अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए मोदी सरकार को चाहिए 100 लाख करोड़
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अगले पांच साल में अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए मोदी सरकार को करीब 100 लाख करोड़ रुपये की आवश्यकता पड़ेगी। हालांकि इसके लिए पैसा कहां से आएगा यह एक बड़ा सवाल है। पार्टी ने अपने विजन डॉक्यूमेंट में इस बात का वादा किया था कि वो सत्ता में दोबारा वापसी करने पर इनको अमली जामा पहनाने की कोशिश करेगी।
इनके लिए चाहिए होगा पैसा
भाजपा ने वादा किया था कि वो सत्ता संभालने के बाद किसानों के लिए हर साल छह हजार रुपये, सड़क, रेलवे और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े कार्यों को रफ्तार देगी। इनके लिए कम से कम 100 लाख करोड़ रुपये चाहिए होंगे। इसके अलावा उत्पादन को रफ्तार देने एवं निर्यात को भी बढ़ावा देना होगा।
मध्यम वर्ग को देनी होगी टैक्स में छूट
मध्यम वर्ग को टैक्स में छूट देने का भी सरकार ने वादा किया था। इन लोगों के बल पर ही भाजपा को 352 सीटें मिली हैं। लेकिन अभी अर्थव्यवस्था को एक बड़ी गति देने की जरूरत है।
खपत में हो गई है गिरावट
इसलिए मोदी सरकार की दूसरी पारी की पहली चुनौती आर्थिक मैनेजमेंट ही होगी। यह काम वोट अकेले मैनेजमेंट के अमित शाह सरीखे दिग्गजों के बूते नहीं छोड़ा जा सकता। अगले कुछ हफ्तों में ही पूर्ण बजट पेश होना है। तब तक सुपर विक्ट्री का नशा उतर चुका होगा। माल्यार्पण अभिनंदनों का दौर गुजर चुका होगा। कुछ ठोस कर दिखाने की असली चुनौती सामने होगी।
किसानों के लिए कुछ ठोस करना नई सरकार का पहला काम होना चाहिए। किसानों के खातों में सम्मान निधि का कुछ हिस्सा पहुंच गया है लेकिन बात भूखों को उपहार में मछली देने से नहीं, मछली पकड़ना सिखाने से बनती है। सवाल यही है कि फसल का उचित दाम किसान को मिले और ग्रामीण अर्थतंत्र में खपत और मांग सुधरे - इसके लिए क्या हो।
सरकारी नौकरियों की वेकेंसी उम्मीद के पेड़ पर सबसे नीचे लटक रहे फल हैं। उन्हें महज उचक कर पकड़ा जा सकता है। फिर असली काम लेकिन मुश्किल काम पर निगाह जमानी होगी। एक्सपर्ट बिरादरी हजार बार कह चुकी है कि कृषि एक सीमा के बाद रोजगार नहीं दे सकती। उसकी जोत लगातार घट रही है। असली आश्वासन कारखाने देते हैं। ज़रुरत छोटे और मध्यम उद्योगों को संजीवनी देने की है। मैन्युफैक्चरिंग को खाद-पानी देने की है।
शहरों के मुकाबले गांवों में एफएमसीजी उत्पादों की खपत काफी कम हो गई है। ऐसा इसलिए क्योंकि किसानों के पास पैसा नहीं बचा है। इसके साथ ही निवेश भी काफी कम हो गया है। वहीं बेरोजगारी भी काफी बढ़ गई है। अर्थशास्त्रियों को आशंका है कि मार्च महीने तक विकास दर 6.5 फीसदी हुई है।
चालू खाता घाटा बढ़ा
फिलहाल चालू खाता घाटा के अनुमान को केंद्र सरकार ने मार्च 2020 तक बढ़ाकर के 3.4 फीसदी कर दिया है। आय कम होने की वजह से सरकार बैंकों से कर्ज ले रही है। वहीं उसने आरबीआई से भी कहा है कि वो खर्चों को पूरा करने के लिए उसको ज्यादा पैसा दे। अगर यह घाटा बढ़ता है तो फिर देश की क्रेडिट रेटिंग पर काफी असर पड़ने की संभावना है।
फिच ने किया यह आकलन
अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फिच ने आकलन किया है कि वित्तीय हालात को सुधारना केंद्र सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। अभी सरकार ने आय बढ़ाने के साधनों पर रोक लगा रखी है, जिस पर कुछ करना चाहिए। वहीं किसानों को हर साल छह हजार रुपये देने की घोषणा से भी खजाने पर असर पड़ेगा।
सड़क, रेलवे पर खर्च
फिलहाल केंद्र सरकार पूरे देश में हाईवे और रेलवे का जाल बिछा रही है। मार्च 2019 तक सरकार ने एक लाख 20 हजार करोड़ रुपये का खर्च इस पर किया था। इस तरह से लोगों को रोजगार तो मिल रहा है, लेकिन कई हाईवे अभी भी बन रहे हैं, जिनको पूरा होने में कम से कम दो साल और लगेंगे। ऐसे में यहां पर खर्च और ज्यादा बढ़ने की उम्मीद है।
नोटबंदी, जीएसटी से टूटी थी कमर
मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में नोटबंदी और जीएसटी से अर्थव्यवस्था की कमर टूट गई थी। हालांकि आईबीसी, लालफीता शाही को खत्म करने व ई-वे बिल लाने से निवेशकों में विश्वास भी बढ़ा था।