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एपीएमसी कानून बदले बिना आधुनिक नहीं होगा बाजार, किसानों को नहीं मिलेगा फायदा
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Mon, 30 Apr 2018 11:19 AM IST
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नीति आयोग कृषि के मुद्दे पर किसान और उपभोक्ता के बीच कीमतों में अंतर से लेकर कृषकों की आय दोगुना करने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। कृषि मंत्रालय के साथ मिलकर आयोग किसानों को वैज्ञानिक, आधुनिक और तकनीकी सुविधाएं मुहैया कराने के साथ एमएसपी के तीन फार्मूलों पर मंथन कर रहा है। कृषि क्षेत्र की गतिविधियों और भविष्य में उठाए जाने वाले कदमों समेत अन्य मुद्दों पर पीयूष पांडेय की आयोग के सदस्य रमेश चंद से बातचीत हुई। पेश है बातचीत के मुख्य अंश :
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प्रश्न : केंद्र सरकार की कृषि संबंधी सिफारिशों पर राज्य सरकारें ढुलमुल रवैया अपना रही हैं। क्या केंद्र अपनी सिफारिशों को लागू कराने के लिए कोई कदम उठाएगा?
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उत्तर - राज्यों में समस्या सिर्फ नियम, तंत्र या कानून में बदलाव के मसले पर सामने आती है। इसमें राज्यों की ओर से लगातार ढुलमुल रवैया अपनाया जा रहा है। जैसे एपीएमसी कानून। जब तक उसमें बदलाव नहीं करते, तब तक भूल जाइए कि बाजार आधुनिक होगा।
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राज्य कर भी रहे हैं तो आंशिक रूप से। केंद्र की तर्ज पर ना करके अपने मुताबिक ढाल के कर रहे हैं। किसान संघों को इस पर राज्यों से मांग करनी चाहिए और दबाव बनाना चाहिए। सभी राज्यों के मंत्रियों से बातें हुई। सभी ने हामी भरी। लेकिन अभी भी वो कुछ ना कुछ आंशिक रूप से ही कर रहे हैं। राज्यों को संघीय ढांचे में सभी मुद्दे केंद्र पर नहीं डालने चाहिए। यह एक खतरनाक प्रवृत्ति है।
प्रश्न - राज्यों के खिलाफ केंद्र कोई सख्त रवैया क्यों नहीं अपनाता?
उत्तर - कुछ सुझाव मेरी ओर से कृषि मंत्रालय को दिए गए थे, जैसे केंद्र की योजना राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई)। इसमें काफी संसाधन होते हैं। मैंने कहा कि इसको केंद्र की सिफारिशों को लागू कराने के साथ लिंक करिए। लागू करने के लिए वक्त का निर्धारण करिए, अन्यथा केंद्रीय योजना में कमी आएगी।
यह कोई सजा देने वाली बात नहीं, बल्कि प्रेरित करने का मुद्दा है। यह एक तरीका है, लेकिन केंद्र को ये रहता है कि राज्य इसको मुद्दा नहीं बनाएं। हालांकि इसका मकसद डंडा चलाना नहीं है, क्योंकि संघीय ढांचे में ऐसा संभव नहीं। दूसरा यह भी है कि राज्यों के पास अभी संसाधनों की कमी है।
प्रश्न - किसानों और उपभोक्ताओं के बीच कीमत के भारी अंतरों को किस तरह से दूर किया जा सकता है?
उत्तर - लंबे समय से इस पर चर्चा चल रही है पर हकीकत में आज भी किसान आलू बेचता है चार रुपये किलो और उपभोक्ता खरीदता है 20 रुपये प्रति किलो। इसमें दो मॉडल पर काम चल रहा है। एक तरीका यह है कि हम नियमन में बड़े पैमाने पर बदलाव करें और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दें। केंद्र की एपीएमसी समेत अन्य कानूनी प्रावधानों की सिफारिशों को लागू करें और आधुनिक ई-प्लेटफार्म को आगे लाएं। इसके लिए राज्यों को आगे आकर बड़ी होती जा रही परेशानी को खत्म करना चाहिए।
किसानों की आय 2022 तक दोगुना करने के मकसद में हम कहां तक पहुंचे हैं?
