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जिस पानी को पीकर प्यास बुझाते हैं, वही बना डर की वजह…: दूषित जल से किडनी बीमारी का बढ़ा खतरा, 8 मौतों का दावा
Fri, 04 Sep 2026 03:11 PM IST
अमन कोशले
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
Published by: अमन कोशले
Updated Fri, 04 Sep 2026 03:11 PM IST
सार
मुख्यालय में दूषित पानी को लेकर चिंता बढ़ गई है। पिछले छह वर्षों में किडनी बीमारी से 15 से अधिक लोगों की मौत हुई है, जिनमें अकेले वार्ड-3 के आठ लोग शामिल हैं। वार्ड में कई पेयजल स्रोतों में टीडीएस का स्तर अधिक होने की बात सामने आई है।
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दूषित जल से किडनी बीमारी का बढ़ा खतरा, 8 मौतों का दावा
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले का सुपेबेड़ा लंबे समय से दूषित पानी और किडनी की बीमारी को लेकर चर्चा में रहा है, लेकिन अब देवभोग ब्लॉक मुख्यालय के कुछ हिस्सों से भी पेयजल की गुणवत्ता को लेकर चिंता सामने आ रही है। स्थानीय लोगों के अनुसार देवभोग में पिछले कुछ वर्षों के दौरान किडनी की बीमारी से कई लोगों की मौत हो चुकी है। सबसे ज्यादा चिंता नगर पंचायत के वार्ड क्रमांक 3 को लेकर जताई जा रही है।
स्थानीय स्तर पर जुटाई गई जानकारी के मुताबिक, देवभोग मुख्यालय में पिछले करीब छह वर्षों में किडनी बीमारी से 15 से अधिक लोगों की मौत होने का दावा किया जा रहा है। इनमें वार्ड क्रमांक 3 में ही आठ लोगों की मौत की बात सामने आई है। हालांकि इन मौतों का सीधा कारण दूषित पानी है या कोई अन्य स्वास्थ्य कारण, इसे लेकर आधिकारिक चिकित्सकीय पुष्टि जरूरी है।
350 लोगों की आबादी, पानी के स्रोतों पर निर्भरता
वार्ड क्रमांक 3 में करीब 350 लोगों की आबादी रहती है। यहां तीन सार्वजनिक नल कनेक्शन के अलावा लगभग 80 निजी बोर कनेक्शन बताए गए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बोर के पानी में TDS का स्तर अधिक पाया जाता है। इसी वजह से लोग पीने के पानी के लिए वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भर हैं। कुछ परिवारों ने पानी के लिए ऐसे स्थानों का सहारा लिया है, जहां पानी की गुणवत्ता अपेक्षाकृत बेहतर मानी जाती है। कई लोग घर से सैकड़ों मीटर दूर जाकर पीने का पानी लाने को मजबूर हैं।
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स्थानीय निवासी भजन ठाकुर ने बताया कि उन्होंने किडनी की बीमारी के कारण अपने माता-पिता को खोया है। उनका कहना है कि इसके बाद परिवार ने पीने के पानी को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरतनी शुरू कर दी है। वे अपने घर से करीब 600 मीटर दूर स्थित स्रोत से पानी लाते हैं।
घनश्याम ठाकुर के अनुसार परिवार रोजाना खेत जाते समय उपयोग के लिए पर्याप्त पानी साथ लेकर आता है। उनका कहना है कि वार्ड में मौजूद एक सोलर पंप, जिसे लोग पीने योग्य पानी के स्रोत के रूप में इस्तेमाल करते थे, लंबे समय से बंद पड़ा है। स्थानीय लोगों का दावा है कि समाधान शिविरों में आवेदन देने के बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ।
जलापूर्ति व्यवस्था पर भी सवाल
