्रेस भले ही रमन सिंह के ख़िलाफ़ कोई बड़ा आंदोलन नहीं खड़ा कर पाई हो लेकिन रमन सिंह के हिस्से विवाद और गम्भीर आरोप पड़े ही ना हों ऐसा क़त्तई नहीं है।

छत्तसीगढ़ में नक्सल समस्या पिछले दस सालों में नासूर बन गई है। यूं तो केंद्र सरकार में घने जंगलों के इलाक़ों में राज्य सरकार को माओवादियों से निपटने के लिए भरपूर पैसा दिया गया, लगातार बैठकें भी हुईं लेकिन आम पुलिस कर्मचारियों से लेकर निरीह आदिवासियों तक क़त्लो ग़ारत का सिलसिला जारी है।

सलवा जुडूम

साल 2006 में राज्य सरकार ने 'सलवा जुडूम' आंदोलन शुरू किया। वैसे तो इस आंदोलन के पुरोधाओं में से थे कांग्रेस के आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा लेकिन राज्य सरकार इस आंदोलन के पीछे तन मन धन से लगी रही।

इस विवादित कार्यक्रम के चलते आदिवासी आदिवासियों से लड़े, लाखों आदिवासी घर छोड़ कर भागे और मानव अधिकारों के हनन की ऐसी कहानियाँ सामने आईं कि जो पढ़े उसकी रूह काँप जाए।

रमन सिंह इस मसले पर केंद्र की भूमिका और व्यापक समन्वय की कमी की बात कर के इस मुद्दे से अपना पल्ला झाड़ते रहे।

इसी तरह से छत्तीसगढ़ में महिलाओं पर होने वाले अपराधों की संख्या डरा देने वाली है लेकिन इस पर सरकार का तर्क होता है कि लोग पुलिस से डरते नहीं और ईमानदारी से रिपोर्ट दर्ज कराते हैं।

विवाद

छोटे बड़े विवाद तो और भी कई हैं लेकिन पुष्प स्टील का विवाद रमन सिंह के लिए काफ़ी मुसीबत का कारण बन गया था। रमन सिंह के मुख्यमंत्री बनने के ज़रा बाद साल 2004 में दिल्ली में महज़ एक लाख रुपए की पूंजी डाल कर एक कंपनी बनी।

जन्म के दिन ही उस कंपनी ने रायपुर में एक बड़े कारख़ाने को चलाने के लिए कोयला खदान की मांग की अर्ज़ी लगा डाली। जल्द ही बिना हील हुज्जत के, राज्य सरकार ने उस कंपनी को कोयले की बेशक़ीमती खदान दिलाने की सिफ़ारिश कर डाली।

साल 2010 में अदालत ने तमाम लाइसेंसों को रद्द करते हुए जिस तरह से इस कंपनी को लाइसेंस दिए गए थे उस पर हैरानी जताई।

कांग्रेस ने आरोप लगाया कि यह कंपनी भाजपा नेताओं की थी। लेकिन रमन सिंह इस तरह के आरोपों और वारों को अपनी ख़ास शैली में सरकाते टरकाते रहे।

ऐसा ही एक और विवाद था बाल्को को ज़मीन आवंटन का। जब रायपुर हाईकोर्ट ने एक फ़ैसले में बाल्को का साथ दिया तो रमन सरकार ने अदालत के इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती न देने का निर्णय लिया। सरकार पर आरोप लगे कि इस क़दम से सरकारी ख़ज़ाने को बड़ा नुक़सान है। आख़िरकार यह मामला भी सुप्रीम कोर्ट में चला गया लेकिन मुद्दई कोई और था।


इसी तरह से एक और विवाद उठा था भाजपा के नितिन गडकरी के नज़दीकी व्यापारी अजय संचेती को खदान देने का।

ताक़त

रुचिर गर्ग कहते हैं, "रमन सिंह को कुछ उनको उनकी सौम्यता का लाभ मिला। कुछ विपक्षी कांग्रेस में छिड़ी स्थाई सिर फुटव्वल का और कुछ दिल्ली की राजनीति में भाजपा के तमाम ख़ेमों से लगभग समान निकटता रखने का। चाहे कांग्रेस के अजीत जोगी या भाजपा में रमेश बैस, दिलीप सिंह जूदेव, करुणा शुक्ला, ये नेता अपने आप दूसरी परेशानियों की दलदल में धंसते गए।"

रमन सिंह में किसी भी और चीज़ की कमी भले हो लेकिन धैर्य की कमी नहीं है और धैर्य राजनीति में जिसको छोटी पूंजी लगती हो वो पीवी नरसिम्हाराव को याद कर ले।

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