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ऐसा गांव जहां महीनों से नहीं सोए लोग

Tue, 08 Oct 2013 11:06 AM IST
सलमान रावी
सलमान रावी Updated Tue, 08 Oct 2013 11:06 AM IST
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chhatisgarh_elephants_deaths

आज रात चांद नहीं निकला है और चारों तरफ घुप अंधेरा छाया है। छत्तीसगढ़ के धरमजयगढ़ तहसील में कई गांव ऐसे हैं, जहां के लोग महीनों से रात को नहीं सोए हैं।

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सूरज ढलते ही इनकी रतजगे की तैयारी शुरू हो जाती है। मैं इन्हीं में से एक गांव सागरपुर में रात बिताने आया हूं।

हाथी कभी भी आ सकते हैं। उनके आगे किसकी मर्जी चलती है।

और वे आ जाते हैं। गांव के लोग हाथों में लाठियां और टॉर्च लेकर जंगल से लगे खेतों की तरफ दौड़ रहे हैं। तभी आवाज़ आती है- "हाथी यहां हैं"।

बस इस हांक पर लोगों का यह हुजूम शोर मचाता हुआ उसी तरफ दौड़ पड़ता है। हाथियों को जंगल तक खदेड़ने के बाद गांव के लोग वापस लौट आते हैं, तभी कहीं दूर से शोर सुनाई देता है।
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बढ रहा है टकराव
मेरे साथ सागरपुर के रहने वाले प्रसून साहा हैं। वे बताते हैं कि यहां से खदेड़े जाने के बाद हाथियों का झुंड अब पास वाले किसी पडोसी गांव में घुस गया है।

सागरपुर और आसपास के लोगों की नींद हराम है और उन्हें पता है उनकी मदद के लिए कोई नहीं आने वाला।

गांव में शाम से ही फटे-पुराने कपड़ों की मशाल बनाने का काम शुरू हो जाता है। कोई मिट्टी के तेल के इंतज़ाम में लग जाता है, तो कोई पुराने टायर इकठ्ठा करने में। शाम ढलते ही आस-पास के जंगलों में हरकत शुरू होने लगती है।
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प्रसून साहा बांग्लादेश से आए शरणार्थी हैं, जिनका परिवार तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान यानी बांग्लादेश से यहां भागकर आया था। सरकार ने साहा की तरह वहां से आए लोगों को धरमजयगढ़ के इलाके में ज़मीन के पट्टे देकर बसाया था।

इस पूरे इलाके में बसने वाले अमूमन सभी लोग किसान हैं, जिनके पास खेती के सिवाय रोजी-रोटी कमाने की कोई और राह नहीं है।

पिछले दस साल से वे हाथियों के हमले के बीच रहना सीख रहे थे और ये टकराव अब बढते जा रहे हैं।

फसलें बर्बाद
प्रसून साहा को इस बार काफी नुकसान हुआ है। उनका कहना है कि आर्थिक रूप से अब वे कभी संभल नहीं पाएंगे। कई एकड़ में फैली उनकी तैयार हो चुकी मकई की फसल को हाथियों ने तबाह कर दिया है। उन पर अब लाखों रुपए का कर्ज है।

सागरपुर में साहा की तरह कई ऐसे ग्रामीण हैं, जिनका सब कुछ बर्बाद हो चुका है।

सागरपुर के बाशिंदे अपने मकानों और खेतों की रक्षा के लिए पहरेदारी कर रहे हैं। लोगों की रातें घरों के बाहर गुज़रती हैं।

लोग बताते हैं कि इस साल 31 जुलाई को बायसी गांव में जब हाथियों ने हमला किया था, तो बिमल सील अपने परिवार के साथ सो रहे थे। हाथियों ने उनका मकान गिरा दिया। दीवार के मलबे में उनकी चार साल की बेटी दब गई और बडी मुश्किल से उसे निकाला गया। उसको काफी चोटें आईं थीं।

जब हाथी चले गए, तो रात को ही गांव के कई लोग मुझे अपने-अपने टूटे मकान दिखाने की जिद करते रहे। मेरे साथ गए सामाजिक कार्यकर्ता धीरेन्द्र सिंह मालिया ने रात में ज्यादा अंदर जाने से मना किया क्योंकि हाथियों का झुंड बहुत दूर नहीं गया था।

कोई नहीं उठाता फोन
लोग कह रहे थे कि रात के वक़्त जब कभी हाथियों का झुंड उनके गांव और खेतों पर हमला करता है, तो वन विभाग के लोग अपने मोबाइल फोन या तो उठाते नहीं हैं या उन्हें बंद कर देते हैं।

