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कूटनीति: ग्लोबल साउथ की एकजुटता के बाद तल्ख हुए ट्रंप; भारत की स्वतंत्र विदेश नीति पर लगाना चाहते हैं लगाम?
सार
ब्रिक्स में भारत की सक्रिय भूमिका और ग्लोबल साउथ की एकजुटता के बीच अमेरिका का रुख सख्त होने की चर्चा है। रूस से तेल खरीद पर संभावित टैरिफ और पाकिस्तान को ड्रोन तकनीक देने की योजना से भारत पर आर्थिक और क्षेत्रीय दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की आगे कैसी परीक्षा होगी? पढ़िए रिपोर्ट
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ब्रिक्स देशों के उभार से असहज हुआ अमेरिका
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक/एएनआई
विस्तार
हालिया ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत की मुखर उपस्थिति और बहुध्रुवीय विश्व की वकालत के बाद अमेरिकी रुख में अचानक तल्खी आ गई है। एक ओर रूसी तेल आयात पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने वाला कानून और दूसरी ओर पाकिस्तान को अत्याधुनिक ड्रोन तकनीक सौंपने की तैयारी, इस बात का स्पष्ट संकेत है कि वाशिंगटन अब नई दिल्ली की स्वतंत्र विदेश नीति पर लगाम लगाना चाहता है। ग्लोबल साउथ की बढ़ती एकजुटता ने अमेरिकी प्रतिष्ठान को इतना असहज कर दिया है कि वह अब भारत पर आर्थिक और क्षेत्रीय सुरक्षा, दोनों मोर्चों पर एक साथ कूटनीतिक दबाव बना रहा है।
वाशिंगटन की बेचैनी
पिछले कुछ समय से ब्रिक्स केवल एक आर्थिक मंच न रहकर पश्चिमी आधिपत्य को चुनौती देने वाले समूह के तौर पर उभरा है। हालिया सम्मेलनों में डॉलर पर निर्भरता कम करने और ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करने में भारत ने अहम भूमिका निभाई है। अमेरिका के लिए मॉस्को या बीजिंग पर सीधे दबाव बनाना अब उतना आसान नहीं रहा है। ऐसे में वाशिंगटन ने ब्रिक्स के सबसे अहम लोकतांत्रिक स्तंभ भारत को निशाने पर लिया है, ताकि इस गुट की बढ़ती ताकत को संतुलित किया जा सके।
100 फीसदी टैरिफ का दांव
भारत अब तक पश्चिमी देशों की नाराजगी के बावजूद अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए रूस से रियायती दरों पर कच्चे तेल का आयात करता है। लेकिन ट्रंप प्रशासन के दौरान प्रस्तावित नए विधेयक में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की बात कही गई है। यह महज एक आर्थिक फैसला नहीं है, बल्कि एक भूराजनीतिक हथियार है। इसका सीधा मकसद भारत को यह संदेश देना है कि वह अनिश्चित काल तक वाशिंगटन और मॉस्को के बीच संतुलन नहीं साध सकता। अगर यह नीति लागू होती है, तो भारत का आयात बिल और घरेलू महंगाई बढ़ सकती है।
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बिसात पर लौटा पाकिस्तान कार्ड
अमेरिका का दूसरा आक्रामक कदम पाकिस्तान को अत्याधुनिक अमेरिकी ड्रोन देना और वहां असेंबली लाइन स्थापित करने की योजना है। यह दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन को बदलने और भारत को उसके पड़ोस में ही उलझाए रखने की एक सोची-समझी रणनीति है। अमेरिका जानता है कि पाकिस्तान को सैन्य मदद मिलने से नियंत्रण रेखा पर भारत की चिंताएं बढ़ेंगी। यह नई दिल्ली पर दबाव बनाने का अमेरिका का एक आजमाया हुआ चेकमेट कदम कहा जा सकता है।
रणनीतिक स्वायत्तता की परीक्षा
भारत ने पिछले एक दशक में अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी गहरी की है। साथ ही रूस के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों को आंच भी नहीं आने दी है। इसी को भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता कहता रहा है, लेकिन अब वाशिंगटन के इन कड़े कदमों ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत के लिए यह संतुलन साधने की गुंजाइश कम हो रही है। यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत की कूटनीति इस नए अमेरिकी चक्रव्यूह को कैसे भेदती है। मौजूदा कूटनीतिक परिदृश्य देश के नीति निर्माताओं के लिए बड़ी परीक्षा साबित होने वाला है।
ये भी पढ़ें: आईएईए के प्रस्ताव पर भड़का उत्तर कोरिया: किम जोंग उन की बहन बोलीं- परमाणु ताकत नहीं घटेगी; टकराव बढ़ेगा?
