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New Bill: 'बुलडोजर न्याय' के जमाने में पूरा कानून बदलने की कोशिश; शीघ्र न्याय देने का सपना कितना होगा पूरा
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कानून बदलाव की तैयारी।
- फोटो :
Amar Ujala
विस्तार
योगी आदित्यनाथ सरकार ने प्रदेश में अपराध पर लगाम लगाने के लिए अपराधियों के घरों को बुलडोजर से ढहाने की नीति अपनाई है। सरकार की इस नीति पर कई कारणों से सवाल किए गए और इसे न्याय की मूल भावना के 'विरुद्ध' बताया गया। लेकिन इसके बाद भी जनता के बीच न्याय के इस तरीके को खूब पसंद किया गया और जनता के बीच इसके लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जय जयकार भी हुई। कहा गया कि बढ़ते अपराध और थकाऊ न्यायिक प्रणाली से त्रस्त जनता ने न्याय के इस गलत तरीके को भी सही स्वीकार कर लिया। कहा गया कि यदि वर्तमान न्याय प्रणाली ने अपराध पर लगाम लगाने और लोगों को जल्द न्याय देने में सफल हुई होती तो इस प्रकार की फिल्मी न्याय प्रणाली को जनता के बीच कभी स्वीकृति नहीं मिलती।
बुलडोजर न्याय की 'लोकप्रियता' के इसी दौर में केंद्र सरकार ने देश की अपराध न्याय व्यवस्था को सिरे से बदलने की कोशिश शुरू कर दी है। नए कानून में पुलिस के लिए निश्चित समय सीमा के अंदर चार्जशीट दाखिल करने और न्यायाधीशों के लिए एक महीने के अंदर निर्णय देने को बाध्य बनाया गया है। केंद्र सरकार का दावा है कि इससे लोगों को जल्द न्याय देना संभव हो सकेगा। इससे लोगों का न्याय पर भरोसा बढ़ेगा और अपराध पर अंकुश लगाना संभव होगा। लेकिन क्या ऐसा हो पाएगा?
थॉमस मैकाले ने जब 1837 में देश के लिए इंडियन पीनल कोड बनाने की शुरुआत की, 1850 में इसकी ड्राफ्टिंग की गई और 1856 से 1860 के बीच इसे लागू किया गया, देश में 1857 की क्रांति हो चुकी थी। अंग्रेजों के सामने सत्ता बनाकर रखने के लिए भारतीयों को दबाकर रखने की कोशिश उनके लिए सबसे पहली आवश्यकता थी। वर्तमान कानून में पुलिस को असीमित अधिकार उसी संदर्भ में दिए गये थे। लेकिन एक स्वतंत्र देश के रूप में भारत के सामने अब चुनौतियां बदल चुकी हैं। अपराधों और अपराधी की प्रकृति बदल चुकी है। नए कानूनों से बदली परिस्थितियों में नए तरीकों से हो रहे अपराधों पर नियंत्रण रखते हुए सरकार के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती है। इसे देखते हुए कानूनी मामलों के विशेषज्ञ अपराध कानूनों में बदलाव को बिल्कुल सही मानते हैं।
पुलिस तंत्र में सुधार ज्यादा आवश्यक
सर्वोच्च न्यायालय के वकील अश्विनी उपाध्याय देश में नए कानून लाने के लिए लंबे समय से बहस करते रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर उन्होंने पूरे देश के लिए 'वन नेशन, वन लॉ' बनाने की भी मांग की थी। उन्होंने अमर उजाला से कहा कि लोगों को न्याय देने की सबसे पहली सीढ़ी पुलिस के पास से शुरू होती है। लेकिन पुलिस अधिकारी कानून के विशेषज्ञ नहीं होते। वे इतने उच्च शिक्षित भी नहीं होते कि कानून की दर्जनों पुस्तकें पढ़कर उसे समझ सकें। किसी आपराधिक घटना के समय आधुनिक तरीके से साक्ष्य एकत्र करने की उनकी ट्रेनिंग भी बहुत कमजोर होती है। इस कमी का लाभ अपराधी उठाते हैें और कई मामलों में वे अपराध करने के बाद भी बेदाग छूट जाते हैं। ऐसे में अपराध पर अंकुश लगाने के लिए पुलिस तंत्र में सुधार सबसे बड़ी आवश्यकता है।
