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छत्तीसगढ़ के इन दो शिक्षकों को सलाम, नदी-नाले, पहाड़ पार कर पहुंचते हैं स्कूल

Thu, 08 Sep 2016 12:51 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 08 Sep 2016 12:51 PM IST
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Chhattisgarh: Story of two devoted teachers
- फोटो : amar ujala

प्राइमरी स्‍कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों के ऐसे किस्से तो आपने अक्सर सुने होंगे कि महीनों महीनों स्कूल में उनके दर्शन नहीं होते हैं या फलां शिक्षक की जगह कोई और पढ़ाता मिल जाए। लेकिन छत्तीसगढ़ के इन दो शिक्षकों की कहानी बिल्कुल अलग है और वो नसीहत हैं उन तमाम शिक्षकों के लिए जो बच्चों को शिक्षा देने को सरकारी ड्यूटी से ज्यादा कुछ नहीं समझते।

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चुनौतियों के लिए व्याकुल और शिक्षा के लिए तत्पर छत्तीसगढ़ के इन दो शिक्षकों की कहानी आपको हैरत में डाल सकती है। राज्य के बिलासपुर जिले के पेंडरा ब्लॉक के आदिवासी इलाके के स्कूल में पढ़ाने के लिए इन शिक्षकों को 12 किलोमीटर का सफर रोज तय करना पड़ता है जिसमें जंगल, पहाड़, नदी और जंगली जानवरों से जूझते हुए जैसे तैसे स्कूल पहुंचते हैं। 
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टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार शिक्षकों के दायित्व निभाने का यह दुर्लभ मामला है बिलासपुर जिले के पेंडरा ब्लॉक का। यहां के आदिवासी बहुल गांव बमहानी के स्कूल में पढ़ाने वाले हेडमास्टर प्रेम सिंह सरोठे और शिक्षक अनिल पैकरा अपने दायित्व के प्रति इस कदर समर्पित हैं किसी भी तरह की चुनौती से नहीं डरते।

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12 साल से दायित्व का निर्वाह कर रहे हैं दोनों शिक्षक

Chhattisgarh: Story of two devoted teachers

लगभग दशकभर से यहां पढ़ाने वाले दोनों शिक्षक जिस तरह के खतरे उठाकर स्कूल पहुंचते उसे देखकर कोई भी खौफजदा हो जाए। घर से 12 किलोमीटर दूर पड़ने वाले स्कूल के रास्ते में दोनों शिक्षकों को रोजाना घने जंगल, नदी और पहाड़ी रास्ते का सफर तय करना पड़ता है। 

खास बात ये है कि जिस जंगल से होकर ये रोज स्कूल पहुंचते हैं उसमें तेंदुआ और भालू जैसे खुंखार जानवरों से भी अक्सर इनका सामना हो जाता है। बावजूद इसके शिक्षा के प्रति समर्पण का इनका जज्बा कभी कम नहीं हुआ। 

बिना नागा और देरी के दोनों शिक्षक रोजाना स्कूल पहुंचते हैं। असल में दोनों शिक्षकों के वहां पढ़ाने जाने का सिलसिला भी काफी रोचक है। दशकभर पहले धोड़गापरा गांव बमहानी ग्राम पंचायत में आता था। 

बच्चों के प्यार में नहीं छोड़ी नौकरी

Chhattisgarh: Story of two devoted teachers

पूर्व में प्राइमरी स्कूल भी बमहानी में हुआ करता था और धोड़पागरा गांव के बच्चे पढ़ने के लिए बमहानी आया करते थे। इस दौरान बच्चों को छह किलोमीटर का खतरनाक सफर तय करना पड़ता था जिसे अब वह दोनों शिक्षक करते हैं। 

बच्चों की समस्या को देखते हुए स्कूल धोड़पागरा में शिफ्ट कर दिया गया। नतीजतन बच्चों की राह तो आसान हो गई लेकिन शिक्षकों के लिए समस्या खड़ी हो गई। शिक्षकों को अब उसी दुर्गम रास्ते और जंगल से होकर स्‍कूल पहुंचना पड़ता है। 

वैसे दोनों शिक्षकों के पास विकल्प था कि वे अपना ट्रांसफर कहीं ओर कराकर स्कूल छोड़ देते। लेकिन स्कूल के छात्रों से लगाव और शिक्षा के प्रति अपने समर्पण की वजह से दोनों ने उसी स्कूल में बने रहने का फैसला किया और पिछले 12 सालों से ये सिलसिला बदस्तूर चला आ रहा है।

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