विशेषज्ञ राय
इस बारे में भूराजनीतिक विश्लेषक सुशांत सरीन ने कहा कि अमेरिका से दोस्ती की पुरानी धारणा धरी की धरी रह गई है। हमें समझ जाना चाहिए कि अमेरिका से पुरानी गर्मजोशी खत्म हो गई है। यह हालात वापस पहले जैसे नहीं होंगे। सरीन ने अमेरिका से रक्षा से जुड़ा साजोसामान खरीदने की नीति की आलोचना करते हुए कहा कि इस पर बैन लगा देना चाहिए। वह हम पर प्रतिबंध लगा रहा है और हम उनसे सामान खरीदते जा रहे हैं। यह अक्ल की बात नहीं है। सरीन ने कहा कि अगर आप अपनी प्रभुसत्ता बनाए रखना चाहते हैं तो उसका खामियाजा भी भरना पड़ेगा। आप बोलिए कि आप 100 फीसदी टैरिफ लगा रहे हैं, अब हम भी लगा रहे हैं। अमेरिका के साथ बिगाड़ने पर नुकसान कई सेक्टर्स में होगा, लेकिन भारत को कहीं न कहीं अपनी लक्ष्मण रेखा तो तय करनी ही पड़ेगी और अंततः अपने पैरों पर खड़ा होना होगा।
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वाशिंगटन की बेचैनी
पिछले कुछ समय से ब्रिक्स केवल एक आर्थिक मंच न रहकर पश्चिमी आधिपत्य को चुनौती देने वाले समूह के तौर पर उभरा है। हालिया सम्मेलनों में डॉलर पर निर्भरता कम करने और ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करने में भारत ने अहम भूमिका निभाई है। अमेरिका के लिए मॉस्को या बीजिंग पर सीधे दबाव बनाना अब उतना आसान नहीं रहा है। ऐसे में वाशिंगटन ने ब्रिक्स के सबसे अहम लोकतांत्रिक स्तंभ भारत को निशाने पर लिया है, ताकि इस गुट की बढ़ती ताकत को संतुलित किया जा सके।
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100 फीसदी टैरिफ का दांव
भारत अब तक पश्चिमी देशों की नाराजगी के बावजूद अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए रूस से रियायती दरों पर कच्चे तेल का आयात करता है। लेकिन ट्रंप प्रशासन के दौरान प्रस्तावित नए विधेयक में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की बात कही गई है। यह महज एक आर्थिक फैसला नहीं है, बल्कि एक भूराजनीतिक हथियार है। इसका सीधा मकसद भारत को यह संदेश देना है कि वह अनिश्चित काल तक वाशिंगटन और मॉस्को के बीच संतुलन नहीं साध सकता। अगर यह नीति लागू होती है, तो भारत का आयात बिल और घरेलू महंगाई बढ़ सकती है।
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बिसात पर लौटा पाकिस्तान कार्ड
अमेरिका का दूसरा आक्रामक कदम पाकिस्तान को अत्याधुनिक अमेरिकी ड्रोन देना और वहां असेंबली लाइन स्थापित करने की योजना है। यह दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन को बदलने और भारत को उसके पड़ोस में ही उलझाए रखने की एक सोची-समझी रणनीति है। अमेरिका जानता है कि पाकिस्तान को सैन्य मदद मिलने से नियंत्रण रेखा पर भारत की चिंताएं बढ़ेंगी। यह नई दिल्ली पर दबाव बनाने का अमेरिका का एक आजमाया हुआ चेकमेट कदम कहा जा सकता है।
रणनीतिक स्वायत्तता की परीक्षा
भारत ने पिछले एक दशक में अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी गहरी की है। साथ ही रूस के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों को आंच भी नहीं आने दी है। इसी को भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता कहता रहा है, लेकिन अब वाशिंगटन के इन कड़े कदमों ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत के लिए यह संतुलन साधने की गुंजाइश कम हो रही है। यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत की कूटनीति इस नए अमेरिकी चक्रव्यूह को कैसे भेदती है। मौजूदा कूटनीतिक परिदृश्य देश के नीति निर्माताओं के लिए बड़ी परीक्षा साबित होने वाला है।
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विशेषज्ञ राय
इस बारे में भूराजनीतिक विश्लेषक सुशांत सरीन ने कहा कि अमेरिका से दोस्ती की पुरानी धारणा धरी की धरी रह गई है। हमें समझ जाना चाहिए कि अमेरिका से पुरानी गर्मजोशी खत्म हो गई है। यह हालात वापस पहले जैसे नहीं होंगे। सरीन ने अमेरिका से रक्षा से जुड़ा साजोसामान खरीदने की नीति की आलोचना करते हुए कहा कि इस पर बैन लगा देना चाहिए। वह हम पर प्रतिबंध लगा रहा है और हम उनसे सामान खरीदते जा रहे हैं। यह अक्ल की बात नहीं है। सरीन ने कहा कि अगर आप अपनी प्रभुसत्ता बनाए रखना चाहते हैं तो उसका खामियाजा भी भरना पड़ेगा। आप बोलिए कि आप 100 फीसदी टैरिफ लगा रहे हैं, अब हम भी लगा रहे हैं। अमेरिका के साथ बिगाड़ने पर नुकसान कई सेक्टर्स में होगा, लेकिन भारत को कहीं न कहीं अपनी लक्ष्मण रेखा तो तय करनी ही पड़ेगी और अंततः अपने पैरों पर खड़ा होना होगा।