गलत मुकदमा करने वालों पर कार्रवाई जरूरी
अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि दहेज कानून हों या अनुसूचित जाति-जनजातियों को उत्पीड़न से बचाने के लिए बने कानून, इनका सबसे ज्यादा दुरुपयोग होता है। कई बार स्वयं न्यायाधीश तक को इस बात का पता होता है कि यह पूरा मामला झूठा है, लेकिन न्याय प्रक्रिया पूरा होने तक लोगों को जेल में रहना पड़ जाता है। बाद में पूरा मुकदमा झूठा पाने के बाद भी आरोप लगाने वाला बेदाग छूट जाता है। ऐसे झूठे आरोप लगाने वाले लोगों पर कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही केस दाखिल करते समय उनसे यह लिखित हलफनामा लिया जाना चाहिए कि यदि मुकदमा झूठा पाया जाता है तो उन पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी, मुकदमों का बोझ कम कर सकता है।
ज्यादा कानून न हों
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में कानून कम होने का मामला नहीं है। यहां एक ही मामले पर कई बार कई अलग-अलग कानून बने मिल जाते हैं। इससे पुलिस और जांच एजेंसियों में भ्रम की स्थिति बनती है। अमेरिका में अमेरिकन फेडरल पीनल कोड में केवल 123 चैप्टर हैं। इन्हीं में सभी प्रकार के अपराध और उनके दंड परिभाषित हैं। इसे समझना और उनके अनुसार काम करना पुलिस, जांच एजेंसी, जज और आम जनता के लिए आसान होता है। जबकि कानूनों की बहुतायतता हमारे कानून विशेषज्ञों को उलझा कर रख देती है जिससे न्याय मिलने में देर होती है।
पुलिस को ज्यादा अधिकार क्यों
सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील माजिद मेमन ने अमर उजाला से कहा कि कानून निर्माण के समय सबसे बड़ा लक्ष्य यही रखा गया था कि इससे अपराध पर अंकुश लगाया जा सकेगा और लोगों को त्वरित न्याय दिया जा सकेगा। लेकिन आज की हालत देखकर कहा जा सकता है कि वर्तमान कानून अपना यह लक्ष्य हासिल करने में बुरी तरह असफल साबित हुआ है। इसलिए यदि नए कानूनों से यह लक्ष्य हासिल किया जा सके तो कानूनों में बदलाव का स्वागत किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि अभी कानून बनने की प्रक्रिया शुरू है, सेलेक्ट कमेटी के जरिए और बाद में संसद के जरिए इसमें संशोधन होना है, अभी कानून अंतिम रूप में हमारे सामने नहीं आया है। ऐसे में इस पर अंतिम टिप्पणी नहीं की जा सकती। लेकिन लोगों से विचार-विमर्श कर इसमें सही बदलाव किए जाने चाहिए। अब तक की जानकारी के अनुसार नए कानून में पुलिस को किसी अपराधी को गिरफ्तार करके हिरासत में रखने की अधिकतम समय सीमा 15 दिनों से बढ़ाकर 60 दिनों तक करने का सुझाव दिया गया है। इससे पुलिस इस अधिकार का गलत उपयोग कर सकती है।
अभिप्राय पर प्रश्न सही नहीं
एडवोकेट एमआर शमसाद ने कहा कि केंद्र सरकार ने राजद्रोह कानून समाप्त करने की बात कही है, लेकिन नए कानूनों में जिस तरह किसी के अभिप्राय पर भी लोगों को आजीवन कारावास तक की सजा दिए जाने की बात कही गई है, उसका दुरुपयोग हो सकता हैष जांच अधिकारी अपनी स्वेच्छा से किसी के अभिप्राय को सही और किसी के भी अभिप्राय को गलत बता सकता है। इससे लोगों को गलत मामलों में फंसाने की बातें सामने आ सकती हैं। केंद्र को इन मामलों में निष्पक्षता रखने वाले कानून बनाना चाहिए।