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Hindi News ›   Chhattisgarh ›   Bijapur News ›   Faith returns as armed guard is lifted; Bathukamma celebrated with fervor at temple after 25 years.

सीजी: बंदूक का पहरा हटा तो लौटी आस्था, 25 साल बाद सैंड्रा के मंदिर में बतकम्मा की धूम

Mon, 12 Oct 2026 07:28 PM IST
बीजापुर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बीजापुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बीजापुर Published by: बीजापुर ब्यूरो Updated Mon, 12 Oct 2026 07:28 PM IST
सार

छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के सैंड्रा गांव में करीब 25 साल बाद शिव मंदिर परिसर में बतकम्मा उत्सव मनाया गया। नक्सली फरमान के कारण बंद हुई परंपरा की वापसी पर महिलाओं ने गीत गाए, नृत्य किया और मंदिर परिसर में शेड बनाने की मांग उठाई।

 

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Faith returns as armed guard is lifted; Bathukamma celebrated with fervor at  temple after 25 years.
बतकम्मा की तैयारी करते महिला समिति के सदस्य - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कभी बंदूक के साये में ग्रामीणों को अपनी परंपराएं निभाने के लिए भी जगह बदलनी पड़ती थी। मंदिर के आंगन में पूजा-पाठ और उत्सव मनाने पर पाबंदी थी। नवरात्र के दौरान देवी की उपासना करने वाली महिलाओं को गांव के प्रमुख देवस्थल से दूर जाकर बतकम्मा का आयोजन करना पड़ता था। अब तस्वीर बदल रही है। इंद्रावती नेशनल पार्क के घने जंगलों के बीच बसे सैंड्रा गांव में करीब 25 साल बाद शिव मंदिर के परिसर में बतकम्मा उत्सव मनाया गया। मंदिर परिसर की सफाई की गई, जमीन को गोबर से लीपा गया और रंगोली सजाई गई। शनिवार रात महिलाओं ने सामूहिक नृत्य किया और देवी उपासना के गीत गाए।

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यह केवल एक धार्मिक आयोजन की वापसी नहीं, बल्कि उन ग्रामीणों के लिए भावनात्मक क्षण भी है, जिन्होंने लंबे समय तक भय के कारण अपनी परंपराओं को गांव के मंदिर में खुलकर नहीं निभाया। नक्सली गतिविधियों के कमजोर पड़ने और सुरक्षा का माहौल बदलने के बीच सैंड्रा की यह तस्वीर बताती है कि बदलाव का असर अब ग्रामीणों के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में भी दिखाई देने लगा है।

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मंदिर के आंगन में लौटी रौनक, महिलाओं ने गाए देवी उपासना के गीत
सैंड्रा में बतकम्मा उत्सव की तैयारियां दिन में ही शुरू हो गई थीं। करीब ढाई दशक बाद मंदिर परिसर में ग्रामीण एकजुट होकर साफ-सफाई में जुटे। परिसर को संवारा गया, जमीन की गोबर से लिपाई की गई और महिलाओं ने आकर्षक रंगोली बनाई। इसके बाद मिट्टी से शंक्वाकार आकृति तैयार कर पारंपरिक विधि-विधान से देवी की स्तुति की गई।

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रात होते-होते मंदिर परिसर में महिलाओं की भीड़ जुटने लगी। देवी उपासना के गीत गूंजे और पारंपरिक नृत्य शुरू हुआ। उत्सव में शामिल महिलाओं के चेहरों पर खुशी के साथ भावुकता भी नजर आई। उनके लिए यह वर्षों से इंतजार किए जा रहे अवसर की वापसी थी। जिस मंदिर परिसर में उत्सव मनाने से उन्हें रोका जाता था, उसी जगह पर इस बार वे बिना पुराने भय के अपनी परंपराओं का निर्वहन कर रही थीं।


