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SC: शीर्ष अदालत ने दिवालियापन कानून के प्रावधानों को रखा बरकरार, अनिल अंबानी की अर्जी समेत 200 याचिकाएं खारिज

Thu, 09 Nov 2023 02:16 PM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कुमार विवेक Updated Thu, 09 Nov 2023 02:16 PM IST
सार

Supreme Court: प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने आईबीसी के विभिन्न प्रावधानों को चुनौती देने वाली 391 याचिकाओं पर फैसला सुनाया। इन याचिकाओं में संहिता की धारा 95 (1), 96 (1), 97 (5), 99 (1), 99 (2), 99 (4), 99 (5), 99 (6) और 100 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी।

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SC upholds validity of key provisions of Insolvency and Bankruptcy Code
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने समाधान पेशेवर (आरपी) की नियुक्ति, न्यायिक प्रक्रिया और अंतरिम मोरोटोरियम से जुड़े दिवालियापन और दिवालियापन संहिता (आईबीसी) 2016 के कुछ प्रमुख प्रावधानों की पुष्टि कर दी। शीर्ष अदालत ने माना कि ये प्रावधान किसी भी अवैधता से रहित हैं और आईबीसी के विधायी इरादे के अनुरूप हैं। विधायिका ने समाधान पेशेवर की भूमिका और कानून के तहत प्रक्रिया पर सावधानीपूर्वक विचार किया है।

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सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला व जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने प्राकृतिक न्याय और उचित प्रक्रिया के सिद्धांतों के कथित उल्लंघन के आधार पर आईबीसी प्रावधानों के एक समूह को चुनौती देने वाली 200 से अधिक याचिकाओं पर बृहस्पतिवार को फैसला सुनाया। इस मामले में अनिल अंबानी, वेणुगोपाल धूत, संजय सिंगल और किशोर बियानी समेत विभिन्न उद्योगपति और प्रमोटर्स याचिकाकर्ता थे।
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याचिकाओं को खारिज करते हुए पीठ ने कहा है कि अदालत के लिए यहां प्रवेश करना कानून को फिर से लिखने के समान होगा। जिसे अधिकार क्षेत्र के प्रश्न के रूप में वर्णित किया गया है, वह कानून का कोई साधारण मामला नहीं है कि याचिकाकर्ता के आग्रह के अनुसार तय किया जाए।
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इसे दी गई थी चुनौती
याचिकाओं में मुख्य रूप से उस कानून के संचालन को चुनौती दी गई थी जो ऋणदाताओं को व्यक्तिगत गारंटरों और प्रमोटरों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना उनके खिलाफ दिवालिया कार्यवाही शुरू करने की अनुमति देता है।


कानून में कोई स्पष्ट मनमानी नहीं
याचिकाओं को खारिज करते हुए शीर्ष अदालत ने माना कि कानून किसी भी स्पष्ट मनमानी से ग्रस्त नहीं है। न ही संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। अदालत ने कहा है कि कानून को पूर्वव्यापी तरीके से लागू नहीं माना जा सकता है। पीठ ने याचिकाकर्ता की इस दलील को खारिज कर दिया कि आईबीसी की धारा 97 के तहत आरपी की नियुक्ति से पहले किसी प्रकार की न्यायिक प्रक्रिया होनी चाहिए, ताकि कॉर्पोरेट देनदार को भी सुना जा सके। पीठ ने कहा कि इस तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

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