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RBI: रेपो दर 2.5% बढ़ने से महंगाई 1.60% घटी; अधिकारियों का दावा- मुद्रास्फीति में नरमी से घरेलू खर्च को समर्थन

Mon, 21 Oct 2024 08:55 PM IST
बशु जैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: बशु जैन Updated Mon, 21 Oct 2024 08:55 PM IST
सार

भारतीय रिजर्व बैंक ने कहा कि भू राजनीतिक तनाव के बीच भारत के विकास को घरेलू इंजनों और निजी निवेश के समर्थन से बढ़ावा मिल रहा है। रिजर्व बैंक की ओर से जारी बुलेटिन में कहा गया कि 2024 की पहली छमाही में अर्थव्यवस्था लचीली रही। जबकि महंगाई में गिरावट से घरेलू खर्च बढ़ा।

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Robust domestic engines supporting India's growth outlook, says RBI Bulletin
rbi reserve bank of india - फोटो : istock

विस्तार

रेपो दर में मई, 2022 से 2.5 फीसदी की कुल बढ़ोतरी से महंगाई को 1.60 फीसदी तक कम करने में मदद मिली है। आरबीआई के डिप्टी गवर्नर देबब्रत पात्रा, इंद्रनील भट्टाचार्य, जॉइस जॉन और अवनीश कुमार ने सोमवार को एक लेख में यह दावा किया है। इसके मुताबिक, नीतिगत दर में वृद्धि ने महंगाई को स्थिर किया और कुल मांग को नियंत्रित किया।

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अल्पकालिक ब्याज दरों पर अधिक प्रभाव
इसमें आगे कहा गया है कि मौद्रिक नीति में बदलाव दीर्घकालिक दरों की तुलना में अल्पकालिक ब्याज दरों को अधिक प्रभावित करते हैं। लेख में कहा गया है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था 2024 की पहली छमाही में मजबूत रही। महंगाई में गिरावट से घरेलू खर्च को समर्थन मिला। मौद्रिक नीति में नरमी के बीच आर्थिक वृद्धि की स्थिर गति ज्यादातर अर्थव्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण विषय बन रही है। एजेंसी  
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खपत मांग बढ़ने से निजी निवेश में तेजी
आरबीआई के एक बुलेटिन में कहा गया है कि कारोबार को लेकर बढ़ती उम्मीद और त्योहारी सीजन में उपभोग मांग बढ़ने से निजी निवेश में उत्साहजनक संकेत दिखाई दे रहे हैं। कुल मिलाकर, देश की आर्थिक वृद्धि को घरेलू क्षेत्र से समर्थन मिल रहा है। 2024-25 की दूसरी तिमाही में जो अस्थायी नरमी दिखी है, देश में कुल मांग इससे पार पाने के लिए तैयार है। इसकी वजह त्योहारी मांग में तेजी है।
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क्रेडिट कार्ड से लेनदेन व खुदरा कर्ज में नरमी
आंकड़ों से पता चलता है कि क्रेडिट कार्ड लेनदेन की संख्या धीमी हुई है। इसका कारण वित्तीय संस्थान असुरक्षित कर्जों से जुड़े जोखिमों को देखते हुए सावधानी बरत रहे हैं। लेखकों के मुताबिक, छोटी राशि के कर्ज देने वाले सूक्ष्म वित्तीय क्षेत्र में शुरुआती दबाव उधारकर्ताओं की मांग के बजाय कर्ज देने के अभियान के कारण हुआ है। क्रेडिट ब्यूरो के आंकड़ों से संकेत मिलता है कि खुदरा कर्ज में वृद्धि की रफ्तार भी धीमी हुई है

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