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Hindi News ›   Chhattisgarh ›   Bilaspur High Court allowed to fight case on the basis of power of attorney

CG: बिलासपुर हाईकोर्ट ने पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर मुकदमा लड़ने की अनुमति दी, ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द

Tue, 13 May 2025 07:58 PM IST
श्याम जी. अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर
अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर Published by: श्याम जी. Updated Tue, 13 May 2025 07:58 PM IST
सार

जस्टिस राकेश मोहन पांडेय ने पावर ऑफ अटॉर्नी के माध्यम से मुकदमा लड़ने की अनुमति देते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। याचिकाकर्ता को नए शपथ पत्र के साथ जवाब दाखिल करने का आदेश दिया।

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Bilaspur High Court allowed to fight case on the basis of power of attorney
बिलासपुर हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सिविल मैटर के एक मामले में निचली अदालत के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई हाईकोर्ट के सिंगल बेंच में हुई। जस्टिस राकेश मोहन पांडेय ने सुनवाई के बाद अपने फैसले में लिखा है कि पावर अटार्नी के माध्यम से मुकदमा लड़ा जा सकता है। इस टिप्पणी के साथ ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता से नए सिरे शपथ पत्र के साथ जवाब स्वीकार करने और गुण-दोष के आधार पर मामले का फैसला करने का आदेश दिया है। 

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बता दें कि याचिकाकर्ता यशोदा देवी जायसवाल ने प्रथम अतिरिक्त न्यायाधीश द्वारा 12.मार्च 2025 के आदेश को अपने अधिवक्ता संदीप दुबे के माध्यम से चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। याचिकाकर्ता के अलावा अग्निश्वर व अभिजीत डे ने खसरा नंबर 17/31 और 17/32 की भूमि के संबंध में स्वामित्व की घोषणा और स्थायी निषेधाज्ञा के लिए सिविल मुकदमा दायर किया, जिसका क्षेत्रफल क्रमशः 0.106 और 0.016 हेक्टेयर है। अग्निश्वर व अभिजीत व मां हेना डे ने अपना लिखित बयान पेश किया। 
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इसी बीच अग्निश्वर डे की ओर से पावर ऑफ अटॉर्नी रिकॉर्ड पर लेने के लिए सीपीसी की धारा 151 के साथ सीपीसी के आदेश 8 नियम 1ए (3) के तहत एक आवेदन दायर किया। याचिकाकर्ता ने अपना जवाब पेश किया। प्रमुख पक्षकार की ओर से बताया गया कि रमेश जायसवाल मुकदमे में पक्षकार नहीं है। यह भी कहा कि लिखित बयान 22.अक्टूबर 2018 को दिनेश कुमार जायसवाल द्वारा दायर किया गया था और उस समय पावर ऑफ अटॉर्नी पेश नहीं की गई थी। जवाब पर विचार करते हुए ट्रायल कोर्ट ने आवेदन को खारिज कर दिया। 
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ट्रायल कोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता यशोदा जायसवाल ने हा कोर्ट में याचिका दायर की। मामले की सुनवाई जस्टिस राकेश मोहन पांडेय के सिंगल बेंच में हुई। याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए कहा गया कि पावर ऑफ अटॉर्नी से मामले की प्रकृति में कोई बदलाव नहीं आएगा और ट्रायल कोर्ट द्वारा पेश किए जाने वाले साक्ष्य के आधार पर इसकी प्रासंगिकता की जांच की जा सकती है।

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