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छत्तीसगढ़ः जिंदा रहने के लिए कौड़ियों में फसल बेच रहे किसान

Sun, 22 Nov 2015 07:33 PM IST
आलोक प्रकाश पुतुल रायपुर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
आलोक प्रकाश पुतुल रायपुर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए Updated Sun, 22 Nov 2015 07:33 PM IST
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chhatisgarh: farmer sold paddy on low price

छत्तीसगढ़ के किसान जिंदा रहने घाटे में अपना धान बेच रहे हैं, छत्तीसगढ़ में प्रति एकड़ में धान के उत्पादन का खर्च ही 20 हजार रुपयों से उपर का बैठता है उसके बाद भी किसान इसे 6 हजार रुपये घाटे में बेच रहे हैं।

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जाहिर है कि जिंदा रहने के लिये घाटा ही सही, उधर, हाल ही में छत्तीसगढ़ में कई किसानों ने आत्महत्या कर ली है, बिलासपुर के मस्तूरी इलाक़े के किसान हेमराज मनहर से अगर आप समर्थन मूल्य पर धान बेचने का सवाल पूछें तो वे लगभग फट पड़ते हैं, “मर नहीं सकते और ज़िंदा रहना है, इसलिए धान बेचना पड़ता है।
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घाटे में अपनी फ़सल बेचना भला किसे अच्छा लगता है?” इस तरह का जवाब देने वाले हेमराज अकेले नहीं हैं। धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में सोमवार से सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान ख़रीद शुरू की है, लेकिन किसान इससे ख़ुश नहीं हैं।
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असल में किसानों को अपनी फ़सल की जो क़ीमत मिल रही है, उससे लागत मूल्य भी नहीं निकलने वाला। यह तब है, जब स्वामीनाथन कमेटी ने सिफ़ारिश की थी कि किसानों को लागत से 50 फ़ीसदी अधिक समर्थन मूल्य दिया जाना चाहिए।

छत्तीसगढ़ में लगभग 85 प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हैं और संख्या के हिसाब से देखें तो क़रीब 27.5 लाख किसान धान की खेती करते हैं।

धान का गणित

chhatisgarh: farmer sold paddy on low price

हालांकि देश में धान का औसत उत्पादन 32.1 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है और छत्तीसगढ़ में यह केवल 17.6 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है, लेकिन राज्य में धान की विभिन्न प्रजातियां इसे दूसरे राज्यों से अलग करती हैं, जिनकी संख्या 22,972 के आसपास है।

राज्य सरकार हर साल न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों से धान ख़रीदती है, 2012-13 में 71.2 लाख टन, 2013-14 में 79.7 लाख टन और पिछले साल 2014-15 में सरकार ने 62.72 लाख टन धान किसानों से ख़रीदा।

पिछले विधानसभा चुनाव के समय राज्य की भाजपा सरकार ने किसानों को 2,400 रुपये धान का समर्थन मूल्य देने का वादा किया था। चुनाव जीत कर जब भाजपा फिर से सत्ता में आई तो राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने सबसे पहले तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार को पत्र लिख कर धान का समर्थन मूल्य बढ़ाने का अनुरोध किया, इस मामले पर केंद्र सरकार ने हाथ खड़े कर लिए।

इसके बाद राज्य की भाजपा सरकार ने केंद्र की कांग्रेसी सरकार के पाले में गेंद डाल कर चुप्पी साध ली, लेकिन केंद्र में भाजपा की सरकार आने के बाद भी राज्य सरकार इस मामले पर चुप्पी साधे हुए है। राज्य में इस साल भी मोटे धान के लिए 1,110 रुपये और पतले धान के लिए 1,150 रुपये किसानों को दिए जा रहे हैं।

इसके साथ प्रति क्विंटल तीन सौ रुपये बोनस दिया जा रहा है, यानी मोटे धान के लिए 1410 और पतले धान के लिए 1450 रुपये समर्थन मूल्य। कांग्रेस विधायक और धान के समर्थन मूल्य की लड़ाई लड़ रहे किसान नेता धनेंद्र साहू का कहना है कि सरकार अपने वादे से पलट गई और उसने किसानों को धोखा दिया है।

किसानों के लिए कुछ नहीं कर रही सरकार

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साहू कहते हैं, “चौबीस सौ रुपये की कौन कहे, सरकार 1200 रुपये भी किसानों को नहीं दे रही है।” हालांकि भाजपा प्रवक्ता और विधायक श्रीचंद सुंदरानी कहते हैं कि रमन सिंह सरकार को किसानों की चिंता है, कांग्रेस आंसू बहाना बंद करे। लेकिन लागत से भी कम, सरकारी समर्थन मूल्य की यह स्थिति पड़ोसी राज्यों में भी ऐसी ही है।

मध्यप्रदेश में भी किसानों को छत्तीसगढ़ जितना ही समर्थन मूल्य दिया जा रहा है, मध्यप्रदेश के कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन कहते हैं, “केंद्र सरकार ने जो न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया है, हमारी सरकार वही क़ीमत किसानों को दे रही है, फ़िलहाल तो क़ीमत बढ़ाने का कोई प्रस्ताव नहीं है।”

हालांकि झारखंड में किसानों को एक क्विंटल धान के बदले 1,700 रुपये का समर्थन मूल्य दिया जा रहा है और राज्य के खाद्य, सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री सरयू राय इसे पर्याप्त मानते हैं।

वे कहते हैं, “झारखंड में धान की खेती में बीज, खाद और कीटनाशक पर दूसरे राज्यों की तुलना में लागत कम है, इसलिए किसान ख़ुश है। समर्थन मूल्य बढ़ाने पर अगले साल विचार किया जाएगा।”

अपने खेत में ही मजदूर होकर रह गए धान वाले किसान

chhatisgarh: farmer sold paddy on low price

लेकिन कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर संकेत ठाकुर इसे बेहद निराशाजनक स्थिति मानते हैं। वो बताते हैं कि राज्य के 78 फ़ीसदी किसान ऐसे हैं, जिनके पास दो एकड़ से भी कम खेत हैं। संकेत ठाकुर कहते हैं, “धान का किसान अपने ही खेत में मज़दूरी करता रहता है और इस मज़दूरी के बदले उसे कुछ नहीं मिलता।

बस किसी तरह उसकी आजीविका चलती रहती है, यही कारण है कि हाल के दिनों में राज्य के 33.50 लाख किसानों में से 6 लाख किसानों ने हमेशा के लिए खेती छोड़ दी।”

दूसरी ओर सामाजिक कार्यकर्ता गौतम बंदोपाध्याय का कहना है कि एक तरफ धान उत्पादन और दूसरी ओर पीडीएस सिस्टम में मिलर्स से चावल लेने की सरकारी प्रक्रिया को बंद कर उत्पादन, उसकी प्रोसेसिंग और उसका वितरण किसानों के हाथ में सौंपना होगा।

बंदोपाध्याय कहते हैं, “भारत सरकार कई अवसरों पर कह चुकी है कि धान का आयात हमारे लिए मुनाफे का मामला होगा, इसका साफ मतलब है कि खेती और खाद्यान्न पर हमारी आत्मनिर्भरता ख़त्म कर दी जाएगी और धान की खेती की ज़मीन उद्योग, नगदी फसलें, बीज उगाने जैसे उपक्रमों में इस्तेमाल की जाएंगी। इस ख़तरनाक साज़िश को समझने की ज़रूरत है।”

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