जीएसटी के तीन साल : करदाता बढ़े और बढ़ी जटिलताएं पर कर संग्रह नहीं बढ़ा
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एकल कर व्यवस्था के तौर पर बुधवार को जीएसटी लागू हुए तीन साल बीत गए। लेकिन यह अपने उद्देश्यों में पूरी तरह सफल नहीं हुआ। व्यापारी जहां इसकी जटिलता से परेशान हैं, तो सरकार को भी अपेक्षित कर संग्रह नहीं होने से निराशा है।
1 जुलाई, 2017 को 17 तरह के टैक्स को मिलाकर जीएसटी कानून लागू करते समय सरकार ने इसे दूसरी आजादी बताया था।
उम्मीद थी कि इससे टैक्स चोरी रुकेगी, करदाताओं की संख्या बढ़ेगी और महंगाई में गिरावट के साथ अर्थव्यवस्था में भी इजाफा होगा। सरकार ने उम्मीद भी जताई थी कि हर महीने 1.5 लाख करोड़ का जीएसटी संग्रह होगा, लेकिन अभी तक 1 लाख करोड़ के जीएसटी संग्रह में भी निरंतरता नहीं आ सकी है।
पहले उपभोक्ताओं को वैट 14.5 फीसदी, उत्पाद शुक्ल 12.5 फीसदी के साथ कुल 31 फीसदी तक टैक्स देना पड़ता था। साथ ही कई रिटर्न भी भरने पड़ते थे और कई विभागों की जांच प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था। अब इन सबसे तो छुटकारा मिल गया है।
सरल नहीं बन सकी प्रक्रिया
जीएसटी के जरिये सरकार कर संग्रह प्रक्रिया आसान बनाना चाहती थी लेकिन इसमें पांच दरों (0.25, 5, 12, 18, 28 फीसदी) ने वस्तु/सेवा के वर्गीकरण को जटिल बना दिया। मासिक, तिमाही और सालाना जैसे रिटर्न ने प्रक्रिया और पेचीदा कर दिया।
व्यापारियों का कहना है कि जीएसटी परिषद की अब तक हुई 40 बैठकों में सैकड़ों संशोधन के बावजूद जटिलता बढ़ती जा रही है। इसके अलावा 2 फीसदी जीडीपी बढ़ने की उम्मीदों को भी झटका लगा है। 2019-20 में विकास दर 11 साल में सबसे कम रही। 2017-18 में यह 7.2 फीसदी थी, जो 2018-19 में 6.8 फीसदी और बीते साल 4.2 फीसदी रह गई।
टैक्स चोरी पर लगाम, नए करदाता जुड़े
जीएसटी के बाद देशभर में करोड़ों नए कारोबारियों ने पंजीकरण कराया और करदाताओं की संख्या में भी बड़ा इजाफा हुआ। हालांकि, कर संग्रह के मोर्चे पर यह बढ़त सिर्फ आंकड़ों में सीमित रह गई। लेकिन टैक्स चोरी जैसी गतिविधियों पर लगाम लगी है। कारोबारी अब टैक्स रिटर्न डिजिटल तरीके से भरते हैं और ग्राहकों को दिए गए बिल में जीएसटी का विवरण देना होता है। इससे पारदर्शिता बढ़ी और टैक्स चोरी कम हुई।