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भानुप्रतापपुर उपचुनाव: नतीजों पर टिकी छत्तीसगढ़ की राजनीति, 2018 से कोई उपचुनाव नहीं हारी कांग्रेस

Thu, 08 Dec 2022 08:35 AM IST
रवि भोई Published by: मोहनीश श्रीवास्तव Updated Thu, 08 Dec 2022 08:35 AM IST
सार

भानुप्रतापपुर उपचुनाव में कांग्रेस और भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। सर्व आदिवासी समाज के लिए भी निर्णायक होगा। छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के लिए आरक्षित 29 सीटें हैं। इसके अलावा 10 से 12 सीटों में आदिवासी वोटर निर्णायक स्थिति में हैं। भानुप्रतापपुर सीट भी आदिवासी सुरक्षित सीट है। इसलिए माना जा रहा है कि भानुप्रतापपुर सीट का चुनाव परिणाम 2023 विधानसभा चुनाव का संकेत होगा।

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ब्रह्मानंद नेताम, सावित्री मंडावी और अकबर राम कोर्राम - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

भानुप्रतापपुर विधानसभा उपचुनाव का नतीजा 8 दिसंबर को आ जाएगा। इस उपचुनाव के परिणाम के आधार पर छत्तीसगढ़ में आगे की राजनीति की दिशा तय होगी और 2023 के विधानसभा चुनाव का आधार भी तय होगा। भूपेश बघेल के राज में 2018 के बाद कोई भी विधानसभा उपचुनाव कांग्रेस नहीं हारी है, इसलिए मानकर चला जा रहा है कि भानुप्रतापपुर विधानसभा उपचुनाव का नतीजा भी कांग्रेस के पक्ष में आएगा। भानुप्रतापपुर की जीत से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की टोपी पर एक कलगी और लग जाएगी। हार से वे ही निशाने पर भी आएंगे।

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आदिवासी उम्मीदवार कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी
भानुप्रतापपुर विधानसभा उपचुनाव का माहौल दूसरे उपचुनाव से कुछ अलग रहा। यहां मुकाबला त्रिकोणीय रहा। कांग्रेस और भाजपा के साथ सर्व आदिवासी समाज की आक्रामकता से मुकाबला कांटे का दिखा। भाजपा भानुप्रतापपुर विधानसभा उपचुनाव को सेमीफाइनल की तरह लड़ी, पर आदिवासी बहुल इलाके में भाजपा की जमीनी पकड़ बहुत मजबूत नहीं मानी जाती है। आदिवासी समाज को कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक माना जाता है, लेकिन सर्व आदिवासी समाज की मैदान में दमदार उपस्थिति ने कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी बजा दी। 
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सहानुभूति का लाभ लेने की कोशिश में कांग्रेस
सर्व आदिवासी समाज के लोगों का कांग्रेस के मंत्री और नेताओं का खुला विरोध इसका नमूना है। सर्व आदिवासी समाज की कमान कांग्रेस के नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम ही थामे रहे। सर्व आदिवासी समाज कांग्रेस और भाजपा का कितना वोट काटता है, उस पर चुनाव परिणाम टिका है। कांग्रेस ने यहां से स्व. मनोज मांडवी की पत्नी सावित्री मंडावी को उम्मीदवार बनाया है। स्व. मनोज मांडवी के आकस्मिक निधन से सहानुभूति का लाभ सावित्री मंडावी को कुछ हद तक मिल सकता है, लेकिन सर्व आदिवासी समाज ने जिस तरह कांग्रेस और भाजपा को वोट न देने की शपथ लोगों को दिलाई, उससे कांग्रेस के माथे पर बल ला दिया। 

आदिवासी आरक्षण कोटा कम होने से खफा
सर्व आदिवासी समाज राज्य में आदिवासियों के लिए आरक्षण का कोटा 32 से घटाकर 20 फीसदी करने से खफा है। भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने सर्व आदिवासी समाज के अस्त्र को नाकाम करने के लिए एक और दो दिसंबर को विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर आरक्षण संशोधन विधेयक पास तो करवा लिया, लेकिन विधेयक पर राज्यपाल अनुसुईया उइके के दस्तखत न होने से वह दांव नहीं चल पाया।

व्यक्तिगत लांछन का मुद्दा रहा हावी
भानुप्रतापपुर उपचुनाव में मुद्दों से ज्यादा व्यक्तिगत लांछन हावी रहा। पहले भाजपा ने कांग्रेस की छात्र इकाई के एक नेता के अनाचार के मामले में जेल जाने को मुद्दा बनाया, वहीं  पलटवार करते कांग्रेस ने भाजपा उम्मीदवार ब्रम्हानंद नेताम के खिलाफ झारखंड के एक थाने में दर्ज अनाचार के पुराने मामले को उछालने लगा। ब्रम्हानंद नेताम को गिरफ्तार करने के लिए झारखंड की पुलिस आई, पर कुछ नहीं हुआ। हाईकोर्ट के आदेश से मुद्दे की हवा निकल गई। ब्रम्हानंद नेताम का नामांकन रद्द करवाने की कांग्रेस की रणनीति भी फेल हो गई। 


सर्व आदिवासी समाज दोनों दलों के लिए खतरे की घंटी
सर्व आदिवासी समाज ने रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी अकबर राम कोर्राम को प्रत्याशी बनाया है। कोर्राम की जमीनी पकड़ खास नहीं है , लेकिन आरक्षण की कमी से नाराज आदिवासी समाज की फौज उनके साथ रही। यह वोटों में तब्दील हो जाने की स्थिति में दोनों राजनीतिक दलों के लिए  इस चुनाव में खतरे की घंटी होने के साथ 2023 के विधानसभा चुनाव के लिए शुभ संकेत नहीं है।

भाजपा के लिए विधानसभा का सेमीफाइनल
भाजपा ने भानुप्रतापपुर जीतकर कांग्रेस की सरकार के लिए 2023 की राह में कांटा बिछाने के लिए चुनावी मैनेजमेंट में माहिर कहे जाने वाले अपने नेता बृजमोहन अग्रवाल को यहां का जिम्मा सौंपा था। भानुप्रतापपुर उपचुनाव में भले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ज्यादा समय नहीं दिया , लेकिन प्रचार के आखिरी दिन रोड़ शो कर कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की।

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