Report: रुपये में गिरावट का खतरा; हेजिंग घटने से भारतीय कंपनियों की रेटिंग पर पड़ेगा असर, फिच ने क्यों चेताया
फिच रेटिंग्स ने चेतावनी दी है कि अगर भारतीय कंपनियां अपने विदेशी मुद्रा कर्ज को सही तरह से हेज नहीं करतीं, तो रुपये के कमजोर पड़ने पर उनकी वित्तीय स्थिति प्रभावित हो सकती है और क्रेडिट रेटिंग भी नीचे जा सकती है। नवीकरण ऊर्जा, पावर यूटिलिटी और टोल रोड जैसे सेक्टर सबसे ज्यादा जोखिम में हैं क्योंकि इनकी आय रुपये में होती है और इनके पास प्राकृतिक हेज नहीं होता।
विस्तार
वैश्विक रेटिंग एजेंसी फिच रेटिंग्स ने बताया है कि अगर भारतीय कंपनियां अपनी विदेशी मुद्रा देनदारियों को ठीक से कवर नहीं करतीं, तो उनके लिए बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। इसमें कहा गया है कि उनकी क्रेडिट रेटिंग पर दबाव बढ़ सकता है विशेष रूप से उन क्षेत्रों में, जहां रुपये की कमजोरी का सीधा असर पड़ता है।
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यह क्षेत्र हैं अधिक संवेदनशील
फिच ने कहा कि नवीकरण ऊर्जा, पावर यूटिलिटी और टोल रोड जैसे क्षेत्रों में प्राकृतिक हेज कम होने के कारण कंपनियां रुपये में तेज गिरावट के प्रति अधिक संवेदनशील हैं। हालांकि इन क्षेत्रों में प्राकृतिक हेज यानी विदेशी मुद्रा में पर्याप्त कमाई नहीं होती, इसलिए जोखिम ज्यादा है।
फिच ने बताया कि हालांकि इन कंपनियों में से कई अपने विदेशी मुद्रा ऋण का बड़ा हिस्सा हेज करती हैं, लेकिन जहां हेजिंग केवल आंशिक है, वहां खतरा और बढ़ जाता है। अगर रुपया अगले 6 से 12 महीनों में 10% से ज्यादा कमजोर होता है, तो ऐसी कंपनियों की हेजिंग लागत बढ़ सकती है और उनकी कर्ज चुकाने की क्षमता पर असर पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में उनकी क्रेडिट रेटिंग में गिरावट की संभावना बन सकती है। एजेंसी का कहना है कि कंपनियों से उम्मीद की जाएगी कि वे बढ़ती लागत के बावजूद हेजिंग जारी रखें, लेकिन यदि उन्होंने यह जोखिम प्रबंधन कमजोर किया, तो उनके रेटिंग प्रोफाइल पर इसका नकारात्मक असर पड़ेगा।
हेजिंग एक वित्तीय सुरक्षा कवच है
जब किसी कंपनी का कर्ज, भुगतान या कोई लेन-देन विदेशी मुद्रा में हो, और उसे डर हो कि रुपये की कीमत गिर जाएगी, तो वह पहले से ही तय कर लेती है कि वह भविष्य में किस दर पर डॉलर खरीदेगी या बेचेगी, इसी सुरक्षा व्यवस्था को हेजिंग कहते हैं। हेजिंग एक वित्तीय सुरक्षा कवच है, जिसे कंपनियां या निवेशक संभावित नुकसान से बचने के लिए इस्तेमाल करते हैं, खासकर तब, जब विदेशी मुद्रा (जैसे डॉलर) के दाम बदलने से उनके खर्च या कर्ज पर असर पड़ सकता है।
फिच के अनुसार, भारतीय कॉरपोरेट जगत का बड़ा हिस्सा इस खतरे से अपेक्षाकृत सुरक्षित है, क्योंकि टेक्नोलॉजी, फार्मा, ऑटो और बिल्डिंग मटेरियल जैसे सेक्टरों की कई कंपनियां निर्यात या विदेशी कारोबार से डॉलर कमाती हैं। यह प्राकृतिक हेज उन्हें मुद्रा उतार-चढ़ाव से बचाने में मदद करता है।