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CG: छत्तीसगढ़ की जनजातियों पर शोध और अनुसंधान की नई राह, गुरु घासीदास विश्वविद्यालय और टीआरकेसी के बीच एमओयू

Wed, 20 Aug 2025 05:37 PM IST
अमन कोशले अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर Published by: अमन कोशले Updated Wed, 20 Aug 2025 05:37 PM IST
सार

छत्तीसगढ़ की जनजातियों पर उच्च स्तरीय शोध और अनुसंधान का रास्ता खुल गया है। गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय, बिलासपुर और ट्रायबल रिसर्च एंड नॉलेज सेंटर (टीआरकेसी) नई दिल्ली के बीच इसके लिए महत्वपूर्ण एमओयू हुआ है।

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New path of research and investigation on tribes of Chhattisgarh MoU between Guru Ghasidas University and TRKC
गुरू घासीदास केन्द्रीय विश्वविद्यालय और टी.आर.के.सी. के बीच हुआ एमओयू - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

छत्तीसगढ़ की जनजातियों पर उच्च स्तरीय शोध और अनुसंधान का रास्ता खुल गया है। गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय, बिलासपुर और ट्रायबल रिसर्च एंड नॉलेज सेंटर (टीआरकेसी) नई दिल्ली के बीच इसके लिए महत्वपूर्ण एमओयू हुआ है। इस समझौते के तहत अगले तीन वर्षों तक छत्तीसगढ़ के बस्तर और सरगुजा क्षेत्र की जनजातियों पर विशेष शोध कार्य किए जाएंगे।
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विश्वविद्यालय की ओर से इस एमओयू पर कुलसचिव प्रो. अभय एस. रणदिवे और टीआरकेसी की ओर से राज्य प्रभारी राजीव शर्मा ने हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आलोक कुमार चक्रवाल, सौराष्ट्र विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति प्रो. नीलांबरी दवे, वनवासी कल्याण आश्रम के अखिल भारतीय युवा कार्यप्रमुख वैभव सुरंगे सहित अनेक प्राध्यापक, शोधार्थी, विद्यार्थी और नागरिक उपस्थित रहे।
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राजीव शर्मा ने बताया कि इस समझौते के बाद छत्तीसगढ़ की जनजातियों पर रिसर्च को नई गति मिलेगी। शोध कार्यों से आदिकालीन सामाजिक संगठन, अर्थशास्त्र, सुशासन, ग्रामीण उद्यमिता, सतत विकास और नवाचार से जुड़े पहलुओं पर नई जानकारियां सामने आएंगी। उन्होंने कहा कि यह रिसर्च जनजातीय युवाओं को अपने गौरवशाली अतीत और संस्कृति को समझने का अवसर देगा।
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विश्वविद्यालय के कुलसचिव ने बताया कि एमओयू के बाद संयुक्त अनुसंधान परियोजनाएं शुरू की जाएंगी। क्षेत्राधारित केस स्टडी, युवाओं और प्रशासकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम, नेतृत्व विकास कार्यशालाएं और प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम आयोजित होंगे। साथ ही सामाजिक प्रभाव आधारित स्टार्टअप्स और नवाचारों पर मार्गदर्शन भी दिया जाएगा।


उन्होंने बताया कि शोध के निष्कर्ष पुस्तकालयों, प्रकाशनों और डेटाबेस के माध्यम से उपलब्ध कराए जाएंगे ताकि जनजातीय समुदाय और आम नागरिकों को अधिक से अधिक जानकारी मिल सके। भविष्य में इन शोधों के आधार पर जनजातीय विषयों को शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में भी शामिल करने की संभावना है।
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