नक्सली फरमान के बाद दूसरी जगह करना पड़ता था आयोजन
ग्रामीण महिलाओं के मुताबिक, नक्सलियों के फरमान के बाद मंदिर परिसर में बतकम्मा और गौरी पूजा का आयोजन बंद हो गया था। परंपरा को पूरी तरह छोड़ने के बजाय महिलाएं गांव में दूसरी जगह जुटकर उत्सव मनाती थीं। मंदिर के आंगन से दूर आयोजन करना उनके लिए पीड़ादायक था।

ग्रामीण महिला संगीता कश्यप बताती हैं कि नवरात्र के दौरान बतकम्मा का पारंपरिक नृत्य करीब 25 साल तक मंदिर परिसर में नहीं हो सका। महिलाओं को दूसरी जगह जाकर आयोजन करना पड़ता था। अब मंदिर के आंगन में ही एकत्रित होकर नृत्य करने से गांव की महिलाओं में काफी खुशी है।

युवती प्रगति तलांडी के लिए यह अनुभव नया है। उनका कहना है कि उन्होंने पहली बार मंदिर परिसर में इस तरह बतकम्मा का आयोजन होते देखा है। दिनभर गांव की महिलाओं ने मिलकर परिसर की सफाई की और रंगोली सजाई। वहीं, पुष्पा वासम बताती हैं कि गांव के सभी लोग मिलकर इस उत्सव में शामिल होते हैं। कई साल बाद मंदिर परिसर में आयोजन होने से इस बार सभी इसे विशेष उत्साह के साथ मना रहे हैं।

1970 में शिक्षक ने स्थापित कराया था शिव मंदिर
सैंड्रा के बुजुर्ग और पूर्व सरपंच रामलाल बताते हैं कि वर्ष 1970 के आसपास गांव में पदस्थ रहे स्वर्गीय रामचंद्र लिखतकर ने मंदिर की स्थापना कराई थी। ग्रामीणों के अनुसार, शिव और हनुमान की मूर्तियां बाहर से लाकर मंदिर में स्थापित की गई थीं। उस दौर में मंदिर में पूजा-पाठ के साथ रामायण पाठ भी होता था। बाद में नक्सली गतिविधियां बढ़ने के साथ मंदिर में धार्मिक आयोजन बंद हो गए।

रामलाल के मुताबिक, लंबे समय बाद मंदिर में पूजा-पाठ और नवरात्र के दौरान बतकम्मा उत्सव की शुरुआत होने से ग्रामीणों में खुशी है। गांव के लोगों के लिए यह अपनी पुरानी परंपराओं से दोबारा जुड़ने का अवसर है।

1200 की आबादी, सात पारा में बसा है सैंड्रा
इंद्रावती नेशनल पार्क क्षेत्र की ग्राम पंचायत सैंड्रा में करीब 1200 लोग रहते हैं। गांव सात पारा में बसा है। इनमें तालाब पारा, सरपंच पारा, इमली पारा, मंदिर पारा, नाका पारा, संजय पारा और बोरगुड़ा शामिल हैं। यहां गोंड, मुरिया, मरार और कुंबी समुदाय के लोग रहते हैं। गांव का सामाजिक जीवन पारंपरिक मान्यताओं और सामूहिक आयोजनों से जुड़ा रहा है।

गांव के मंदिर पारा में स्थित शिव मंदिर ग्रामीणों की धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र रहा है। करीब 25 साल बाद यहां पूजा-पाठ और बतकम्मा उत्सव की वापसी को ग्रामीण केवल एक आयोजन के रूप में नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान से दोबारा जुड़ने के अवसर के तौर पर देख रहे हैं।



मंदिर परिसर में शेड बनाने की मांग
उत्सव के बीच ग्रामीणों ने मंदिर परिसर में सुविधाएं बढ़ाने की मांग भी उठाई है। उपसरपंच प्रवीण तलांडी का कहना है कि मंदिर परिसर में शेड बनाया जाना चाहिए, ताकि धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों के दौरान ग्रामीणों को सुविधा मिल सके।

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