ग्रामीणों और स्थानीय लोगों के अनुसार घर-घर पानी पहुंचाने की व्यवस्था भी नियमित नहीं है। ऐसे में लोगों को हैंडपंप और दूसरे जलस्रोतों से पानी जुटाना पड़ रहा है। पेयजल स्रोतों की गुणवत्ता को लेकर लोगों में चिंता इसलिए भी है क्योंकि वार्ड में किडनी बीमारी से कई मौतों का दावा किया जा रहा है। हालांकि स्वास्थ्य विभाग के स्तर पर इन मौतों और पानी की गुणवत्ता के बीच प्रत्यक्ष संबंध की पुष्टि होना अभी बाकी है।
विभागीय जांच में सामने आई अलग तस्वीर
दूसरी ओर, पीएचई विभाग के उपयंत्री बीएस सिदार के अनुसार नगरवासियों की मांग पर वार्ड क्रमांक 3 के पेयजल स्रोतों की जांच कराई गई थी। उन्होंने बताया कि विभागीय जांच में अधिकतम 300 मिलीग्राम टीडीएस पाया गया। उनके मुताबिक पेयजल में टीडीएस का स्तर 300 से 500 मिलीग्राम तक स्वीकार्य माना जाता है। ऐसे में विभागीय जांच के आंकड़े स्थानीय लोगों द्वारा बताए जा रहे 800 से 1200 टीडीएस के दावों से अलग हैं।
डॉक्टर ने भी जताई सावधानी की जरूरत
बीएमओ प्रकाश साहू ने बताया कि यदि पानी में निर्धारित स्तर से अधिक मात्रा में कुछ तत्व लंबे समय तक मौजूद रहें और ऐसा पानी लगातार पिया जाए तो स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। उन्होंने पाचन तंत्र और हड्डियों से जुड़ी परेशानियों की संभावना का उल्लेख किया।
हालांकि उन्होंने यह भी बताया कि वार्ड क्रमांक 3 की आबादी के अनुपात में जलजनित बीमारियों के स्पष्ट लक्षण सामने नहीं आए हैं और इस संबंध में कोई बड़ी शिकायत या मरीज अस्पताल तक पहुंचने की जानकारी नहीं है। उनके अनुसार वार्ड के एक मरीज का सफल उपचार भी किया गया है।
अब सवाल पानी की गुणवत्ता और निगरानी का
देवभोग में सामने आई यह स्थिति दो अलग-अलग तस्वीरें पेश करती है। एक तरफ स्थानीय लोग पानी की गुणवत्ता को लेकर चिंता जता रहे हैं और किडनी बीमारी से हुई मौतों का हवाला दे रहे हैं, वहीं विभागीय जांच में TDS का स्तर स्वीकार्य सीमा के भीतर बताए जाने की बात सामने आई है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि पेयजल स्रोतों की नियमित और पारदर्शी जांच हो, बंद पड़े जलस्रोतों को चालू कराया जाए और लोगों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराया जाए। साथ ही किडनी बीमारी से हुई मौतों और पेयजल की गुणवत्ता के बीच संबंध को लेकर स्वास्थ्य विभाग द्वारा तथ्यात्मक जांच की जाए, ताकि वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।
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स्थानीय स्तर पर जुटाई गई जानकारी के मुताबिक, देवभोग मुख्यालय में पिछले करीब छह वर्षों में किडनी बीमारी से 15 से अधिक लोगों की मौत होने का दावा किया जा रहा है। इनमें वार्ड क्रमांक 3 में ही आठ लोगों की मौत की बात सामने आई है। हालांकि इन मौतों का सीधा कारण दूषित पानी है या कोई अन्य स्वास्थ्य कारण, इसे लेकर आधिकारिक चिकित्सकीय पुष्टि जरूरी है।
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350 लोगों की आबादी, पानी के स्रोतों पर निर्भरता
वार्ड क्रमांक 3 में करीब 350 लोगों की आबादी रहती है। यहां तीन सार्वजनिक नल कनेक्शन के अलावा लगभग 80 निजी बोर कनेक्शन बताए गए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बोर के पानी में TDS का स्तर अधिक पाया जाता है। इसी वजह से लोग पीने के पानी के लिए वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भर हैं। कुछ परिवारों ने पानी के लिए ऐसे स्थानों का सहारा लिया है, जहां पानी की गुणवत्ता अपेक्षाकृत बेहतर मानी जाती है। कई लोग घर से सैकड़ों मीटर दूर जाकर पीने का पानी लाने को मजबूर हैं।
