एक चूहे के सिर पर 70 रुपए का इनाम
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
शोले फ़िल्म के गब्बर की तर्ज पर अगर रायपुर शहर का कोई चूहा कहे कि सरकार ने हम पर कितना इनाम रखा है? तो छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के सबसे बड़े डॉक्टर भीमराव अंबेडकर स्मृति चिकित्सालय के सारे चूहे एक साथ चिल्लाएंगे, "एक-एक के सिर पर 70 रुपये।"
असल में राजधानी रायपुर के 700 बिस्तरों वाला यह सरकारी अस्पताल इन दिनों चूहों के आंतक से निजात पाने की क़वायद कर रहा है।
इस सरकारी अस्पताल में चूहे फाइलें कुतरते रहे हैं, दवाएं गटकते रहे हैं, वायरिंग काटते रहे हैं और यहां तक कि मरीजों को भी काट चुके हैं। कई बार कई जीवन उपयोगी मशीनों के तार इन चूहों ने कुतर दिए, जिसके कारण अस्पताल और मरीज़ महीनों तक परेशान रहे।
चूहों से मुक्ति पाने के लिए स्थानीय स्तर पर अस्पताल प्रबंधन ने हरसंभव प्रयास किए। चूहों को फंसाने के लिए पिंजरे रखे गए, जहरीली दवाएं रखी गईं। लेकिन प्रबंधन की कोई तरक़ीब काम नहीं आई।
चूहे मारने के लिए निकाला गया टेंडर
राज्य के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल कहते हैं, “हमने हरसंभव कोशिश कर ली। लेकिन चूहे ज़्यादा चालाक निकले। पूरा अस्पताल इन चूहों से परेशान हो गया। अंत में हमने थक कर चूहों से निजात पाने के लिए टेंडर निकाला।”
इसी साल जनवरी में राज्य सरकार ने चूहों से इस अस्पताल को मुक्ति दिलाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर निविदा प्रकाशित की और एक अप्रैल से इंदौर की एक निजी कंपनी ने चूहों को मारने का अभियान शुरू कर दिया है।
इस कंपनी के मुखिया डॉक्टर संजय करमरकर का अनुमान है कि अस्पताल में लगभग 20 हज़ार चूहे हो सकते हैं। जिसके लिए सरकार ने 14 लाख रुपये में डॉक्टर करमरकर की कंपनी को ठेका दिया है।
बकौल डाक्टर करमरकर, “हमने 1994 में इंदौर के एक अस्पताल में 12 हज़ार चूहों को मारा था। लेकिन हमें लगता है कि यहां वह रिकार्ड टूट जाएगा।”
पांच हजार बिलों से निकले 2200 चूहे
चूहों को मारने के इस अभियान में कंपनी ने एक दर्जन प्रशिक्षित लोगों को लगाया है। कंपनी का दावा है कि पिछले तीन दिन में चूहों के लगभग पाँच हज़ार बिल मिले, जिनमें लगभग पाँच क्विंटल ज़हरीला खाद्य पदार्थ था।
इसके बाद इन बिलों से लगभग 2,200 मरे हुए चूहे बरामद किए गए। मरे हुए अधिकांश चूहे खासे मोटे-ताज़े थे। इनके दांत इतने लंबे हैं कि ये आसानी से किसी भी मोटी और कड़ी चीज़ को कुतर सकते हैं।
मरे हुए चूहों को कंपनी के लोग सामूहिक रूप से जला रहे हैं, जिससे आसपास में किसी भी किस्म के संक्रमण का ख़तरा न हो।
दूर-दूर से देखने आ रहे लोग
डाक्टर करमरकर का कहना है कि चूहे एक बार अगर यह जान जाएं कि किसी खाद्य पदार्थ को खाना ख़तरनाक हो सकता है तो वे अगली बार उस पदार्थ को छूते ही नहीं। इसलिये इन चूहों को हर दिन नए-नए किस्म के अनाज और दूसरे पदार्थों से बना हुआ ज़हरीला खाद्य पदार्थ दिया जा रहा है।
कंपनी चूहों को चरणबद्ध तरीके से मारने का अभियान अगले सप्ताह तक ज़ारी रखेगी और इसके बाद भी अगले 11 महीने तक कंपनी के लोग अस्पताल में चूहों की गतिविधियों पर नज़र रखेंगे।
फिलहाल इस ‘चूहा मुक्ति ऑपरेशन’ को देखने के लिए लोग दूर-दूर से आ रहे हैं। पहली बार इन चूहों को देख कर किसी के भी मुंह से निकलता है, “इत्ते चूहे?”
डॉक्टर संजय करमरकर कहते हैं, “अभी तो यह शुरुआत है।”