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भारत की आर्थिक रफ्तार: जीडीपी ग्रोथ की मजबूती के बीच क्या बढ़ रहे हैं जोखिम? जानिए रिपोर्ट में क्या सामने आया

Mon, 05 Jan 2026 04:13 PM IST
रिया दुबे बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: रिया दुबे Updated Mon, 05 Jan 2026 04:13 PM IST
सार

सिस्टमैटिक रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की जिस ‘गोल्डीलॉक्स’ अर्थव्यवस्था को संतुलित और मजबूत माना जा रहा था, उसमें अब दबाव के संकेत दिखने लगे हैं। कमजोर कर संग्रह और सिमटते राजकोषीय दायरे के चलते सरकार नीतिगत जटिलता (पॉलिसी ग्रिडलॉक) की स्थिति में फंसती दिख रही है। ऊपरी तौर पर मजबूत विकास दर अर्थव्यवस्था की अंदरूनी कमजोरी को छिपा रही है।

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The growing policy confusion behind the strong Indian economy, know what the report claims
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ANI

विस्तार

भारत की बहुचर्चित 'गोल्डीलॉक्स' अर्थव्यवस्था की कहानी में अब दबाव के संकेत दिखने लगे हैं। सिस्टमैटिक रिसर्च की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कमजोर कर प्रवाह और सिकुड़ते राजकोषीय दायरे  सरकार को नीतिगत जटिलता (पॉलिसी ग्रिडलॉक) की स्थिति में धकेल रहा है।

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गोल्डीलॉक्स उस स्थिति को कहते हैं जब अर्थव्यवस्था न ज्यादा गर्म होती है और न ज्यादा ठंडी यानी सब कुछ 'ठीक-ठाक' संतुलन में होता है। वहीं ग्रिडलॉक का मतलब है जाम, जहां सिस्टम फंसा हुआ हो। ग्रिडलॉक अर्थव्यवस्था में दिखावटी तौर पर सब ठीक लगता है, लेकिन अंदरूनी स्तर पर फैसले अटक जाते हैं और नीतियां प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पातीं।
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आर्थिक आंकड़े अर्थव्यवस्था की असर कमजोरी को छिपा रहे

रिपोर्ट में कहा गया है कि ऊपरी तौर पर मजबूत दिख रहे विकास आंकड़े अर्थव्यवस्था की असल कमजोरी को छिपा रहे हैं। इसमें कहा गया कि हेडलाइन ग्रोथ आंकड़े नाजुक आंतरिक गति को ढक देते हैं, जिससे सरकार एक मुश्किल नीतिगत दुविधा में फंस गई है।

टैक्स बढ़ोतरी ने खड़े किए सवाल

रिपोर्ट के अनुसार, इस दबाव का एक संकेत सिगरेट पर बेसिक एक्साइज ड्यूटी में हालिया बढ़ोतरी है, जिसे जीएसटी सुधारों के कुछ ही महीनों बाद लागू किया गया। इससे सालाना करीब 400 अरब रुपये अतिरिक्त राजस्व मिलने का अनुमान है। विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम बताता है कि सरकार के पास नए राजस्व स्रोत सीमित होते जा रहे हैं।

‘गोल्डीलॉक्स’ दौर में असामान्य मौद्रिक कदम

मौद्रिक मोर्चे पर भी स्थिति सामान्य नहीं दिखती। भारतीय रिजर्व बैंक ने बाजार को चौंकाते हुए 2 ट्रिलियन रुपये के सरकारी बॉन्ड की अतिरिक्त ओपन मार्केट ऑपरेशंस (OMO) और 10 अरब डॉलर के USD/INR खरीद-बिक्री ऑपरेशन की घोषणा की। यह कदम उस समय उठाया गया, जब कुछ हफ्ते पहले ही बड़ी OMO और स्वैप खरीद के संकेत दिए जा चुके थे।

रिपोर्ट के मुताबिक, ये कदम इसलिए असामान्य हैं क्योंकि इन्हें ऐसे दौर में लागू किया जा रहा है, जिसे आधिकारिक रूप से 8% वास्तविक जीडीपी ग्रोथ और लगभग शून्य महंगाई वाला 'गोल्डीलॉक्स फेज' बताया जा रहा है।

आपातकाल जैसे उपाय, लेकिन असर सीमित

इसके बावजूद नीति निर्माताओं ने आपातकालीन समर्थन जैसे कदम उठाए हैं

  • 150 आधार अंकों की कुल CRR कटौती
  • 125 आधार अंकों की रेपो रेट कटौती
  • करीब 8 ट्रिलियन रुपये की तरलता प्रवाह
  • जीएसटी कटौती के जरिए राजकोषीय प्रोत्साहन

हालांकि, बाजार संकेत देते हैं कि इन उपायों से वित्तीय हालात सहज नहीं हुए। 10 साल की सरकारी बॉन्ड यील्ड बढ़कर 6.6-6.65% के दायरे में पहुंच गई है। वहीं, रुपया डॉलर के मुकाबले 90 के पार कमजोर हुआ है और प्रणाली की तरलता फिर से घाटे में चली गई है।

निजी निवेश पर दबाव का खतरा

रिपोर्ट चेतावनी देती है कि आक्रामक फिस्कल विस्तार और भारी लिक्विडिटी सपोर्ट से निजी क्षेत्र के पूंजीगत निवेश (कैपेक्स) पर दबाव पड़ सकता है। सिमटते वित्तीय स्पेस और बढ़ते उधारी दबाव के बीच सरकार और केंद्रीय बैंक के हालिया कदम आने वाले समय में नीतिगत लचीलापन और सीमित कर सकते हैं। कुल मिलाकर, रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि मजबूत दिखती अर्थव्यवस्था के पीछे बढ़ती नीतिगत जटिलता भारत के लिए एक नई चुनौती बनती जा रही है।

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