उत्तर - किसानों की आय दोगुना करने की नीति के तहत पहला लक्ष्य उत्पादन में साढ़े चार फीसदी की वृद्धि का रखा गया है। 2016-17 में उत्पाद वृद्धि दर 6 फीसदी रही और 2017-18 में वृद्धि दर 3 फीसदी आने का अनुमान है। ऐसे में आय को दोगुना करने का लक्ष्य सही दिशा में है। दूसरा यह कि हम कीमतों से किस तरह से आय बढ़ा सकते हैं, तो मेरी गणना यह थी कि 17 फीसदी वृद्धि कीमत में होनी चाहिए। अगर हम नए फार्मूले पर एमएसपी को सुनिश्चित करें, तो हमारी दिशा मंजिल तक पहुंचेगी।
प्रश्न - किसानों की आय बढ़ाने वाले तीन फार्मूले निकल कर सामने आए। इनमें से कौन-सा बेहतर है? किसके लागू होने की उम्मीद है?
उत्तर - अभी किसी भी फार्मूले को सबसे बेहतर कहना उचित नहीं होगा। हरेक के गुण-दोष हैं, जिन्हें हम परख रहे हैं। बाजार आश्वासन योजना (एमएएस) है, जिसमें पहले राज्य सरकारें मूल्य समर्थन योजना (पीएसएस) के तहत अनाज खरीद रही हैं। यह एक सफल प्रयोग है, जिसे भारतीय खाद्य निगम ने बेहतर तरीके से किया है। इसका फायदा यह है कि यदि किसी अनाज के दाम कम हैं और सरकार खरीद करती है तो दाम बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे में सरकारी खरीद बाजार में भाव को बेहतर करने के उद्देश्य से भी की जा सकती है।
प्रश्न - भावांतर के जरिये किसानों को राहत देने पर आयोग का क्या कहना है? क्या किसी आशंका की वजह से इसे लागू करने पर निर्णय अब तक नहीं हुआ?
उत्तर - मध्य प्रदेश की योजना भावांतर पर विचार चल रहा है, जिसमें एमएसपी और मंडी के मूल्य में फर्क होने पर सरकार को भरपाई करनी होती है। इसमें फायदा यह है कि सरकारी खरीद का खर्च नहीं होगा। महज एक-दो फीसदी का खर्च रिकॉर्ड संभालने में आएगा। ऐसे में सीधे 10 से 13 फीसदी तक खर्च की बचत सरकार को होगी। इससे बाजार का भाव प्रभावित नहीं होता। सिर्फ एमएसपी और बाजार भाव के औसत अंतर को दर्ज करना रहता है।
हालांकि इसमें कमी यह है कि बाजार का भाव ज्यादा चढ़ने पर ज्यादा खर्च सरकार को उठाना पड़ सकता है। कुछ लोगों को इसमें आशंका है कि व्यापारी-किसान मिल जाएंगे। लेकिन मेरा मानना यह है कि ऐसा बड़े पैमाने पर संभव नहीं है। यह साधारण है। इसे आसानी से लागू किया जा सकता है और यह बाजार को भी प्रभावित नहीं करता। साथ ही सरकारी खरीद की व्यवस्था में लगने वाले खर्च भी बचेंगे। मान लीजिए अगर किसी राज्य के पास अपनी व्यवस्था नहीं तो इसे निजी क्षेत्र की सहायता से भी लागू कराया जा सकता है।
प्रश्न - कृषि को तकनीक मुहैया कराने में हम काफी पीछे हैं। आपका क्या कहना है?
