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मदर्स डे: नक्सली हमले में पति खोने के बाद नीला यालम ने अकेले लड़ी जंग, चार बेटियों को पढ़ाकर बनाया काबिल

Sun, 10 May 2026 11:06 AM IST
बीजापुर ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, बीजापुर
अमर उजाला नेटवर्क, बीजापुर Published by: बीजापुर ब्यूरो Updated Sun, 10 May 2026 11:06 AM IST
सार

12 अप्रैल 2014 का वह दर्दनाक दिन आज भी नीला यालम के परिवार की आंखों में ताजा है। लोकसभा चुनाव ड्यूटी से लौट रहे मतदान कर्मियों के वाहन को नक्सलियों ने केतुलनार के पास विस्फोट कर उड़ा दिया था। इस हमले में शिक्षक रामचंद्रम यालम की मौत हो गई।

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shadat ke baad tuta ghar, lekin nhin tuti maa … chaar betiyo ke liye khud ban gai pita ki parchai
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विस्तार

मां सिर्फ जन्म देने वाली नहीं होती, वह हर मुश्किल में अपने बच्चों की सबसे मजबूत ढाल भी बन जाती है। जब जिंदगी सबसे बड़ा दुख देती है तब भी मां अपने आंसू छिपाकर बच्चों के भविष्य को संवारने में जुट जाती है। मदर्स डे पर ऐसी ही एक मां की कहानी सामने आई है, जिसने पति की मौत के बाद टूटने के बजाय खुद को संभाला और चार बेटियों के लिए मां ही नहीं, पिता बनकर भी जीवन जिया। यह कहानी है भोपालपटनम की नीला यालम की, जिनका संघर्ष आज पूरे इलाके में मिसाल बन चुका है।

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12 अप्रैल 2014 का वह दर्दनाक दिन आज भी नीला यालम के परिवार की आंखों में ताजा है। लोकसभा चुनाव ड्यूटी से लौट रहे मतदान कर्मियों के वाहन को नक्सलियों ने केतुलनार के पास विस्फोट कर उड़ा दिया था। इस हमले में शिक्षक रामचंद्रम यालम की मौत हो गई। एक पल में परिवार की खुशियां बिखर गईं और नीला यालम की जिंदगी पूरी तरह बदल गई।
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पति की मौत के बाद उनके सामने चार छोटी-छोटी बेटियों की जिम्मेदारी आ खड़ी हुई। सबसे बड़ी बेटी वंशिका उस समय करीब 12 साल की थी, जबकि सबसे छोटी फलक महज डेढ़ साल की थी। पिता को खो चुकी मासूम बेटियों की आंखों में दर्द साफ दिखाई देता था, लेकिन मां ने अपने दुख को कभी बच्चों के सामने हावी नहीं होने दिया।
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नीला यालम के सामने सिर्फ भावनात्मक संकट नहीं था, बल्कि आर्थिक और सामाजिक चुनौतियां भी कम नहीं थीं। परिवार में सहारा देने वाला कोई नहीं था। सास-ससुर भी नहीं थे और रहने के लिए पक्का घर तक नहीं बना था। चार बेटियों की पढ़ाई, उनका पालन-पोषण और घर की जिम्मेदारी… हर मोर्चे पर नीला अकेली थीं। लेकिन उन्होंने हालात के आगे घुटने टेकने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना।

1992 में रामचंद्रम यालम और नीला यालम का विवाह हुआ था। दोनों ने अपने परिवार और बच्चों को लेकर कई सपने देखे थे, लेकिन नक्सली हमले ने सबकुछ छीन लिया। पति के जाने के बाद नीला यालम ने खुद को कमजोर नहीं पड़ने दिया। उन्होंने बेटियों की पढ़ाई कभी रुकने नहीं दी और हर कठिन परिस्थिति में उनका हौसला बनकर खड़ी रहीं।

कई बार हालात इतने कठिन हुए कि जिंदगी बोझ लगने लगी, लेकिन बेटियों का भविष्य ही उनकी ताकत बन गया। उन्होंने मेहनत, धैर्य और साहस से अपने परिवार को टूटने नहीं दिया। बेटियों को अच्छे संस्कार और शिक्षा देकर आगे बढ़ाने का सपना लगातार पूरा करती रहीं।

आज उनकी मेहनत रंग ला रही है। बड़ी बेटी वंशिका यालम रायपुर में पढ़ाई कर लैब टेक्नीशियन बन चुकी हैं और वर्तमान में सुकमा जिले में अपनी सेवाएं दे रही हैं। यह सिर्फ एक बेटी की सफलता नहीं, बल्कि उस मां की जीत है जिसने संघर्षों के बीच अपने बच्चों के सपनों को जिंदा रखा।


गांव और मोहल्ले के लोग आज भी नीला यालम के संघर्ष को सम्मान के साथ याद करते हैं। लोग कहते हैं कि जिसने इतनी कठिन परिस्थितियों में चार बेटियों को संभालकर उन्हें काबिल बनाया, वह वास्तव में साहस और मातृत्व की जीवित मिसाल है।

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