कंकालीन गुड़ी जात्रा: छत्तीसगढ़ में नई फसल के लिए रोपे बीज; माता का आशीर्वाद ले कांटों के झूले पर बैठे पुजारी
6 वीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने दक्षिण भारत के भ्रमण के दौरान यहां के कंकालीन माता को काष्ठ का पंखा भेंट किया थ। माता गुड़ी में भेंट किए गए उस पंखे की आज भी पूजा की जाती है।
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छत्तीसगढ़ के बीजापुर में मंगलवार को नई फसल के लिए बीज रोपने के साथ कंकालीन माता गुड़ी जात्रा संपन्न हो गई। इस जात्रा के बाद नई फसल लगाने के लिए माता का आशीर्वाद लिया गया। पुजारियों ने अनुष्ठान के बाद माता का श्रृंगार किया। जिसके बाद पूजा-अर्चना कर देव खेलनी शुरू की गई। इस दौरान कांटों वाले झूले में माता की आज्ञा से सिरहा और पुजारियों को झुलाया गया। पुजारियों ने बताया कि बीज पंडूम के बाद बुधवार को भूमि पंडूम का अनुष्ठान किया गया है।
कांटों से भरा नया लगाया गया झूला
माता गुड़ी के पुजारी आदिनारायण ने बताया कि लंबे अरसे के बाद यहां नया झूला स्थापित किया गया है। उन्होंने बताया कि उनकी तीन पीढ़ी पहले स्थापित झूला काफी पुराना हो गया था। नए झूले स्थापित करने के लिए एक पखवाड़े से तैयारियां चल रही थी। यहां के कार्य के लिए तय लोहार द्वारा ही इसके लिए औजार तैयार किए गए थे। पूरे विधि-विधान और अनुष्ठानों के साथ आज इसे स्थापित कर दिया गया। इसके बाद तय रस्म के अनुसार, माता का आशीर्वाद लेकर पुजारी और सिरहा को झुलाया गया।
चीनी यात्री ने माता को भेंट किया था काष्ठ का पंखा
6 वीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने दक्षिण भारत के भ्रमण के दौरान यहां के कंकालीन माता को काष्ठ का पंखा भेंट किया थ। माता गुड़ी में भेंट किए गए उस पंखे की आज भी पूजा की जाती है। ग्रामीणों के मुताबिक, कई पीढ़ियों से यहां कथा प्रचलित है कि विदेश से कोई यात्री बीजापुर पहुंचा था। उसके हाथों में चिड़या और उसके पास छाता भी था। जिसने यहां अपने पंखे को भेंट किया था। पंखे पर चीनी भाषा में खुदे हुए अक्षर आज भी पढ़े जा सकते हैं। यहां के तत्कालीन कारीगरों ने चीनी यात्री की प्रतिमा भी बनाई थी।
पुरातत्व विभाग कर रहा अनदेखी
यहां बिखरी पाषाण प्रतिमाएं समृद्धशाली और गौरवपूर्ण इतिहास को खुद बयान करती हैं, पर पुरातत्व विभाग इसकी अनदेखी करता है। लोगों का कहना है कि विभाग ने इसकी कोई सुध नहीं ली है। यहां रखी प्राचीन प्रतिमाओं को भूमि स्वामी द्वारा जमीन बेचने के दौरान जगदलपुर संग्रहालय भिजवाया गया था। उस समय ग्रामीणों के पुरजोर विरोध के चलते उसे वापस तो जरूर कर दिया गया, पर इन प्रतिमाओं के सही काल खंड की जानकारी जुटाना पुरातत्व विभाग ने जरूरी नहीं समझा।