उत्तर - हमारे देश में किसानों को तकनीक मुहैया कराने की नीति बहुत ही खराब रही है। जैसे देशी ट्रैक्टर उद्योग ने छोटे ट्रैक्टरों का आयात नहीं होने दिया। हमारे यहां जो मशीनरी थी, वो छोटे किसानों के लिए उपयुक्त नहीं थी। अभी हमने छोटे पावर टिलर, पोर्टेबल पंप समेत अन्य को मंजूर किया है। अब हम छोटी मशीनरी मुहैया कराने पर जोर दे रहे हैं। इसके अलावा हम कस्टम हायरिंग सेंटर को प्रोत्साहन देने पर विचार कर रहे हैं। इससे आगे कृषि में मशीनरी को बढ़ावा मिलेगा।
प्रश्न - किसानों की आय बढ़ाने वाले तीन फार्मूले निकल कर सामने आए। इनमें से कौन-सा बेहतर है? किसके लागू होने की उम्मीद है?
उत्तर - अभी किसी भी फार्मूले को सबसे बेहतर कहना उचित नहीं होगा। हरेक के गुण-दोष हैं, जिन्हें हम परख रहे हैं। बाजार आश्वासन योजना (एमएएस) है, जिसमें पहले राज्य सरकारें मूल्य समर्थन योजना (पीएसएस) के तहत अनाज खरीद रही हैं। यह एक सफल प्रयोग है, जिसे भारतीय खाद्य निगम ने बेहतर तरीके से किया है। इसका फायदा यह है कि यदि किसी अनाज के दाम कम हैं और सरकार खरीद करती है तो दाम बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे में सरकारी खरीद बाजार में भाव को बेहतर करने के उद्देश्य से भी की जा सकती है।
प्रश्न - भावांतर के जरिये किसानों को राहत देने पर आयोग का क्या कहना है? क्या किसी आशंका की वजह से इसे लागू करने पर निर्णय अब तक नहीं हुआ?
उत्तर - मध्य प्रदेश की योजना भावांतर पर विचार चल रहा है, जिसमें एमएसपी और मंडी के मूल्य में फर्क होने पर सरकार को भरपाई करनी होती है। इसमें फायदा यह है कि सरकारी खरीद का खर्च नहीं होगा। महज एक-दो फीसदी का खर्च रिकॉर्ड संभालने में आएगा। ऐसे में सीधे 10 से 13 फीसदी तक खर्च की बचत सरकार को होगी। इससे बाजार का भाव प्रभावित नहीं होता। सिर्फ एमएसपी और बाजार भाव के औसत अंतर को दर्ज करना रहता है।
हालांकि इसमें कमी यह है कि बाजार का भाव ज्यादा चढ़ने पर ज्यादा खर्च सरकार को उठाना पड़ सकता है। कुछ लोगों को इसमें आशंका है कि व्यापारी-किसान मिल जाएंगे। लेकिन मेरा मानना यह है कि ऐसा बड़े पैमाने पर संभव नहीं है। यह साधारण है। इसे आसानी से लागू किया जा सकता है और यह बाजार को भी प्रभावित नहीं करता। साथ ही सरकारी खरीद की व्यवस्था में लगने वाले खर्च भी बचेंगे। मान लीजिए अगर किसी राज्य के पास अपनी व्यवस्था नहीं तो इसे निजी क्षेत्र की सहायता से भी लागू कराया जा सकता है।
प्रश्न - कृषि को तकनीक मुहैया कराने में हम काफी पीछे हैं। आपका क्या कहना है?
उत्तर - हमारे देश में किसानों को तकनीक मुहैया कराने की नीति बहुत ही खराब रही है। जैसे देशी ट्रैक्टर उद्योग ने छोटे ट्रैक्टरों का आयात नहीं होने दिया। हमारे यहां जो मशीनरी थी, वो छोटे किसानों के लिए उपयुक्त नहीं थी। अभी हमने छोटे पावर टिलर, पोर्टेबल पंप समेत अन्य को मंजूर किया है। अब हम छोटी मशीनरी मुहैया कराने पर जोर दे रहे हैं। इसके अलावा हम कस्टम हायरिंग सेंटर को प्रोत्साहन देने पर विचार कर रहे हैं। इससे आगे कृषि में मशीनरी को बढ़ावा मिलेगा।