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स्थानीय निवासी भजन ठाकुर ने बताया कि उन्होंने किडनी की बीमारी के कारण अपने माता-पिता को खोया है। उनका कहना है कि इसके बाद परिवार ने पीने के पानी को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरतनी शुरू कर दी है। वे अपने घर से करीब 600 मीटर दूर स्थित स्रोत से पानी लाते हैं।
घनश्याम ठाकुर के अनुसार परिवार रोजाना खेत जाते समय उपयोग के लिए पर्याप्त पानी साथ लेकर आता है। उनका कहना है कि वार्ड में मौजूद एक सोलर पंप, जिसे लोग पीने योग्य पानी के स्रोत के रूप में इस्तेमाल करते थे, लंबे समय से बंद पड़ा है। स्थानीय लोगों का दावा है कि समाधान शिविरों में आवेदन देने के बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ।
जलापूर्ति व्यवस्था पर भी सवाल
ग्रामीणों और स्थानीय लोगों के अनुसार घर-घर पानी पहुंचाने की व्यवस्था भी नियमित नहीं है। ऐसे में लोगों को हैंडपंप और दूसरे जलस्रोतों से पानी जुटाना पड़ रहा है। पेयजल स्रोतों की गुणवत्ता को लेकर लोगों में चिंता इसलिए भी है क्योंकि वार्ड में किडनी बीमारी से कई मौतों का दावा किया जा रहा है। हालांकि स्वास्थ्य विभाग के स्तर पर इन मौतों और पानी की गुणवत्ता के बीच प्रत्यक्ष संबंध की पुष्टि होना अभी बाकी है।
विभागीय जांच में सामने आई अलग तस्वीर
दूसरी ओर, पीएचई विभाग के उपयंत्री बीएस सिदार के अनुसार नगरवासियों की मांग पर वार्ड क्रमांक 3 के पेयजल स्रोतों की जांच कराई गई थी। उन्होंने बताया कि विभागीय जांच में अधिकतम 300 मिलीग्राम टीडीएस पाया गया। उनके मुताबिक पेयजल में टीडीएस का स्तर 300 से 500 मिलीग्राम तक स्वीकार्य माना जाता है। ऐसे में विभागीय जांच के आंकड़े स्थानीय लोगों द्वारा बताए जा रहे 800 से 1200 टीडीएस के दावों से अलग हैं।
डॉक्टर ने भी जताई सावधानी की जरूरत
बीएमओ प्रकाश साहू ने बताया कि यदि पानी में निर्धारित स्तर से अधिक मात्रा में कुछ तत्व लंबे समय तक मौजूद रहें और ऐसा पानी लगातार पिया जाए तो स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। उन्होंने पाचन तंत्र और हड्डियों से जुड़ी परेशानियों की संभावना का उल्लेख किया।
हालांकि उन्होंने यह भी बताया कि वार्ड क्रमांक 3 की आबादी के अनुपात में जलजनित बीमारियों के स्पष्ट लक्षण सामने नहीं आए हैं और इस संबंध में कोई बड़ी शिकायत या मरीज अस्पताल तक पहुंचने की जानकारी नहीं है। उनके अनुसार वार्ड के एक मरीज का सफल उपचार भी किया गया है।
अब सवाल पानी की गुणवत्ता और निगरानी का
देवभोग में सामने आई यह स्थिति दो अलग-अलग तस्वीरें पेश करती है। एक तरफ स्थानीय लोग पानी की गुणवत्ता को लेकर चिंता जता रहे हैं और किडनी बीमारी से हुई मौतों का हवाला दे रहे हैं, वहीं विभागीय जांच में TDS का स्तर स्वीकार्य सीमा के भीतर बताए जाने की बात सामने आई है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि पेयजल स्रोतों की नियमित और पारदर्शी जांच हो, बंद पड़े जलस्रोतों को चालू कराया जाए और लोगों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराया जाए। साथ ही किडनी बीमारी से हुई मौतों और पेयजल की गुणवत्ता के बीच संबंध को लेकर स्वास्थ्य विभाग द्वारा तथ्यात्मक जांच की जाए, ताकि वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।