{"_id":"61ea4926100bd7f2734ed741d73419a1","slug":"chhattisgarh-maovadi-journalists","type":"story","status":"publish","title_hn":"जहां पत्रकारों के लिए है इधर कुंआ, उधर खाई..","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जहां पत्रकारों के लिए है इधर कुंआ, उधर खाई..
Updated Thu, 19 Dec 2013 12:22 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
छत्तीसगढ के नक्सल प्रभावित बस्तर में माओंवादियों ने पिछले दिनों एक पत्रकार की हत्या कर दी। उसके बाद पत्रकारों ने माओवादियों की खबरों का बहिष्कार करने का फैसला किया है।
विज्ञापन
मगर इस पूरे घटनाक्रम की पर्तें हटाई जाएं तो एक बडी समस्या से सामना होता है।
उस इलाके से रिपोर्टें भेजने वाले पत्रकारों की मुश्किल दंतेवाडा से प्रकाशित एक दैनिक अखबार के संपादक सुरेश महापात्रा एक लाइन में सामने रख देते हैं।
सुरेश कहते हैं, “हमारे लिए तालिबान जैसे हालात हैं। माओवादियों की खबरें छापें तो कहा जाता है कि हम माओवादियों का प्रचार कर रहे हैं और पुलिस की खबरें छापें तो माओवादी हमें पुलिस का दलाल और मुखबिर घोषित कर देते हैं।”
विज्ञापन
इसी महीने की छह तारीख को बीजापुर जिले में संदिग्ध माओवादियों ने स्थानीय पत्रकार साई रेड्डी की हत्या कर दी थी।
इसके बाद बस्तर, दंतेवाडा, नारायणपुर, सुकमा, कोंडागांव, बीजापुर और कांकेर जिले के पत्रकारों ने माओवादियों की खबरों के बहिष्कार का फैसला किया।
पहले भी हो चुका है बहिष्कार
यह पहला अवसर नहीं है, जब पत्रकारों ने माओवादियों की खबरों के बहिष्कार का फैसला लिया है।
इस वर्ष फरवरी में भी माओवादियों ने सुकमा में एक पत्रकार नेमीचंद जैन की हत्या कर दी थी।
घटना स्थल पर नक्सलियों का एक पर्चा बरामद हुआ था जिसमें आरोप लगाया गया था कि नेमीचंद को पुलिस के लिए जासूसी करने के आरोप में मारा गया है।
बाद में माओवादियों ने इस हत्या में अपने संगठन के शामिल होने से इनकार कर दिया था।
जब पत्रकारों ने नक्सलियों की खबरों का बहिष्कार करना शुरू किया और इस हत्या के खिलाफ आंदोलन चलाया तो नक्सलियों ने नेमीचंद जैन की हत्या पर खेद जताया था।
सुरेश महापात्रा का आरोप है कि प्रशासन का एक बडा अमला नहीं चाहता कि बस्तर के गांवों की खबरें राजधानी और देश-दुनिया में जाए, माओवादी भी यही चाहते हैं।
दोतरफा दबाव
जाहिर है, पुलिस और नक्सलियों का दोतरफा दबाव झेलने वाले बस्तर के पत्रकारों द्वारा माओवादियों की खबरों के बहिष्कार ने बस्तर में पत्रकारों के काम करने की परिस्थितियों पर भी सवाल खडे कर दिए हैं।
विज्ञापन
बस्तर में काम करने वाले अधिकांश पत्रकार अखबार या टीवी चैनलों के साथ अलिखित अनुबंध के आधार पर काम करते हैं। इन पत्रकारों को ना तो वेतन मिलता है और ना ही कोई सुरक्षा।
अधिकांश पत्रकार मूलतः ‘एजेंट संवाददाता’ के बतौर काम करते हैं।
इसके बदले इन पत्रकारों को अखबार की बिक्री और उनके द्वारा जुटाए गए विज्ञापन में कमीशन मिलता है और साथ में संवाददाता होने का एक पहचान पत्र।
ऐसी स्थिति में अधिकांश पत्रकार अपनी आजीविका के लिये दूसरे काम-धंधों पर निर्भर करते हैं।
'नक्सली हमले' में पत्रकार की मौत
अखबार प्रबंधन का दोहरा रवैया
कांकेर के स्वतंत्र पत्रकार कमल शुक्ला मानते हैं कि बस्तर के अधिकांश पत्रकारों की मजबूरी है कि वे अपना जीवनयापन करने के लिए कोई और रोजगार करें।
कमल शुक्ला कहते हैं, “माओवादियों को मीडिया को लेकर अपनी नीति घोषित करनी चाहिए। अगर किसी पत्रकार की किसी खबर या व्यावसायिक गतिविधि से उन्हें परेशानी है तो उसकी सार्वजनिक घोषणा करनी चाहिए।”
दंतेवाडा के पत्रकार हेमंत कश्यप का आरोप है कि जैसे ही पत्रकार किसी मुश्किल में होता है, अखबार का प्रबंधन उसे अपना नियमित कर्मचारी नहीं होने का हवाला देकर अपना पल्ला झाड लेता है।
माओवादी भी स्थानीय पत्रकारों को डराकर रखना चाहते हैं।
हेमंत सवाल पूछते हैं कि “जब कोई राष्ट्रीय पत्रकार नक्सलियों के खिलाफ लिखता है तो नक्सली बयान जारी कर स्पष्टीकरण देते हैं लेकिन स्थानीय पत्रकार जब तथ्यों के साथ कुछ लिखता है तो नक्सली उसे अपना गांव, घर, गलियां, चौरा और देवालय सब छोड कर भाग जाने को कहते हैं। उसका हश्र नेमीचंद या साई रेड्डी जैसा करते हैं। ऐसा क्यों?''
तात्कालिक प्रतिक्रिया
रायपुर के वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार का कहना है कि, ''बस्तर या छत्तीसगढ के किसी भी ग्रामीण इलाके या कस्बे में एकाध बडे अखबारों या चैनलों को छोड कर किसी के लिये संभव नहीं है कि वह वहां पूर्णकालिक पत्रकार रखे।
उन्होंने कहा, "अखबारों या चैनलों की जरुरत भी वैसी नहीं है। अंशकालीन पत्रकार रखे जाने की हालत में ऐसे पत्रकार की काम की सुविधाएं और वेतन भी उसी तरह होता हैं।''
सुनील कुमार कहते हैं, “बहिष्कार किसी का भी और कभी नहीं होना चाहिए लेकिन हर किसी के लिए अपनी जिंदगी की रक्षा उसकी पहली जिम्मेदारी होती है। बस्तर में जब माओवादी सोच-समझ कर पत्रकारों की हत्या कर रहे हैं तो पत्रकारों के इस बहिष्कार को तात्कालिक प्रतिक्रिया और प्रतीक के तौर पर देखा जाना चाहिए।"
उनके मुताबिक, "पेशे की नैतिकता और दूसरे मूल्य ऐसी परिस्थितियों में कुछ समय के लिए निलंबित रखे जाते हैं। जब आपके घर में आग लगी हो तो पूजा के कमरे में जूते उतार कर घुसने की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए।”