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इस छोटे प्रयास से बदली छह हजार आदिवासियों की जिंदगी, 29 चैक डैम से आई खुशहाली
Sat, 29 Sep 2018 10:15 AM IST
Riya Kumari
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला
Published by: Riya Kumari
Updated Sat, 29 Sep 2018 10:15 AM IST
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आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सरकार सहित कई एनजीओ भी प्रयासरत हैं। लेकिन कई इलाके आज भी ऐसे हैं जहां जल की कमी से लोग पलायन कर जाते हैं। मध्य प्रदेश का आदिवासी बहुल जिला झाबुआ का थांदला विकासखंड भी कई सालों से ऐसा ही दंश झेल रहा था।
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एक समय यहां पर दिन ढलने के बाद कोई भी आने से डरता था। लेकिन अब स्थितियां काफी बदल रही हैं। पिछले दो सालों में इस विकास खंड के करीब छह हजार आदिवासी किसानों की जिंदगी में काफी बदलाव देखने को मिला है।
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29 चैकडैम ने बदली तस्वीर
पिछले दो सालों में आनंदना, कोका कोला इंडिया फाउंडेशन के सहयोग से एनएम सद्गुरु वाटर एवं डेवलपमंट फाउंडेशन ने सुकेन नदी पर 29 चैकडैम का निर्माण किया। इनमें से छह बांध पहले से मौजूद थे, जिनका पुरुद्धार किया है। एकीकृत वाटर शेड कार्यक्रम के तहत बनाई गई संरचनाओं से पानी की उपलब्धता बढ़ी है, भूजल स्तर में सुधार आया है और स्थानीय परिस्थितिकीय तंत्र मजबूत हुआ है।
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किसानों की आय हुई दोगुनी
छोटी बिहार गांव के किसान मंगला ने कहा कि क्षेत्र के किसानों की आय चैकडैम बनने के बाद से दोगुनी हो गई है। पूरे साल पानी मिलने से किसान हर साल दो फसल करते हैं। गांव में बिजली की समस्या नहीं है, लेकिन खेती के लिए बिजली नहीं मिलती है। खेतों में बिजली का पोल न होने की वजह से सिंचाई के लिए डीजल पंपों का आसरा है।
यहां सोयाबीन के अलावा मूंगफली, गेहूं और मकई की खेती भी होने लगी है।अब पानी की कमी नहीं होती। मंगला ने आगे बताया कि फसल की पैदावार अच्छी होने से उन्होंने इस साल मोटरसाइकिल खरीद ली और गांव से जिले में आने-जाने के लिए उसी का प्रयोग करते हैं। किसानों की स्थिति में सुधार होने से अब घरों में टीवी और पंखे भी लगे हैं।
कोका कोला इंडिया के लोक मामलों, संचार और स्थायित्व (पब्लिक अफेयर, कम्युनिकेशन और सस्टेनिबिलिटी) के वाइस प्रेसीडेंट इश्तियाक अमजद ने कहा, 'झाबुआ के थांदला विकास खंड में एनएम सदगुरु वाटर एवं डेवलपमंट फाउंडेशन के साथ मिलकर कुल 29 चेकडैम बनाए हैं। इन चैकडैम को बनाने में 4 करोड़ रुपये का खर्च आया है। लेकिन इससे छह हजार आदिवासियों को बहुत लाभ मिला है।
महिलाओं, बच्चों की जिंदगी भी बदली
खेती होने के कारण महिलाओं और बच्चों की जिंदगी में भी सुधार देखने को मिला है। बच्चे स्कूल में पढ़ने लगे हैं और महिलाएं घर पर ध्यान देती हैं। चैकडैम बनने से पहले ऐसा नहीं था। पहले आदिवासी पानी की कमी के कारण पड़ोसी राज्यों जैसे गुजरात और राजस्थान में पलायन कर जाते थे। इससे साल के आठ महीने वो घर से बाहर रहते थे, जिससे उनकी जिंदगी में काफी परेशानियां थीं।
एनएम सदगुरु वाटर एवं डेवलपमेंट फाउंडेशन की उप संचालक (डिप्टी डायरेक्टर) सुनीता चैहान बताती हैं कि झाबुआ के थांदला विकासखंड में पानी की समस्या थी, बारिश का पानी नदी और नालों से बह जाया करता था, अब उसे चेकडैमों ने रोक दिया है, इस पानी की उपलब्धता जून-जुलाई तक रहेगी, इससे एक तरफ किसानों को जहां सिंचाई को पानी मिलने लगा है, वहीं महिलाओं को भी अब ज्यादा परेशान नहीं होना पड़ता। बच्चों से लेकर महिलाएं तक आत्मविश्वास से भरी नजर आती हैं।
सरकारों को भी लेनी चाहिए सीख
कायदे से देखा जाए तो यह काम राज्य सरकारों का है कि वो अपने प्रदेश के लोगों की जीवन स्थिति में सुधार करे। लेकिन अफसरशाही और नेताओं के उदासीन रहने से ऐसा होना मुश्किल लगता है। आदिवासियों का एक दर्द यह भी है कि पिछले 50 सालों में उनकी इस समस्या का निराकरण किसी भी सरकार ने नहीं किया। अगर सरकार भी ऐसे एनजीओ से सीख लें तो फिर 6 हजार नहीं बल्कि करोड़ों किसानों की तकदीर बदल सकती है, जो कि फिलहाल गरीबी और पिछड़ेपन में अपनी जिंदगी जी रहे हैं।