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छत्तीसगढ़ः खुले में धान बर्बाद, गोदाम में शराब

Sun, 02 Feb 2014 09:42 AM IST
आलोक प्रकाश पुतुल/रायपुर से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
आलोक प्रकाश पुतुल/रायपुर से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए Updated Sun, 02 Feb 2014 09:42 AM IST
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paddy waste chattisgarh

धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में सरकार द्वारा किसानों से खरीदा गया कई लाख मीट्रिक टन धान ख़राब हो गया है। खुले मैदान में साल भर तक रहने और बारिश में लगातार तीन महीने तक भीगने के कारण धान के पठार बन गए हैं।

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साल 2012-13 में खरीदा गया लगभग 8 लाख मीट्रिक टन धान सरकारी गोदाम तक पहुंचा ही नहीं और संग्रहण केंद्रों में ही पड़ा रह गया और इसमें से अधिकांश धान सड़ गया है। अकेले रायपुर जिले के संग्रहण केंद्रों में सवा लाख मीट्रिक टन धान पड़ा रह गया।
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यही हाल दूसरे ज़िलों का है। हालत ये है कि कुछ ज़िलों में 2010-11 में खरीदे गए धान भी मिलिंग के लिए नहीं ले जाए गए। अब सरकारी अफ़सर तर्क दे रहे हैं कि इस धान को राइस मिलर्स ले जाएंगे। वहीं राइस मिलर्स का कहना है कि सड़े हुए धान का उपयोग संभव नहीं है।
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संग्रहण की व्यवस्था नहीं

दूसरी ओर सरकार ने एक बार फिर से धान की नई उपज की ख़रीद की है। माना जा रहा है कि धान की नई उपज को भी रखने की व्यवस्था नहीं होने के कारण अरबों रुपये का धान फिर बर्बाद हो सकता है।

किसान नेता आनंद मिश्रा का कहना है, “राज्य की भाजपा सरकार के लिए किसान और उनकी उपज कभी प्राथमिकता में रहे ही नहीं, इसलिए धान सड़ने को लेकर सरकार गंभीर नहीं है। दस साल पहले किसानों की जनसंख्या 44।54 प्रतिशत थी, वह घट कर 32।88 प्रतिशत रह गई है और खेतिहर मजदूरों की जनसंख्या 31।94 प्रतिशत थी, जो आज 41।80 प्रतिशत हो गई है।”

राज्य के खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्री पुन्नूलाल मोहले का दावा है कि उनकी सरकार इस साल धान खरीद रही है और उसकी मिलिंग भी हो रही है। मोहले कहते हैं, “इस साल 59 लाख 31 हजार मीट्रिक टन धान में से 22 लाख टन धान का उठाव मिलिंग के लिए और 11 लाख टन धान का उठाव मार्कफ़ेड के संग्रहण केन्द्रों में भंडारण के लिए हो गया है। इस साल ऐसी परेशानी नहीं आएगी।”

छत्तीसगढ़ सरकार पिछले कई सालों से किसानों से समर्थन मूल्य पर धान ख़रीदती रही है। जिन्हें बाद में राइस मिलर्स को मिलिंग के लिए दिया जाता है। लेकिन धान की उपज को रखने की व्यवस्था राज्य सरकार अब तक नहीं कर पाई है।

सरकार द्वारा खरीदे गए धान को बोरे में भर कर खुले मैदान में रख दिया जाता है। अगर संभव हुआ तो उसे कैप कवर से ढका जाता है लेकिन ये कैप कवर भी कुछ महीने ही धान की रक्षा कर पाते हैं।

किसानों से खरीदे गए धान की सुरक्षा को लेकर सरकार की लापरवाही इस हद तक है कि बिलासपुर के तोरवा संग्रहण केंद्र में लाखों टन धान खुले में सड़ गया। जबकि उससे कुछ ही दूरी पर स्थित स्टेट वेयर हाउसिंग कॉरपोरेशन के गोदाम में अनाज रखने के बजाए राज्य सरकार उसमें शराब का संग्रहण कर रही है।

बर्बादी पर ख़ामोश

सरकार ने पिछले साल किसानों से नौ हजार करोड़ रुपये मूल्य का लगभग 71 लाख मीट्रिक टन धान खरीदा था। जिसमें से 52 लाख मीट्रिक धान खरीदी के बाद कई महीनों तक खुले में ही पड़ा रहा और हालत यह हुई कि कम से कम 8 लाख मीट्रिक टन धान साल भर बाद भी उपार्जन केंद्र या संग्रहण केंद्र में ही पड़ा रह गया।

छत्तीसगढ़ राइस मिल एसोसिएशन के अध्यक्ष योगेश अग्रवाल का कहना है कि राज्य सरकार की ग़लत नीतियों के कारण धान सड़ने की नौबत आई। उनका कहना है कि सरकार ने चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया, जिसके कारण राइस मिलर्स ने धान नहीं उठाया।

योगेश अग्रवाल कहते हैं, “सरकार को बार-बार हमने चिट्ठी लिखी, अनुरोध किया। लेकिन सरकार की नीतियों के कारण धान खुले में पड़ा रह गया। जो धान ख़राब हो चुका है, भला उसका राइस मिलर्स क्या करेंगे?”


वहीं भारतीय जनता पार्टी किसान मोर्चा के अध्यक्ष संदीप शर्मा का कहना है कि गोदाम की कमी के कारण धान की बर्बादी हो रही है लेकिन इसका कारण पूर्ववर्ती सरकारों की उदासीनता है।

जाहिर तौर पर पिछले सालों में खरीदे गए धान की बर्बादी पर राज्य सरकार के मंत्री और अधिकारी कुछ भी नहीं बोलना चाहते।

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