वन विभाग के अमले के रवैये से गांववालों की बेबसी और बढ़ रही है। इसी इलाके के रहने वाले तापस बिस्वास कहते हैं कि लाख मिन्नतों के बावजूद वन विभाग के लोग न तो उन्हें बड़ी टॉर्च देते हैं, न मशाल जलाने के लिए मिट्टी का तेल और न पटाखे।

गांववालों के इस दावे की तस्दीक शुभ्रांशु चौधरी ने भी की, जिनके सिटीजन जर्नलिज्म नेटवर्क  सीजीनेट स्वरा पर अक्सर इन इलाकों में फंसे लोग अपनी  तकलीफ साझा करते हैं।

चौधरी के मुताबिक ये  रोज़ का सिलसिला है। "जब कभी भी लोगों पर हाथियों का  हमला होता है, तो वे सीजीनेट मोबाइल पर फोन कर अपनी  आपबीती सुनाते हैं। कभी-कभी ऐसा हो भी जाता है कि 'सीजीनेट' पर  लोगों की गुहार सुनकर, वन विभाग के अधिकारियों की नींद खुलती है।"

धरमजयगढ़ के वन मंडल अधिकारी आरसी अग्रवाल कहते हैं कि ऐसा नहीं है। उनके मुताबिक हाथियों के हमले से निपटने के लिए एक रैपिड एक्शन फोर्स का गठन किया गया है, जिसके पास गाडी, पटाखे और सायरन मौजूद हैं।


अग्रवाल कहते हैं कि जब भी कोई आपात स्थिति पैदा होती है तो दल उस जगह पहुंचकर हाथियों को खदेड़ने का काम करता है। उन्होंने बताया कि इसके अलावा विभाग ने गांववालों को सलाह दी है कि जब कभी हाथियों का दल उनके गांव की तरफ आए तो वो मिर्च का बुरादा उनकी तरफ उड़ायें या फिर मिर्चों को जलाएं।

गांव के लोगों को विभाग का यह सुझाव भा नहीं रहा है क्योंकि बाज़ार में मिर्चें काफी महंगी हैं।

प्रसून साहा बताते हैं कि पहले इस इलाके में मिर्चों की खेती हुआ करती थी। मगर उससे हाथियों को कोई फर्क नहीं पड़ा और उनकी आवाजाही बदस्तूर जारी रही।

सरकारी दावों की पोल उस रात खुल गई, जब मेरे सामने गांव वाले वन विभाग के अधिकारियों को फोन लगाने की नाकाम कोशिशें कर रहे थे।

वजह यह थी कि जिस झुंड को कुछ देर पहले ही गांव वालों को खदेडा था, वे फिर गांव की तरफ आ रहे थे। फिर मशालें, टॉर्च, हल्ला, दौडभाग।

मैंने सहमी हुई औरतों को अपने बच्चों को गोद से चिपकाते और उन्हें चुप कराते देखा।

मिर्चें लाएं तो कहां से

अग्रवाल कहते हैं कि जब भी कोई आपात स्थिति पैदा होती है तो दल उस जगह पहुंचकर हाथियों को खदेड़ने का काम करता है। उन्होंने बताया कि इसके अलावा विभाग ने गांववालों को सलाह दी है कि जब कभी हाथियों का दल उनके गांव की तरफ आए तो वो मिर्च का बुरादा उनकी तरफ उड़ायें या फिर मिर्चों को जलाएं।

गांव के लोगों को विभाग का यह सुझाव भा नहीं रहा है क्योंकि बाज़ार में मिर्चें काफी महंगी हैं।

प्रसून साहा बताते हैं कि पहले इस इलाके में मिर्चों की खेती हुआ करती थी। मगर उससे हाथियों को कोई फर्क नहीं पड़ा और उनकी आवाजाही बदस्तूर जारी रही।

सरकारी दावों की पोल उस रात खुल गई, जब मेरे सामने गांव वाले वन विभाग के अधिकारियों को फोन लगाने की नाकाम कोशिशें कर रहे थे।

वजह यह थी कि जिस झुंड को कुछ देर पहले ही गांव वालों को खदेडा था, वे फिर गांव की तरफ आ रहे थे। फिर मशालें, टॉर्च, हल्ला, दौडभाग।

मैंने सहमी हुई औरतों को अपने बच्चों को गोद से चिपकाते और उन्हें चुप कराते देखा।

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